उन पश्चिमी महिलाओं को, जो भारतीय पुरुषों के साथ विवाह रचाकर भारत में बसने के लिए तैयार हैं, मैंने बताया था कि भारतीय संयुक्त परिवार में रहते हुए उनके सामने किस प्रकार की चुनौतियाँ पेश आ सकती हैं। सास के साथ मतभेद उनमें से एक बात समस्या हो सकती है। दूसरी यह हो सकती है कि किस सीमा तक आप भारतीय अंधविश्वासों को स्वीकार करें। तीसरी, जो आप पर और परिवार के साथ आपके सम्बन्धों पर सबसे अधिक असर डाल सकती है वह है बच्चों की परवरिश का तरीका। विशेष रूप से इसलिए कि एक हद तक बच्चों के प्रति थोड़ी बहुत हिंसा को भारतीय परिवारों में बहुत सामान्य माना जाता है!
जी हाँ, घरेलू हिंसा भारत में बहुत आम बात है और अभिभावक बच्चों को झापड़ या चपत लगाने में एक मिनट की भी देर नहीं लगाते- कूल्हे पर, हाथ पर, उँगलियों पर, गालों पर बल्कि जहाँ हाथ पहुँच जाए वहीं! इसे हिंसा माना ही नहीं जाता बल्कि उसे सामान्य, बच्चों को शिक्षित करने और उनके लालन-पालन का आजमाया हुआ नियमसम्मत तरीका माना जाता है।
जब कि भारतीयों के लिए यह एक सामान्य बात है, आप, पश्चिम में पली-बढ़ी एक महिला, जब पहली बार किसी बच्चे को पिटता हुआ देखेंगी तो निश्चित ही विचलित हो जाएँगी। इस बिन्दु पर मुझे याद आता है कि उन बहुत विकसित देशों के कुछ अपवाद स्वरूप परिवारों में बच्चों के साथ मारपीट आज भी हो सकती है लेकिन, ईमानदारी की बात यही है कि अधिकांशतः मैं विदेशों में जितने लोगों से मिला हूँ वह इस हिंसा पर स्तब्ध रह जाएँगे। किसी भारतीय परिवार के लिए जो महज एक चपत है वही पश्चिमी नज़रिये से बच्चे के साथ दुर्व्यवहार है!
अपने संयुक्त परिवार में जेठ या देवर के बच्चों के साथ ऐसा होता हुआ आप अक्सर देखेंगी। जब आप उनकी भाषा थोड़ा-बहुत समझने लगेंगी तो आपको पता चलेगा कि यह सिर्फ शारीरिक हिंसा तक ही महदूद नहीं है बल्कि उसमें वाचिक या शाब्दिक हिंसा भी शामिल है। ‘पिटाई लगेगी!’ जैसी बातें आप एक सामान्य भारतीय परिवार में अक्सर सुनेंगी!
आप भले ही अपनी सास से पूरी तरह असहमत हों, भले ही उसकी बात बिल्कुल न मानें, आप पर हाथ उठाने की शायद ही उसकी हिम्मत हो- लेकिन आपके बच्चों पर? लगभग निश्चित ही वह सोचती होगी कि बच्चों को अनुशासन में रखने, अपने आदेशों का पालन करवाने के लिए उन्हें थोड़ा-बहुत मारना-पीटना तो पड़ता ही है। वह उन्हें मारने-पीटने की धमकी देगी क्योंकि वह सोचती है कि यह बच्चों के प्रशिक्षण के लिहाज से अच्छी बात है।
क्या आप इसे सहन कर सकेंगी? अगर आप ज़रा सा भी मेरी तरह सोचती हैं तो कतई नहीं! मैं आपको सलाह दूंगा कि ऐसी परिस्थिति सामने आए, उससे पहले ही अपने पति से इस विषय में बात कर लें। पूछ लें कि बच्चों के संदर्भ में हिंसा के बारे में वह क्या सोचता है। क्या वह अपने परिवार वालों के सामने खड़ा होकर उन्हें रोक सकता है कि बच्चों के विरुद्ध शाब्दिक या शारीरिक हिंसा का प्रयोग न करें?
इस बारे में लड़ने-झगड़ने के लिए भी तैयार रहें- और मैं जानता हूँ कि बच्चों के मामले में माता-पिता शेरों की तरह लड़ सकते हैं! यह एक ऐसी बात है जिस पर आप किसी भी हालत में समझौता नहीं कर सकते। इसलिए, कोई आपको समझाने लगे कि थोड़ी-बहुत हिंसा बच्चों की बेहतरी के लिए ज़रूरी है या एकाध झापड़ मार देने से कुछ नहीं बिगड़ता तो उसकी बात का डटकर विरोध करें। हर शब्द मानी रखता है।
इस मामले में अपने बच्चों की खातिर शक्तिशाली बनें- और अपने पति से साफ शब्दों में कहें कि यह पत्थर की लकीर, लक्ष्मण रेखा है, जिसके आगे आप कुछ भी सहन नहीं करेंगी। इस मामले में उसे अपने साथ खड़ा होने के लिए मजबूर करें और दोनों मिलकर अपने संयुक्त परिवार को बच्चों की परवरिश के मामले में भविष्य की सही राह दिखा सकते हैं!
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