दो दिन पहले मैंने आपको बताया था कि हमारे यहाँ, आश्रम में एक हनीमून दंपति आए थे और हमारे साथ उनकी अच्छी चर्चा हुई। अन्य बातों के अलावा हमारे बीच एक ऐसे विषय पर भी चर्चा हुई, जो उस नव-दंपति के लिए विशेष रुचिकर थी और वह विषय था आपसी संबंध। उन्होंने मेरे और रमोना के बीच सम्बन्धों के बारे में पूछा और मैंने खुशी-खुशी हमारे बीच मौजूद प्रेम और आनंद के बारे में उन्हें बताया!
उनका पहला प्रश्न था: रमोना के साथ आपके सम्बन्धों की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
मैंने उन्हें बताया कि हम आज तक एक रात भी अकेले नहीं रहे हैं। हम हमेशा साथ रहे हैं और जहां भी जाते हैं साथ-साथ ही जाते हैं। हम साथ में भोजन करते हैं, एक बिस्तर पर सोते हैं, अक्सर हम साथ ही नहाते भी हैं और ‘अक्सर’ इसलिए कि साल में चार बार जब अपरा नहाना नहीं चाहती और न ही किसी और के साथ खेलना चाहती है बल्कि चाहती है कि हममें से किसी एक के साथ ही खेलेगी, तब हम साथ नहीं नहा पाते।
वे आश्चर्यचकित रह गए और वह प्रश्न पूछा जो दूसरे भी आपस में हमारी इतनी निकटता देखकर अक्सर पूछते हैं: क्या आपके बीच कभी कोई समस्या पेश नहीं आती? कोई वाद-विवाद या मतभेद या तू-तू मैं-मैं?
मैं ईमानदारी और गर्व के साथ कह सकता हूँ कि कभी नहीं, हमारे बीच कभी कोई समस्या पेश नहीं आई। कभी-कभी हमारे बीच विचार-भिन्नता होती है लेकिन वह सिर्फ विचारों की भिन्नता है और उसकी वही सीमा भी होती है, वह विवाद का कारण कभी नहीं बनती। उसे पास्ता पसंद है और मुझे नहीं। मुझे ईलायची पड़ी मिठाई पसंद है और उसे नहीं। विचार-भिन्नता होना स्वाभाविक और सामान्य बात है।
तो आप अपनी विचार-भिन्नता का क्या हल निकालते हैं?
तब हम यह करते हैं कि एक ही प्लेट से वह अपना पास्ता खाती रहती है और मैं अपनी मिठाइयाँ। मैं यह नहीं पूछता कि वह पास्ता क्यों पसंद करती है और वह भी इस बात का ख्याल रखती है कि पास्ता मेरे खाने में न मिल जाए। उसे भी इस बात से कोई शिकायत नहीं होती कि मैं इलायची वाली मिठाइयां खाता हूँ और मैं इस बात का ध्यान रखता हूँ कि कुछ उसके पसंद की मिठाई भी रखी हो।
अगर कभी कोई ऐसा विषय सामने आ जाता है जिस पर हम एकमत नहीं हैं तो हम उसके बारे में विस्तृत चर्चा करते हैं, थोड़ा बहुत विवाद भी होता है पर वह पाँच मिनट से ज़्यादा देर नहीं टिकता और फिर हम उस विषय का हल खोज लेते हैं। हम एक-दूसरे पर चीखते-चिल्लाते नहीं हैं और न ही कोई बात दिल में छिपाकर रखते हैं। जो बात हममें से किसी एक को चुभ रही होती है तो हम उसे दूसरे से कह देते हैं। यह बात साझा करते हैं कि इस बारे में हम क्या महसूस कर रहे हैं और तब दूसरे का सिर्फ हमारी बात सुनना, या तो उसे स्वीकार करना या फिर यह कह देना कि वह कुछ अलग महसूस कर रहा है: बस, इतना ही दूसरे को संतुष्ट करने के लिए काफी होता है। अंत में हम यह बात निश्चित रूप से जानते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे को स्वीकार कर ही लेंगे, भले ही दूसरा कुछ भी सोचता, करता या कहता हो।
यह कितना प्रेरणास्पद है- आप बिल्कुल अलग संस्कृतियों से आए हैं! आपका आपसी प्रेम हमारे लिए एक उदाहरण है!
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