कई बार मैं देखता हूं कि कोई प्रेमसंबंध इस कारण असफल हो गया कि उसमें शारीरिक नज़दीकी का अभाव था। मेरी राय में केवल फोन पर बात करने या नेट पर चैट करने से संबंध प्रगाढ़ नहीं होते। बहुत से लोग ऐसी कोशिश करते हैं परंतु हमारा मानव स्वभाव ही ऐसा है कि किसी से आत्मीयता अनुभव करने के लिए हम उससे शारीरिक निकटता चाहते हैं।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से फोन या इंटरनेट पर बात करके हम सामने वाले से नज़दीकी बढ़ी हुई महसूस करते हैं। इस माध्यम की मदद से हम अपने मित्रों या आश्रम के साथ सम्पर्क बनाए रखना पसंद करते हैं और इस बात से खुश होते हैं कि आज के युग में यह सब संभव है।
फिर भी कुछ समय बीतने के बाद उन दोस्तों और आश्रमवासियों से साक्षात मिलने की इच्छा बलवती होने लगती है। एक दूसरे को इंटरनेट पर देखने – सुनने के बाद भी आपको लगता है कि काश सामने वाला आपके पास मौजूद होता जिसे आप स्पर्श कर पाते। आप उसके हाथ में हाथ डालकर कुछ पल बतियाना चाहते हैं, चाहते हैं कि कोई हो जिसके कंधे पर सिर रखकर आपको सुकून मिले।
ऐसा भी नहीं है कि मात्र शारीरिक सानिध्य ही सफलता की कुंजी है। इसके अतिरिक्त और भी बहुत सी बातें हैं जिनका इसमें योगदान होता है। मैंने ऐसे मधुर प्रेमसंबंध भी देखें हैं जहां दोनों का आपस में बहुत ज्यादा मिलना जुलना नहीं होता है। उन दोनों में से एक कामकाज के सिलसिले में किसी दूसरे शहर में रहता है और महीने में एक बार या उससे भी कम उनका मिलना होता है। बेशक वे दोनों साथ घूमने या कुछ समय साथ रहने की कोशिश करते हैं लेकिन कई बार यह भी संभव नहीं हो पाता। पुराने ज़माने में कोई फोन, ईमेल, स्काइप नहीं होते थे और चिठ्ठी भी हफ्तों में पहुंचती थी लेकिन फिर भी प्रेमसंबंधों की प्रगाढ़ता में कमी नहीं आती थी। मैं मानता हूं कि इसका अर्थ यह हुआ कि भरपूर प्रेम और समर्पण ही संबंधों की कामयाबी के गुर हैं।
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