कई बार प्रेमसंबंधों के विषय में बड़े हास्यास्पद शब्द सुनने में आते हैं, जैसे कि ‘अल्पकालिक प्रेम‘, ‘दीर्घकालिक प्रेम‘ या फिर ‘स्वच्छंद प्रेम‘। मैं समझ नहीं पाता हूं कि इस प्रकार की शर्तों पर आधारित रिश्ता कैसे कामयाब हो सकता है। सवाल यह नहीं है कि रिश्ता लम्बा है या छोटा। सवाल यह है कि असल में इसका मतलब क्या है और इस दीर्घकालिक की परिभाषा क्या है?
किसी रिश्ते को इस प्रकार की सीमाओं में बांधना यह दर्शाता है कि आप अपने प्रेम को लेकर न केवल असुरक्षित महसूस करते हैं बल्कि कई तरह के संदेह भी आपके मन में हैं। ऐसा लगता है कि मानों प्रेम नहीं इक़रारनामा है। यह व्यापारिक संबंधों की शब्दावली है लेकिन यदि आप किसी के साथ शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक सम्बंध बनाना चाहते हैं तो उसके लिए ये शब्द सर्वथा अनुपयुक्त हैं।
‘स्वच्छंद प्रेम’ शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि मानों स्व्च्छंदता के नाम पर आप व्यापार का अवसर तलाश रहे हैं। आप खरीददारी वहीं से करते हैं जिस जगह उचित भाव पर सामान मिलता है। लेकिन प्रेम के विषय में यह बात लागू नहीं होती। जब आप किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं तो भावनात्मक स्तर पर भी उसके साथ जुड़ जाते हैं और भावानात्मक संबंधों के लिए शारीरिक नज़दीकियां जरूरी हैं। भावनात्मक और शारीरिक नज़दीकियां आत्मिक संबंध को मज़बूती प्रदान करती हैं। लेकिन यह बात तय है कि अग़र आप संबंध को पहले ही ‘एक रात के प्रेम‘ की सीमाओं और शर्तों में बांध देंगें तो इसकी परिणति भिन्न होगी। आजकल हमारे समाज में भी बहुत लोकप्रिय हो चला है यह ‘एक रात का प्रेम‘। मैं इसमें कोई बुराई नहीं देखता हूं और न ही इसके खिलाफ हूं। इस विषय पर और अधिक चर्चा फिर कभी करूंगा।
श्रद्धालुओं के लिए कल का दिन विशेष महत्व रखता है। हजारों श्रद्धालु वृंदावन की नौ किलोमीटर लंबी परिक्रमा करेंगें। हमने उनके लिए सुबह के नाश्ते का इंतज़ाम किया है और इंटरनेट पर इसके सीधे प्रसारण की व्यवस्था भी की है।
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