कुछ दिन पहले मैंने आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरिज) के बारे में लिखा था। कई बार लगता है कि ऐसा विवाह, विवाह नहीं व्यापार है। एक पिता अपनी पुत्री के लिए एक सुयोग्य वर 'खरीदने के लिए' बेशुमार पैसा खर्चता है और एक दूसरे से पूरी तरह अनजान दो व्यक्तियों को विवाह के बंधन में बांध दिया जाता है। ऐसे विवाहों में तलाक की नौबत चाहे थोड़ा कम देखने में आती हो लेकिन कोई अचरज नहीं कि यहां भी पति – पत्नी के बीच अकसर असहमति और तू – तू मैं – मैं होती रहती है।
पाश्चात्य देशों में लोग एक दूसरे से मिलते हैं, डेटिंग करते हैं और एक दूसरे को अच्छी तरह जानने के बाद ही शादी करते हैं। इसके बावजूद वहां विवाह असफल हो जाते हैं। तो फिर विवाह की सफलता की कुंजी आखिर है क्या?
आपने देखा होगा कि आयोजित विवाह भी ज्यादा सफल नहीं होते। पति – पत्नी एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते या फिर पत्नी को सास – ससुर के साथ रहने में दिक्कत होती है। पश्चिम में आप देखेंगें कि लोग किस प्रकार एक के बाद एक प्रयोग करते रहते हैं, बार बार उनका दिल टूटता है और अधिकतर मामलों में लाख कोशिशों के बावजूद असफलता हाथ लगती है।
मेरी दृष्टि में विवाह की सफलता के लिए शारीरिक नज़दीकी और पूर्ण समर्पण, इन दो बातों का होना बहुत आवश्यक है। यदि समर्पण की भावना का अभाव है तो शारीरिक रुप से नज़दीक होने और एकसाथ एक ही कमरे में रहने और सोने के बावजूद दूरी बनी रहेगी। वे कभी एक दूसरे को समझ नहीं पाएंगें। कई बार तो ऐसे विवाहसंबंध ३० – ४० बरस के बाद भी टूटते देखे गए हैं। परस्पर समर्पण की भावना का होना निहायत ज़रूरी है।
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