कल मैंने कुछ चोरों और डकैतों के विषय में लिखते हुए बताया था कि वे कोई अपराध करने से पहले मन्नत मानते हैं और फिर अपने काम में सफल हो जाने पर मंदिरों में जाकर ईश्वर को अपने वादे के अनुसार चढ़ावा चढ़ाते हैं। मुझे शक है कि कोई भी ईश्वर इतनी आसानी के साथ रिश्वत लेकर काम कर सकता है। मैंने यह भी कहा था कि इन कहानियों में ये अपराधी हमेशा आश्चर्यजनक रूप से बहुत ईमानदार होते हैं। वे ईश्वर से वादा करते हैं कि अपनी लूट का एक निर्धारित हिस्सा ईश्वर को समर्पित करेंगे और अपने वादे पर हमेशा कायम रहते हैं। क्यों? क्या यह अपने अन्तःकरण को साफ करने का उनका अपना तरीका है?
ये कहानियाँ सच हों या न हों, यह विचार अवश्य बड़ा लोकप्रिय है कि ईश्वर बहुत दयालु है और वह आपके अपराधों को माफ कर देता है। आप अक्सर अपराधियों को धार्मिक कामों में रुचि लेता हुआ पाएंगे। वे जानते हैं कि जो काम वे अपनी रोज़मर्रा ज़िंदगी में कर रहे हैं, वह गलत है और उन्हें इस आश्वासन की ज़रूरत होती है कि उन्हें माफ कर दिया जाएगा। यही उनकी आस्था का मूल है।
दुर्भाग्य से, इससे यह प्रतीत होता है कि आप कुछ भी कर सकते हैं, अगर आप कोई नैतिक रूप से अनुचित काम भी करते हैं तो आपको सिर्फ जमकर पूजा-अर्चना करनी है और मंदिर जाकर या किसी गुरु के दरबार में पर्याप्त चढ़ावा चढ़ाना है या दान-पुण्य करना है। अफसोस की बात है कि यही सब हो रहा है और लोग सिर्फ इसलिए धार्मिक हो जाते हैं कि धर्म उन्हें बगैर किसी आत्मग्लानि के गलत काम करने का सुविधा प्रदान करता है।
आज भी आप बहुत से दागी राजनीतिज्ञों को देखते हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं मगर वे हैं बड़े धार्मिक! उदाहरण के लिए कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, बी एस येदुरप्पा पर बहुत समय से भ्रष्टाचार और बहुत से घोटालों के आरोप हैं मगर धार्मिक रूप से बहुत आस्थावान माने जाते हैं। उनके और उनके अंधविश्वासों बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ। भ्रष्टाचार के इन आरोपों के चलते जुलाई 2011 में उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। जनार्दन रेड्डी भी उसी राज्य के एक ऐसे ही भूतपूर्व मंत्री और राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने 9 मिलियन डॉलर कीमत का एक मुकुट तिरुपति बालाजी मंदिर में चढ़ाया था और जिन्हें गैरकानूनी खनन मामले में, जिसके ज़रिए वे अमीर बन गए थे, गिरफ्तार कर लिया गया था।
धार्मिक अपराधी ज़्यादातर आर्थिक अपराधों में संलग्न पाए जाते हैं। वे अनैतिक और गैरकानूनी तरीकों से धन इकट्ठा करते चले जाते हैं और उसका थोड़ा बहुत हिस्सा मंदिरों में दान कर देते हैं, जिससे उन्हें महसूस हो सके कि उन्होंने अच्छा काम किया है। यह भ्रम उन्हें आत्मग्लानि से थोड़ी बहुत राहत दिलाता है।
अपराधी और अनैतिक काम करने वाले लगातार एक डर में जीते हैं। वे अपने कर्मों के परिणामों से भयभीत रहते हैं। धर्म उन्हें सांत्वना देता है और तरीका बताता है कि कैसे उन्हें माफी मिल सकती है। आपको सिर्फ नियमित रूप से मंदिर जाना है, पुजारी से अपने दिल की बात कहना है, थोड़े से रुपए देने हैं, कुछ प्रार्थनाएँ और पूजा-अर्चना करना है और आपको माफी मिल जाती है। फिर वे उस अपराध और पाप से बरी हो जाते हैं और अगला अपराध करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। यह पश्चात्ताप (कन्फेशन या अपराध-स्वीकार) का विचार है, जिससे मिलती-जुलती धारणा हिन्दू धर्म में प्रायश्चित्त के रूप में मौजूद है। ईश्वर दयालु है और वह माफ कर देता है इसलिए आप कुछ भी कर सकते हैं।
मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सभी मंदिर जाने वाले अपराधी, और इसलिए भयभीत, होते हैं लेकिन मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग मंदिर जाकर वहाँ पूजा-अर्चना करते हैं तो सिर्फ इसलिए कि वे आत्मग्लानि से ग्रसित होते हैं, उन्हें यह एहसास खाए जाता है कि वे जो काम कर रहे हैं वह अनैतिक और गैरकानूनी है। अगर आप ईमानदार हैं तो फिर न तो आपको डरने की ज़रूरत है और न ही मंदिर जाकर पश्चात्ताप करने की और न ही किसी प्रायश्चित्त की।
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