महज भ्रम बनाए रखने के लिए दुखद सम्बन्ध को न ढोएँ – 16 जून 2014

सम्बन्ध

मैंने पिछले हफ्ते लिखा था कि छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर अपने साथी के साथ संबंध विच्छेद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि कोशिश करनी चाहिए कि किसी तरह संबंध बने रहें: कुछ चीजों को स्वीकार करके और प्रेम में निराश होने की जगह प्रेम पैदा करके। लेकिन कुछ लोग इस कोशिश को कुछ ज़्यादा ही खींच देते हैं। अपने सम्बन्धों में प्रसन्न नहीं रहते बल्कि यह स्वीकार कर लेते हैं कि उनके भाग्य में प्रेम लिखा ही नहीं है और जीवन में उन्हें कभी प्रसन्नता प्राप्त नहीं होगी। मेरे विचार में यह भी एक गलत बात है।

मैंने ज़िक्र किया था कि बार-बार साथी बदलने की घटनाएँ पश्चिम में अधिक होती हैं, जहां लोग डेटिंग पर जाते हैं और आशा करते हैं कि वे अपने लिए कोई न कोई ‘मिस्टर या मिसेज़ राइट’ ढूंढ़ने में कामयाब हो जाएंगे। आजकल यह तथ्य भारत में भी अक्सर देखने में आने लगा है, जहां वैसे तो आयोजित विवाहों के बाद दंपति सोचते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब उनके सामने सारा जीवन एक-दूसरे के साथ गुजारने के सिवा कोई चारा नहीं है। लेकिन यह बात मैंने पश्चिम में भी देखी है, विशेषकर पुरानी पीढ़ी के लोगों में, जो आज भी पुराने मूल्यों और पुरानी परम्पराओं से जकड़े हुए हैं और सोचते हैं कि कामचलाऊ सम्बन्धों की मौजूदगी का भ्रम बनाए रखना खुश रहने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!

इस भ्रम, इस नाटक-नौटंकी में मुझे कई बार बड़ा पाखंड नज़र आ जाता है। इसके लिए आप कितनी बड़ी कीमत चुकाते हैं: आप अपनी खुशी, स्वतन्त्रता सब इन परम्पराओं और समाज तथा आपके आसपास मौजूद लोगों की इच्छा की बलिवेदी पर न्योछावर कर देते हैं। आप स्वीकार कर लेते हैं कि आप नाखुश हैं, फिर उसका दोष अपने साथी पर मढ़ते हैं और जब भी घर पर होते हैं, आपस में लड़कर आनंद प्राप्त करते हैं। जब बाहर होते हैं तब आपकी मुस्कुराहटें और हंसी बनावटी होती है।

विशेष रूप से भारत जैसे देश की संस्कृतियों में, जहां तलाक स्वीकार्य नहीं है, लोग यह कदम उठाते हुए डरते हैं। रमोना और मैं अक्सर आपस में मज़ाक किया करते हैं, “अब तो हमारे एक बच्चा भी हो गया है, और अब तो हम एक-दूसरे को छोड़ ही नहीं सकते!” लेकिन यह एक कड़ुवी सच्चाई है, खासकर बच्चा हो जाने के बाद चाहे वे आपस में कितना भी लड़े-झगड़ें, कितना भी दुखी हों, पति-पत्नी साथ रहना ही ठीक समझते हैं।

जैसा कि मैंने पिछले हफ्ते कहा था, यह आपके बच्चों के लिए किसी भी तरह से अच्छा नहीं है! वे इससे क्या सीखेंगे? दूसरों के सामने झूठी मुस्कुराहटें जब कि आप परिवार के साथ होने पर एक-दूसरे पर चीखते-चिल्लाते रहते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं! बच्चे इससे यह सीखते हैं कि उन्हें सच्चा व्यक्ति नहीं होना चाहिए, यह सीखेंगे कि वैवाहिक जीवन में सारा जीवन दुख ही उठाने पड़ते हैं।

और आप अपने करीबी लोगों को मूर्ख नहीं बना सकते! वे जानते है कि आप दुखी हैं। आपके बच्चे आपकी लड़ाइयाँ देखते हैं, आपके अभिभावक आपका एक-दूसरे पर चीखना-चिल्लाना सुनते हैं या उनके बारे में सुनते हैं, आपके सहोदर देखते हैं कि आपमें परिवर्तन हो रहा है, आप अब उतने खुले मन से बात नहीं करते। वे सभी दुखी होते हैं लेकिन आपकी मदद कौन कर सकता है? कोई नहीं कर सकता क्योंकि आप खुद दुखी रहने पर आमादा हैं!

चलिए, आगे बढ़िए और अपने बेकार के संबंध से छुटकारा पाइए, अपनी वास्तविक प्रसन्नता को पाने की कोशिश कीजिए और अंततः उसे प्राप्त करके रहिए! तब आपके बच्चों तक सही संदेश जाएगा: अगर आप एक सच्चा और सुखी जीवन जीना चाहते हैं तो उसके लिए प्रयास करना पड़ता है, अपने जीवन में परिवर्तन लाना पड़ता है! खुद के साथ सच्चे बनकर जियें। यह न देखें कि इस विषय में समाज क्या कहता है! खुश रहने के लिए कुछ न कुछ करते रहें!

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