कई बार मैं रिश्ते की तुलना एक पात्र से करता हूं। एक रिश्ते में जिस प्रेम का अनुभव हम करते हैं वह इस पात्र में झरने वाले अमृत के समान होता है। आप इस पात्र को अमृत से भर सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि यह पात्र उस अमृत को अपने भीतर समाए रक्खे। प्रेम को आकार देने के लिए एक रिश्ते की ज़रूरत होती है। यह बात मायने नहीं रखती कि रिश्ता किस प्रकार का है। रिश्ता चाहे पति पत्नी का हो, मां – बेटी, भाई – बहन का हो या फिर दो मित्रों का, एक रिश्ता तो है जिसमें प्रेम पल्लवित हो सकता है। आप इस रिश्ते को बनाए रखते हैं ताकि प्रेम नित्यप्रति फलता – फूलता रहे। प्रेम किसी न किसी रिश्ते के आधार पर ही पुष्पित होता है।
जब आप दोनों हाथों से ताली बजाते हैं तभी आवाज़ पैदा होती है। केवल एक हाथ से ताली नहीं बजती है। इसी प्रकार एक रिश्ते को संगीतमय एवं जीवंत बनाने के लिए दोनों पक्षों को मेहनत करनी पड़ती है। संबंधों में समरसता लाने के लिए दोनों ओर से प्रयास करने पड़ते हैं। रिश्ते के जिस भी स्तर पर आप हैं उसे बनाए रखिए। यदि संबंध पिता – पुत्र का है तो भूमिकाएं बदलने की कोशिश न करें। पिता को पिता की भूमिका में ही रहने दें। न ही रिश्ते की अंतर्निहित भावना को बदलने की कोशिश करें क्योंकि ऐसा करके आप उसके वर्तमान स्वरूप को भी खो देंगें। यदि आप पति – पत्नी हैं तो अपने साथी की मां बनने की कोशिश कतई न करें।
मेरे एक मित्र, डॉ. माइकल कोसक जो पेशे से मनोचिकित्सक है, ने मुझे एक मज़ेदार लतीफा सुनाया : एक व्यक्ति मनोचिकित्सक के पास गया और कहने लगा,” मैं एक स्त्री से प्रेम करता हूं और उसके साथ शादी करना चाहता हूं। वह बिल्कुल मेरी मां की तरह मेरा ख्याल रखती है, मेरे लिए भोजन बनाती है। वह अद्भुत है “ और उस व्यक्ति ने उस स्त्री से विवाह कर लिया। विवाह के बीस बरस बाद वही व्यक्ति मनोचिकित्सक के पास दोबारा आया और बोला “ मैं अपनी पत्नी से तलाक़ चाहता हूं। वह हर वक़्त मेरी मां बनी रहती है“
कहने का तात्पर्य है कि रिश्ते के स्तर को बनाए रखिए और एक दूसरे के प्रति वफादारी रहिए। खासकर प्रेमसंबंध में ईमानदारी बरतना अति महत्वपूर्ण होता है। आज दोपहर में आयुर्वेद योग कोर्स के प्रतिभागियों ने स्कूल के बच्चों को यूनिफॉर्म के दूसरे जोड़े की कमीज़ें वितरित कीं। बहुत सुखद लगता है कि अब बच्चों के पास यूनिफॉम का दूसरा जोड़ा भी है।
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