किसी से प्रेम करना आपकी आज़ादी का हनन नहीं है – 3 जुलाई 2014

कल मैंने एक महिला का ज़िक्र किया था, जो अपने रिश्ते में कुछ समय का अवकाश लेने का विचार लेकर मेरे पास व्यक्तिगत-सलाह-सत्र में आई थी। उसी दिन एक पुरुष भी आया था, जो अपनी महिला मित्र से अलग हो जाना चाहता था। लेकिन उसकी परिस्थिति बिल्कुल भिन्न थी और इस बात से मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि व्यक्तिवाद, जो कि पश्चिम में इतना लोकप्रिय है, वास्तव में लोगों के दिलों के प्रति बेहद निष्ठुर सिद्ध हुआ है।

इस व्यक्ति ने मुझे बताया कि वह 20 साल तक विवाहित रहा था और उसकी पत्नी और बच्चे भी थे लेकिन फिर उसने अपनी पत्नी से तलाक ले लिया और अपने परिवार को छोड़ दिया। कारण? "वह मेरे लिए बहुत मुश्किल था!" उसने समझाने की कोशिश की। उसे लगता था कि वह अपने परिवार में इतना लिप्त हो चुका है कि अपनी आज़ादी खो बैठा है। जीवन में वह और भी बहुत कुछ करना चाहता था, यहाँ तक कि दैनिक जीवन में भी, और परिवार के होते हुए, बच्चों के साथ और दूसरी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ वह सब संभव नहीं हो पा रहा था! "मैं अपना आध्यात्मिक जीवन जीना चाहता था, आत्म-साक्षात्कार की शक्तियों को व्यक्त करना चाहता था और ज़्यादा से ज़्यादा योगिक जीवन जीना चाहता था!" इसलिए उसने सब कुछ छोड़ दिया।

अकेले रहते हुए जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो उसकी मुलाक़ात एक और महिला से हुई। उसके साथ उसके खुले सम्बन्धों की शुरुआत हो गई। वे दोनों अलग घरों में रहते थे, वह अपना काम करती थी और वह अपना जीवन जीता था लेकिन बावजूद इसके उनके संबंध खुले और प्रगाढ़ थे। खुले, यानी स्पष्ट शब्दों में यह कि वे दोनों ही किसी अन्य व्यक्ति के साथ भी शारीरिक संबंध रखने के लिए आज़ाद थे। इससे तो यही समझ में आता था कि उसे यौन आनंद के साथ अपनी सम्पूर्ण आज़ादी भी उपलब्ध थी। लेकिन नहीं! वह ऐसा नहीं समझता था। उसे लगता था कि यह भी वही सालों पुराने वैवाहिक जीवन जैसा ही है!

उसे महसूस हो रहा था कि यह महिला उस पर अधिकाधिक आश्रित होती जा रही है और इस कारण उस पर बहुत ज़िम्मेदारियाँ आ गई हैं, भले ही वे अलग घरों में रहते हों, भले ही बाल-बच्चों का कोई झंझट न हो। वह उसके प्रति अनुरक्त होती जा रही थी और बावजूद इसके कि वे दोनों किसी अन्य के साथ संबंध रखने के लिए आज़ाद थे, वह ऐसे संबंधों से परहेज़ करती थी। उसने कहा "मैं फिर उसी परिस्थिति में जकड़ गया हूँ!" लेकिन उसे सम्बन्ध तोड़ने में संकोच हो रहा था। "अगर अब मैं इस हालत में उसे छोड़ देता हूँ तो वह पूरी तरह टूट जाएगी! वह तहस-नहस हो जाएगी और उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है! वह पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी!"

उसने अंत में संक्षेप में कहा: "मैं उसे इस तरह चोट नहीं पहुँचाना चाहता-लेकिन मैं अपनी आज़ादी भी चाहता हूँ!"

मैंने उससे पूछा: "क्या तुम उससे प्यार करते हो?"

दो मिनट खामोशी छाई रही, जिसमें वह मेरे सामने आँखें बंद किए बैठा रहा फिर धीमे और लरज़ते स्वर में बोला: "हाँ, मुझे लगता है, मैं उससे प्यार करता हूँ!"

मैं यह पहले से जानता था। मेरा प्रश्न वास्तव में प्रश्न था ही नहीं, सिर्फ उसे उसके प्रेम का एहसास कराने के लिए एक उत्प्रेरक भर था! मेरा विश्वास है कि जब आप किसी की इतनी चिंता करते हैं तो वह वास्तव में उसके प्रति आपका प्रेम ही होता है और संबंध तोड़ने में उसकी हिचकिचाहट, उसे तकलीफ पहुँचाने का डर, उसके संभावित दर्द को महसूस करने की संवेदना यह ज़ाहिर कर रहे थे कि वह उसके प्रेम में डूबा हुआ है। "तो फिर तुम उसे इतना कष्ट क्यों देना चाहते हो"? मैंने पूछा। ऐसा करने पर न सिर्फ वह दुखी होगी बल्कि तुम खुद भी दुखी होगे! क्योंकि आप कितना भी खुले क्यों न हों, अगर आपके किसी के साथ इतने घनिष्ठ सम्बन्ध हैं, अगर आप दिल से किसी के इतना करीब हैं तो फिर समझिए, वहाँ प्रेम भी मौजूद है। और जब आप ह्रदय के इस बंधन को तोड़ने की कोशिश करते हैं तो कष्ट पहुँचता ही है!

प्रेम दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण नेमत है। किसी के साथ अनुरक्त होने में डर कैसा?-वह आपकी आज़ादी नहीं छीनती! आप प्रेम करते हुए भी आज़ाद रह सकते हैं!

अब आप जो चाहें कर सकते हैं लेकिन अगर मैं आपकी जगह होता तो मैं प्रेम का चुनाव करता, डर का नहीं!

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