कल मैं संबंधविच्छेद के बारे में बात कर रहा था। ऐसी परिस्थिति में दोनों पक्षों को हमेशा कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। रिश्ता जितना लंबा चलता है, उतना ही ज्यादा मुश्किल होता है एक दूसरे से अलग होना। कई रिश्ते, भावनाएं, ढेर सारा सामान, संभव है संयुक्त फ्लैट या मकान और बैंक अकाउंट ….बहुत कुछ होता है बंटवारा करने के लिए! और अग़र उन दोनों का एक बच्चा भी है उन्हें बहुत समझदारी से काम लेने की जरूरत होती है। बच्चे का मासूम दिल इन सब बातों से आहत न हो इसका विशेष ध्यान उन्हें रखना चाहिए।
बच्चे के मन में एक दूसरे के प्रति कड़ुवाहट पैदा नहीं करनी चाहिए। उसके दिल और दिमाग़ में जहर नहीं घोलना चाहिए। ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि माता- पिता दोनों से बच्चे का स्वस्थ संबंध बना रहे। इसके लिए ज़रूरी है कि क्रोध को त्यागकर दोनों एक दूसरे को क्षमा कर दें। क्रोध का यह विष अपने बच्चे को कदापि न पिलाएं। आप ऐसा क्यों करेंगें? यदि आप अलग होना चाहते हैं तो खुशी से होइए, लेकिन गुस्सा थूककर।
बहुत बार मैं सोचता हूं कि संबंधविच्छेद के पीछे एक कारण अहं भी होता है। अहं बड़ी ताक़तवर चीज़ है लेकिन याद रखिए इससे आपको कुछ हासिल होने वाला नहीं है। आप जानते हैं कि आप ग़लत कर रहे हैं लेकिन आपका अहं यह मानने के लिए तैयार नहीं होता और आपको अपनी ग़लती मानने से रोकता है। नतीज़तन परेशान आप ही होंगें। मैंने पहले भी इस बारे में इस लिखा है और वर्तमान विषय के संदर्भ में फिर कहना चाहता हूं कि आपको लगता है कि अलग होना बेहतर है तो बेशक अलग हो जाइए लेकिन इस दंभ के साथ नहीं कि आप सामने वाले से बेहतर हैं या वह ग़लत है या उसने ग़लती की। अपने बच्चे के सामने इस प्रकार की बातें कदापि न करें अन्यथा उसका बालमन बुरी तरह आहत हो जाएगा। क्या आप सोचते हैं कि नन्हा मुन्ना मां या बाप दोनों में से एक को चुन ले? नहीं, आप दोनों ही उसे जान से ज्यादा प्यारे हैं। जो कुछ भी हुआ और जैसे हुआ, उसे भूलने की कोशिश करें। वर्तमान को संजोएं और बच्चे को अपनी राय बनाने, रिश्ते और जीवन संवारने का मौका दें।
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