पश्चिमी महिला के लिए क्यों भारत में सामाजिक जीवन बनाने में दिक्कतें पेश आ सकती हैं – 2 जुलाई 2015

पिछले कुछ ब्लॉगों में मैं उन चुनौतियों के विषय में लिखता रहा हूँ, जिनका सामना उन पश्चिमी महिलाओं को करना पड़ सकता है, जो अपने भारतीय पति के साथ भारत में रहने का इरादा रखती हैं। मैंने यह भी बताया कि इन चुनौतियों का फैलाव काफी विस्तृत है- अपनी भारतीय सास के साथ पैदा होने वाले मतभेदों से लेकर इस प्रश्न तक कि आप किस हद तक अंधविश्वास से परिपूर्ण भारतीय परंपराओं को स्वीकार करेंगी, या घरेलू हिंसा को, यहाँ तक कि आपके बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों को आप कहाँ तक सहन करेंगी। आज मैं कुछ और आगे जाकर इस विषय में अपने विचार रखना चाहता हूँ- आपके घरेलू संबंधों से परे, अपने संयुक्त परिवार के बाहर की दुनिया से आपके संबंध कैसे होंगे? आपका सामाजिक जीवन कैसा होगा?

स्वाभाविक ही, जब आप किसी दूसरे देश में बसती हैं और अपने लिए एक सामाजिक जीवन तैयार करने की कोशिश करती हैं तब आपको लगभग शून्य से शुरुआत करनी पड़ती है। 'लगभग' मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आपका पति और उसका परिवार इस काम में आपकी मदद कर सकते हैं। शायद! भारत की जनसंख्या इतनी अधिक है कि यह समस्या नहीं होती कि आपको लोग कहाँ मिलेंगे- लेकिन सवाल यह है कि क्या आप उनके साथ नज़दीकी बढ़ाना चाहेंगी!

पश्चिम में पली-बढ़ी होने के कारण और इस कारण कि वहाँ के खुले समाज में आपका लालन-पालन और विकास हुआ है, एक औसत भारतीय की तुलना में आप बिल्कुल अलग ढंग से सोच रही होती हैं। सिर्फ यही बात आपके लिए भारत में कुछ परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने में बाधक हो सकती हैं।

एक उदाहरण लें: आप अपने पति के साथ बाज़ार में घूम रही हैं और अचानक पति की एक परिचित महिला से आप लोगों की मुलाक़ात हो जाती है। आप गपशप करने लगती हैं और आपको लगता है कि यही भारत में आपका सबसे पहला संपर्क है। शायद आपकी पहली मित्र। वह भी आपसे मिलकर उल्लसित दिखाई दे रही है। आपके बीच मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान होता है और वह वादा करती है कि सप्ताहांत में वह आपके पास आएगी। आप भी व्यग्र हो उठती हैं और नाश्ते की तैयारियाँ शुरू करते हुए इस बात की आदत डालने का प्रयास करने लगती हैं कि ‘सप्ताहांत’ का अर्थ कोई एक खास दिन नहीं है, वह कभी भी धमक सकती हैं!

लेकिन क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि जब रविवार की शाम तक भी आपके यहाँ कोई न आए तो आपको कैसा लगेगा?

अधिकतर भारतीय खुद अपनी कही बात को कोई विशेष महत्व नहीं देते, खासकर इस तरह की मुलाकातों में कही बातों को। पश्चिम में आपकी आदत होती है कि आप मुलाक़ात का एक निश्चित दिन और समय तय करते हैं और अगर सामने वाले का कार्यक्रम किसी कारण स्थगित होता है तो वह अपने न आ पाने की सूचना देता है। पहली बात तो भारतीय लोग इसे बहुत गंभीर नहीं मानते! इसलिए उसके बारे में उन्हें कोई अफसोस भी नहीं होता-यह भिन्न विचारों और समझ की बात है! उनका फोकस दूसरी बातों पर होता है और कुल मिलाकर चीजों को देखने का नज़रिया भी बिल्कुल अलग प्रकार का होता है।

स्वाभाविक ही, बातचीत के विषय भी बिल्कुल अलग होंगे क्योंकि हर एक की रुचियाँ उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी निर्भर होती हैं। बहुत सी महिलाओं के पास बातचीत के लिए इसके अलावा कोई दूसरा विषय नहीं होता कि उसका पहला बच्चा कब होने वाला है या वह कितने बच्चे पैदा करेगी- जब कि आप कुछ अधिक गंभीर विषयों पर बात करना चाहेंगी!

ज़्यादातर भारतीय परिवारों में व्याप्त अंधविश्वास के बारे में आपको मैंने पहले ही बताया। आपका भारतीय परिवार बहुत असाधारण रूप से प्रगतिशील ही क्यों न ही क्यों न हो और मिथ्या अंधविश्वासों पर भरोसा न भी करता हो तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आपके आसपास के अन्य सभी लोगों में अंधविश्वास इस तरह कूट-कूटकर भरा होता है कि हर चर्चा में उसका प्रभाव दिखाई देता है! क्या आप मुहूर्त, व्रत-उपवास, धार्मिक समारोहों से सम्बंधित प्रश्नो से बचना चाहते हैं? उन्हें सुनने की आदत डालिए या फिर दोस्तों से बातचीत बंद कर दीजिए। आपको बुरा लग रहा है? किसी बिंदु पर आकर आप स्वयं अनुभव करेंगे कि इस मित्रता के लिए बहुत सारी ऊर्जा और बहुत सारा समय व्यर्थ करने में आप रुचि नहीं रखते।

मैंने घरेलू हिंसा के बारे में लिखा था और यह भी कि कैसे आपको अपने बच्चों के विरुद्ध किसी तरह की हिंसा स्वीकार नहीं करनी चाहिए। लेकिन आप अपने मित्रों और उनके घरों में होने वाली हिंसा का क्या करेंगे? क्या आप उनके घरों में जाना पसंद करेंगे कि आपके बच्चे उनके बच्चों के साथ खेलें और फिर उन्हें अपने माता-पिता से गालियाँ खाता या पिटता देखें? आप इसे पसंद नहीं करेंगे, आप नहीं चाहेंगे कि आपका बेटा या आपकी बेटी यह सब नज़ारा देखे और उनका संवेदनशील मन इन कटु बातों का अनुभव करे! फिर आप अपने बच्चे को अपने तरीके से, अपने परिवेश में पालना-पोसना शुरू कर देंगी।

हो सकता है कि भारत के बड़े शहरों में, जहाँ लोग अधिक खुले दिमाग वाले होते हैं और अलग तरह का जीवन व्यतीत करते हैं, ये बातें कुछ भिन्न हों। लेकिन बहुत भिन्न भी नहीं और फिर सारे लोग भी वैसे खुले दिमाग के नहीं होते! तथ्य यह है कि आज भी भारत में जीवन के प्रति अपरंपरागत रवैया रखने वाले इने-गिने लोग ही दिखाई पड़ते हैं।

अपनी जर्मन पत्नी के साथ हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर कहना चाहता हूँ कि बहुत प्रयासों के बाद भी आपको बहुत थोड़े लोग ही मिल पाते हैं, जिनके साथ आप वास्तव में अपना समय गुज़ारना पसंद करेंगी। लेकिन फिर- यह सबकी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है और इस पर भी कि आप ठीक-ठीक क्या चाहती हैं। तो आगे बढ़िए, मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं!

लेकिन अगर आप अपने भारतीय पति के साथ अपने देश में बसना चाहती हैं तो अगले सोमवार से मेरे ब्लॉग पढ़ना शुरू कीजिए क्योंकि मैं उन समस्याओं पर लिखने जा रहा हूँ, जिनसे उसकी मुठभेड़ हो सकती है, क्योंकि उसके लिए वह वातावरण बिल्कुल अपरिचित और नया होगा!

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