क्या दोस्ती प्रेमसंबंध में बदल सकती है – 18 जनवरी 09

शहर:
एसन
देश:
जर्मनी

एक बार एक महिला हीलिंग के लिए मेरे पास आई। उसने मुझे बताया कि हाल ही में अपने बॉयफ्रेंड से उसका संबंध टूट गया है। वे पिछले बीस सालों से एक दूसरे को जानते थे और पांच सालों से उनका प्रेमसंबंध चल रहा था। उसने यह भी बताया कि प्रेमसंबंध से पहले वे बड़े अच्छे दोस्त थे और अब वह संबंध के टूटने के बाद दोस्ती और भी गहरी हो गई है। उसने मुझसे पूछा कि उनका प्रेमसंबंध चल क्यों नहीं पाया?

मैंने कहा, “क्या इन दोनों स्थितियों में कोई बहुत ज्यादा फर्क़ नज़र आता है तुम्हें? तुम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। कालांतर में तुमने आपस में एक शारीरिक रिश्ता कायम किया और इसे एक शक्ल दी, एक नाम दिया और फिर एक दूसरे से उम्मीदें बढ़ने लगीं जब ये उम्मीदें पूरी नहीं होती तो दोनों पक्षों को परेशानी होती है।“ अन्यथा देखें तो सब कुछ पहले जैसा ही है। दोनों अब भी एक दूसरे को जानते और पसंद करते हैं।

सवाल इस बात का है कि आप अपने रिश्ते को कैसे देखते हैं। आप अपने दोस्त को अपना प्रेमी बना लेते हैं और चाहते हैं कि वह इस भूमिका में भी खरा उतरे। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम प्रेमसंबंध में भी रहें और सामने वाले से बहुत ज्यादा उम्मीदें भी ना रखें?

हममें इतनी क्षमता होनी चाहिए कि हम दोस्ती और प्रेमसंबंध दोनों को एकसाथ कायम रख सकें। असल में समस्या यह नहीं है कि व्यक्ति बदल गया है या उसका व्यवहार पहले जैसा नहीं रहा। समस्या की जड़ में होती हैं हमारी ख्वाहिशें; हम प्रेम में क्या चाहते है और क्या उम्मीद रखते हैं? यदि हम साथी को और अपने रिश्ते को जस का तस स्वीकार कर लेते हैं तो समस्या का निदान अपने आप ही हो जाता है और इस प्रकार दोनों पक्ष अहम की लड़ाई के बीच में भी प्रेम की जो सुवास अब तक ज़िंदा है, उसका आनंद उठा सकते हैं।

आज का दर्शन बहुत अच्छा रहा। यह एसेन में आखिरी दर्शन था। लोग बहुत अभिभूत थे। नोएमी के बच्चे भी आये थे ,उन्होंने भी बहुत आनंद किया। मैं कह रहा था कि देखो बच्चे कैसे उन्मुक्त होकर खेल रहे हैं, कमरों में एक दूसरे के पीछे दौड़ रहे हैं और खिलखिलाकर हंस रहे हैं। कल रोजर और मैडी हमें लिवाने आएंगें और हम लग्ज़मबर्ग की तरफ प्रस्थान करेंगें। तो कल हम वहीं से लिखेंगें।

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