धार्मिक और आध्यात्मिक लोगों के लिए 15 सवाल- 1 अक्तूबर 2012

धर्म

-क्या आध्यात्मिक होने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता है?

-क्या हर किसी को जीवन के तारणहार के रूप में आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता है?

-अगर ‘हाँ’, तो क्या आप अपने आत्मविश्वास और स्वाभिमान को त्यागकर किसी दूसरे की गुलामी स्वीकार नहीं कर रहे हैं?

-क्या आपका आशय यह है कि जो किसी धर्म, धर्मगुरु या संप्रदायवादी सिद्धान्त को नहीं मानते, उनका जीवन व्यर्थ है?

-क्या आप ऐसा नहीं समझते कि धर्म में विश्वास करना, गुरु का शिष्यत्व ग्रहण करना और किसी संप्रदाय का सदस्य बनना ऐसे काम हैं, जिन्हें वास्तव में किसी न किसी डर या लालच के चलते किया जाता है?

-क्या लोग धर्म की शरण में इसलिए नहीं जाते कि गलत और अनैतिक कामों को अंजाम देने में आसानी होती है और ज़मीर भी आहत नहीं होता?

-क्या आप यह विश्वास करते हैं कि आप मंदिरों, चर्चों और गुरुओं को चन्दा देकर उनका आशीर्वाद खरीद सकते हैं, जैसे बाज़ार में दाल-चावल खरीदते हैं?

-क्या आप समझते हैं कि अपना भविष्य बेहतर बनाने में आप कोई भूमिका निभाते हैं?

-क्या अध्यात्म ऐसी चीज़ है, जिसे गणित या वाणिज्य विषयों की तरह सीखा जा सकता है?

-क्या आप यह नहीं समझते कि प्रेम करना और सत्यनिष्ठा के साथ जीवन जीना सच्ची आध्यात्मिकता है?

-क्या अपने बच्चे को याद करने के लिए एक माँ को सुमिरनी (जपमाला) की आवश्यकता पड़ती है?

-क्या अपने पति के बारे में विचार करने के लिए पत्नी को किसी विशेष मुद्रा में आसन लगाना पड़ता है?

-क्या आप सहमत नहीं हैं कि अगर आप प्रेम में हैं तो आपको ध्यान लगाने की आवश्यकता नहीं है, वह अपने आप लग जाता है?

-क्या हमें सीखना पड़ता है कि प्रेम कैसे किया जाए?

-क्या हमें सत्यनिष्ठा सीखनी पड़ती है?

-अगर नहीं, तो किसी को भी अध्यात्म सीखने की भी आवश्यकता नहीं है।

-और अध्यात्म बेचने के लिए हमें किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है!

-इस बात को मैंने पहले भी कई बार कहा है:

-अध्यात्म संस्थागत नहीं हो सकता, वह एक वैयक्तिक बात है। भले ही आप मंदिर या चर्च न जाएँ, भले ही आप कोई कर्मकांड न करें, अगर आप प्रेम और सत्यनिष्ठा में यकीन रखते हैं तो आप स्वतः ही आध्यात्मिक हैं।

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