ग्रान कनारिया की अपनी यात्रा के दौरान रमोना और मुझे बहुत सी आपसी बातें करने का मौका मिला। स्वाभाविक ही हमारी बहुत सी बातें अपरा या आने वाले कार्यक्रमों के बारे होती रहीं मगर हम लोग अपने सुखद संबंधों के बारे में भी चर्चा करते रहे। इसी चर्चा के दौरान हम उन लोगों के बारे में भी विचार करते रहे, जो आपस में अपने सम्बन्धों में पूरी तरह नाखुश होते हुए भी साथ रहने के लिए मजबूर होते हैं।
हो सकता है पूरी तरह नाखुश न भी हों। साधारणतया सभी पहलू बुरे ही हों, यह ज़रूरी नहीं है और अंततः इन्हीं बातों की बदौलत लोग अपने सम्बन्धों में बंधे रहते हैं, भले ही उनसे उन्हें पूरी खुशी न मिल रही हो। अक्सर ऐसे साथी के साथ भी, जिसे वे वास्तव में प्यार नहीं करते। ऐसी स्थिति में, जहां उन्हें कोई न कोई शिकायत बनी ही रहती है मगर वे इस परिस्थिति से समझौता करने में ही भलाई समझते हैं। वे इस तरह साथ रहते हैं जैसे किसी इकरारनामे के पाबंद होना उनकी मजबूरी हो। कई लोगों को समझौते से बंधा वह जीवन ही तात्कालिक रूप से सबसे सुविधाजनक लगता है।
कुछ लोग ऐसे सम्बन्धों में इसलिए भी बने रहते हैं क्योंकि उनके बच्चे होते हैं और उन्हें लगता है कि बच्चों के लिए अपने माँ-बाप दोनों के साथ रहना ही बेहतर होगा। लेकिन मैं समझता हूँ कि यह हमेशा अच्छा सिद्ध नहीं होता, विशेषकर तब जब अभिभावकों के बीच हमेशा तनाव और तकरार बने रहते हों। बच्चों के लिए यह कैसे बेहतर हो सकता है कि वे हर वक़्त अपने माँ-बाप को आपस में लड़ता-झगड़ता देखें?
कुछ दूसरे दम्पति किसी वास्तविक तनाव में नहीं रहते। वे शायद इस बात को स्वीकार कर चुके होते हैं कि उनका साथी वास्तव में ‘उनका’ है ही नहीं और वे उसके साथ एक छत के नीचे रहते भर हैं। घर तो साझा करते हैं मगर बिस्तर नहीं। बच्चे तो पैदा हो जाते हैं मगर प्रेम नहीं। बच्चों को दोनों उपलब्ध हो जाते हैं और किसी तरह निर्वाह कर लिया जाता है मगर क्या यह सम्बन्ध बच्चों को अच्छा माहौल दे पाता होगा? पुरुष और स्त्री के इस सम्बन्ध से बच्चे क्या सीखते होंगे?
और सभी पति-पत्नियों से मेरा यह प्रश्न है: बच्चों के लिए एक कामचलाऊ पारिवारिक जीवन का भ्रम उपस्थित करके आप दोनों कितने साल इसी तरह दुखद ज़िन्दगी जीते रहेंगे? दूसरों के सामने उन बातों का नाटक करते हुए, जिन्हें आप भीतर से महसूस नहीं करते? आखिर क्यों?
यह उनके लिए भी एक बहुत बड़ा प्रश्न है, जिनके बच्चे नहीं हैं और इसलिए बच्चों को सही रास्ता दिखाने की या उनकी परवरिश की कोई ज़िम्मेदारी भी उनके सर पर नहीं है। आप अपना समय क्यों बरबाद कर रहे हैं? महीनों, अक्सर सालों बिना प्रेम के, एक दूसरे पर शक करते हुए और यह जानते हुए भी कि वे अपने साथ ठीक नहीं कर रहे हैं। यह एक तरह का भय है। आप परिवर्तन से घबरा रहे हैं, डर रहे हैं कि पता नहीं आपको कोई दूसरा साथी मिल पाएगा या नहीं, कि जब 70% ख़ुशी मिल ही रही है तो क्यों किसी दूसरे की तलाश की कोशिश की जाए। और फिर कुछ दिन बाद आपको पता चलता है कि आपको जीवन में बस इतना ही मिलना था कि जीवन में किसी को भी 100% सुख नहीं मिलता।
एक बात कहूं: आपको सिर्फ एक ज़िन्दगी मिली है। आप पुनर्जन्म पर भी भरोसा कर लें, तब भी कम से कम इस जीवन को बरबाद न करें! आप अभी जिंदा हैं, अपने समय का पूरा उपयोग करें! आप ख़ुशी की तरफ कदम बढ़ाने की हिम्मत क्यों नहीं करते? क्यों नहीं उसे खोजने का प्रयास करते?
या फिर क्यों नहीं, जो आपको उपलब्ध है, उसी में पूरी तरह खुश रहते? क्योंकि आखिर ख़ुशी तो भीतर से आती है, बाहर से नहीं!
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