रिश्ते का स्वरूप न बदलें 6 नवम्बर 08

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किसी भी रिश्ते की सफलता की कुंजी है अपने साथी को यह अवसर देना कि वह अपनी भावनाओं और इच्छाओं को जैसे चाहे वैसे व्यक्त कर सके। प्रेमसंबंध का अर्थ स्वामित्व नहीं है। मैंने पहले भी कई बार कहा है कि जिस व्यक्ति से आप प्रेम करते हैं उसे यह स्वतंत्रता आपको देनी होगी। निःसंदेह साथी को भी अपने प्रियतम की भावनाओं की क़द्र करनी चाहिए। दोनों पक्षों को परस्पर यह स्वतंत्रता देनी ही होगी। मैंने पहले भी लिखा था कि सबसे महत्वपूर्ण बात है आपके रिश्ते का जो मौजूदा स्वरूप है उसे वैसा ही बनाए रखें।

यदि आप अपने वर्तमान संबंध में किसी दूसरे संबंध को चस्पां करते हैं तो यह इस बात की तरफ संकेत करता है कि आपके पुराने रिश्ते में कुछ खामी थी। यदि आप पति – पत्नी हैं और कुछ समय बीतने पर कहने लगे कि आप दोनों भाई – बहन हैं, तो यह इस बात को प्रमाणित करता है कि आपके मौजूदा रिश्ते में कहीं कोई गड़बड़ी अवश्य है। आप अपने रिश्ते को ठीक से संभाल नहीं पाए। हो सकता है कि आपको इस बारे में चिंतन करने की आवश्यकता हो। इस बारे में विचार करें कि ऐसी नौबत क्यों आई और अब इस विषय में क्या किया जा सकता है। साथ ही यह भी जानने की कोशिश करें कि क्यों आप अपने रिश्ते की मधुरता का आनंद नहीं ले पाए तथा वह कौन सा कारण था कि आपको अपनी भावनाओं का स्वरूप बदलना पड़ा? मैं इस बारे में बहुत आशावादी हूं। मैं यह मानता हूं कि यदि आप वास्तव में समस्या का हल ढूंढने के इच्छुक हैं तो वह आपको अवश्य मिल जाएगा। हल ढूंढने के बजाए रिश्ते का स्वरूप बदल देना एक प्रकार की पलायनवादी सोच है।

मैं अकसर देखता हूं कि लोग प्रेम के कारण रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं और प्रेम का आनंद लेना चाहते हैं। जब कोई एक संबंध नाकाम हो जाता है तो वे उसी व्यक्ति से दूसरा सम्बन्ध बनाना चाहते हैं। मैं नहीं समझता कि भावनाओं का स्वरूप बदल देने से आपको संतुष्टि मिल सकती है। उल्टे आप स्वयं को अधूरा सा महसूस करेंगें। ऐसा लगेगा कि आपने कुछ खो दिया है। आप जब चाहे तब रिश्ते के स्वरूप को बदल नहीं सकते, इससे तो और ज्यादा उलझन पैदा होगी। पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर लिखते हुए मुझे बहुत अच्छा लग रहा है क्योंकि इसे पढ़कर कई लोगों को उनके प्रश्नों के उत्तर मिल रहे हैं। पाठकों की सकारात्मक टिप्पणियां इस बात की सूचक हैं।

नोट: भारतीय पाठक गौर करेंगे, पश्चिमी सभ्यता में ऐसी स्तिथियाँ अक्सर आती रहती हैं, वहां के मनोचिकित्सकों के साथ काउंसलिंग का काम करने के कारण वहां की समस्याएं मेरे लेखन में प्रतिबिंबित होती हैं|

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