जैसाकि मैंने कल भी कहा था कि यहां लोग कई बार बड़ी अजीबोग़रीब सोच के साथ किसी रिश्ते की शुरुआत करते हैं। किसी रिश्ते का जन्म कैसे हुआ यह बहुत महत्वपूर्ण होता है। आपने किस मनःस्थिति में इसकी शुरुआत की? बाद में यह किस तरह परवान चढ़ा? डर के साथ या बगैर किसी डर के ? घूम – फिरकर बात वहीं विश्वास पर आ जाती है। आपसी संबंधों में भरोसे की बहुत कमी नज़र आती है यहां। प्रेम की शुरुआत ही शंकाओं के साथ होती है यहां। लंबे समय से प्रेमबंधन में बंधे प्रेमी युगल भी अपने रिश्ते को लेकर शंकाओं से घिरे रहते हैं : पता नहीं कितने दिन चल पाएगा हमारा यह रिश्ता? अधिकतर को यही डर सताता रहता है हर वक़्त। इस तरह के रिश्ते की बुनियाद मज़बूत हो ही नहीं सकती। मेरा मानना है कि भरोसे और प्रेम की नींव पर रिश्ते की इमारत खड़ी करेंगें तो बेहतर होगा।
रमोना कल की फिल्म का दूसरा भाग लेकर आई है जिसे हम आज देखेंगें। सच बताऊं तो मुझे फिल्म याद भी नहीं है। बस इतना याद है कि फिल्म अच्छी थी लेकिन इससे आगे और कुछ याद नहीं है। शायद यह इतना महत्वपूर्ण भी नहीं है। कई ऐसी बातें हैं जो आज से बीस साल पहले हुई थीं और मैं शब्दशः उनका वर्णन कर सकता हूं। लेकिन मुझे कल देखी हुई फिल्म की कहानी याद नहीं है। क्या करूं,, मेरा दिमाग ही ऐसा है।
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