सिर्फ राजनीति ही गरीबों का शोषण नहीं करती, धर्म भी करता है। ईसाई धर्मप्रचारक भारत आते हैं और गाँव-गाँव घूमकर लोगों को ईसाई बनाते हैं। खासकर वे देश के अंदरूनी इलाकों में, छोटे-छोटे गाँवों और आदिवासियों के बीच जाकर उन्हें भोजन, कपड़े-लत्ते, शिक्षा और कई बार पैसे और रोज़गार तक मुहैया कराते हैं। बदले में उनकी सिर्फ एक शर्त होती है: वे बप्तिस्मा करा लें और अपना धर्म बदलकर ईसाई हो जाएं। इससे उन गरीबों को जीने का एक मौका मिलता है, एक आशा की किरण, कि वे सदियों की गरीबी से बाहर निकल पाएंगे।
अक्सर हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन, जैसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल, इन ईसाई धर्मप्रचारकों के विरुद्ध खुले आम अपनी नाराज़गी का इज़हार करते हैं। उनकी शिकायत यह होती है कि पश्चिमी देशों से प्राप्त विशाल धनराशियाँ लेकर ये लोग भारत आते हैं और बड़ी संख्या में हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करके उन्हें ईसाई बना लेते हैं।
जो बात ये लोग नहीं देखना चाहते, वह यह है कि अपना धर्म छोड़कर ईसाई बनने वाले लोग सिर्फ इसलिए धर्मपरिवर्तन कर लेते हैं क्योंकि वे भुखमरी से पीड़ित हैं और ऐसा करने से उन्हें भोजन की सुरक्षा प्राप्त होती है। वे नहीं जानते कि आज उनके यहाँ भोजन बनेगा या नहीं। उनके लिए इसका कोई अर्थ नहीं होता कि वे हिन्दू हैं या ईसाई और वे पूजा करने मंदिर जाते हैं या चर्च। एक बार भरपेट भोजन मिल जाने के बाद वे उसी तरह ईसा मसीह की पूजा कर सकते हैं जैसे अब तक राम की करते रहे थे। वे न तो अपने वर्तमान धर्म से नाखुश हैं और न ही इस नए धर्म की आश्चर्यजनक शक्तियों या अच्छाइयों से अभिभूत या सहमत हैं। उनकी कुछ बुनियादी ज़रूरतें हैं, उसके बाद ही धर्म का स्थान आता है। वे किसी कट्टर आस्था पर शहीद होने वाले लोग नहीं हैं, जो भूखों मर जाएंगे मगर अपने ईश्वर को त्यागकर दूसरे ईश्वर की पूजा नहीं करेंगे। वे व्यावहारिक लोग हैं, अभिभावक अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं कि अगर भोजन न मिला तो वे भूखों मर जाएंगे। अगर वे धर्मपरिवर्तन कर लें तो न सिर्फ उन्हें भोजन मिलेगा बल्कि जीने का उनका नजरिया ही बदल जाएगा! सिर्फ जिन्दा रहने के संघर्ष के स्थान पर उन्हें भी दूसरों की तरह ठीकठाक तरीके से जीने का मौका मिलेगा। क्या यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि वे क्यों अपना धर्म बदलते हैं?
मुझे गलत मत समझिए, मैं नहीं समझता कि पैसे का लालच देकर दूसरों का धर्मपरिवर्तन कराना कोई अच्छा विचार है। इसके विपरीत वास्तव में मैं इसे बेहद मूर्खतापूर्ण बात मानता हूँ कि दूसरों को अपनी आस्थाओं पर विश्वास करने पर मजबूर किया जाए। मैं कभी दूसरों के विश्वासों को बदलने की चेष्टा नहीं करता और न ही मुझे इस बात की कोई ग़लतफ़हमी है कि जिसे मैं अपने विचार बता रहा हूँ, वह तुरंत अपनी आस्थाओं को त्यागकर मेरे विचारों को मानना शुरू कर देगा। लेकिन ये हिन्दू कट्टरपंथी उन्हीं जगहों पर जाकर, जहाँ ईसाई धर्मप्रचारक गए थे, उन्ही नए बने ईसाइयों को वापस हिन्दू धर्म में धर्मांतरण कराने की कोशिश करते हैं। वे भी उन्हें भोजन और पैसों का लालच देते हैं और गाँव वाले, स्वाभाविक ही, बड़े खुश हैं कि उन्हें दोनों तरफ से मदद मिल रही है। जब भी कोई ऐसा प्रस्ताव रखता है, वे अपना धर्म बदलकर दूसरा धर्म अपना लेते हैं। जब कोई ईसाई आएगा तो वे फिर से ख़ुशी-ख़ुशी ईसा मसीह की पूजा शुरू कर देंगे।
क्या ये ईसाई धर्मप्रचारक नहीं जानते कि जब कोई भूखा होता है, जब उसे अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने की चिंता होती है तो उसके लिए धर्म गौण हो जाता है? आप सिर्फ लोगों को भोजन मुहैया कराएं, संभव हो तो उनके लिए बेहतर जीवन की दूसरी सुविधाएँ मुहैया कराएं और लोगों को अपना निर्णय खुद लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ दें कि वे किस धर्म को मानना चाहते हैं। क्या आप अपने ही धर्म का अपमान नहीं कर रहे होते जब लोगों का धर्मपरिवर्तन कराने के लिए आप ऐसी चालबाज़ियाँ करते हैं। दूसरों को अपने धर्म में लाने के लिए आपको रिश्वत क्यों देनी पड़ती है? अगर आपका धर्म वास्तव में इतना महान है तो लोग अपनी मर्जी से उसे अपनाएंगे, इसलिए नहीं कि उन्हें मजबूरी में ऐसा करना पड़ रहा है।
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