दो भिन्न संस्कृतियों से आए दम्पतियों को किस तरह बीच का रास्ता निकालना होता है- 16 अक्तूबर 2013

सम्बन्ध

कल मैंने स्पष्ट किया था कि संस्कृतियों के बीच कुछ अंतर इतने गहरे होते हैं कि किसी को भी, वह कितना भी बदलने की कोशिश करे, दूसरी संस्कृति में पूरी तरह स्वीकृति प्राप्त नहीं होती-एक संस्कृति से आए व्यक्ति के लिए किसी दूसरी संस्कृति की कुछ बातें पूरी तरह अपनाना असंभव हो सकता है, जब कि उसी संस्कृति से आए व्यक्ति के लिए वे बातें बहुत साधारण होती हैं। मैं स्वयं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि किसी संस्कृति को प्रत्यक्ष रूप से जानने के लिए उस संस्कृति के किसी व्यक्ति से विवाह कर लेना बेहतरीन उपाय है। किसी न किसी बिन्दु पर आप यह बात समझ जाते हैं कि आप कौन सी बात कर सकते हैं और कौन सी नहीं। इन सीमाओं के संदर्भ में आप यह भी समझने लगते हैं कि आपके साथी की कुछ दूसरी सीमाएं होती हैं। सुचारु रूप से इन दो संस्कृतियों का मिलन बीचोंबीच कहीं हो पाता है!

उदाहरण के लिए जीवन की भविष्य की योजनाओं को लें। पश्चिम में सामान्य रूप से प्रचलित सलाह यह होती है कि "प्रवाह के साथ बहते चलो" और ज़्यादा योजनाएँ मत बनाओ। पूर्वी देशों में, कम से कम भारत में लोगों को थोडा-बहुत योजना बनाकर चलना सीखना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या इस सलाह को कार्य रूप में परिणत करना संभव हो पाता है या नहीं?

मेरी पत्नी और मैं इस प्रश्न का सामना अक्सर करते रहते है। जर्मन होने के नाते वह योजनाबद्ध तरीके से काम करने की आदी है। इसका कारण उसका जर्मन पालन-पोषण है, उसकी संस्कृति और उसका परिवेश है। लेकिन मैं अक्सर कोई काम योजना बनाकर नहीं करता। जो कुछ भी सामने आता जाता है उसके अनुसार जीता और व्यवहार करता हूँ। मैं यहाँ त्योहार जैसे बड़े आयोजनों की बात नहीं बल्कि रोज़मर्रा के जीवन की बात कर रहा हूँ।

चलिए, नहाने जैसे एक छोटे से काम का उदाहरण लेते हैं। मेरी पत्नी सबेरे उठकर, बिस्तर से पैर बाहर निकालने से पहले ही सारे दिन की योजना बना लेती है। ये उसके भीतर बैठे जर्मन संस्कार हैं, जो दिन भर के कामों की मोटे तौर पर योजना बना लेते हैं और हर काम का ठीक समय नियत कर लेते हैं। अगले आधा घंटे हम उठेंगे और नित्य कर्म से निपटकर मैं सात से आठ बजे तक योग करने बैठ जाता हूँ। फिर आधा घंटा विश्रान्ति में लग जाता है और फिर मैं कंप्यूटर पर आधा घंटा बिताता हूँ। फिर नौ बजे हम लोग नहाते हैं, कुछ दूसरे काम निपटाते हैं और ग्यारह बजे दोपहर का भोजन करते हैं। यह सारी योजना वही बनाती है।

मैं उठूँगा और उस वक़्त बाथरूम जाने के अलावा कुछ नहीं सोचूंगा। मुझे पता नहीं होता कि अगले तीन घंटों में मैं क्या करना चाहूँगा-क्या-क्या काम सामने आएंगे, क्या मैं नहाऊँगा भी या नहीं? हो सकता है, मैं दोपहर में नहाऊँ…

तो, आप देख रहे होंगे कि हम दोनों अगर अपनी सांस्कृतिक या परिवेशगत आदतें पूरी निष्ठा के साथ बचाकर रखना चाहेंगे तो दोनों ही साथ नहा भी नहीं पाएंगे और फिर नहाने जैसी छोटी सी बात पर भी लड़ बैठेंगे। इसलिए हमें बीच का कोई रास्ता अपनाना होता है, रमोना ध्यान रखती है कि वह बार-बार मुझसे न पूछे कि हम कब नहाएंगे और न ही बार-बार यह बताए कि वह नौ बजे नहाने जाएगी। एक मोटे अंदाज़ में वह बता देती है कि किस वक़्त वह क्या करने वाली है लेकिन अपनी समय-योजना को वह थोड़ा-बहुत इधर-उधर करने के लिए तैयार रहती है।

और अपनी तरफ से मैं भी उसे स्पष्ट बता देता हूँ कि मैं आज सबेरे नहाने वाला नहीं हूँ, जिससे वह सबेरे के लिए किसी दूसरी योजना पर विचार कर सके और पहले से दोपहर के बारे में, क्या किया जाना है, इसका कुछ अंदाज़ा ले सके। अन्यथा मैं कोशिश करता हूँ कि नौ बजे तक सारे कार्य निपटाकर तैयार हो जाऊँ।

हम बीच में कहीं मिलते हैं। यह मेरे लिए संभव नहीं है कि रमोना की तरह सारे दिन की योजना बना लूँ। यह मेरे लिए बहुत तनावपूर्ण होगा और समय-सीमा के अलावा किसी भी दूसरे काम पर ध्यान केन्द्रित करना मेरे लिए असंभव हो जाएगा। इसके विपरीत, अगर उसके पास कोई तैयार योजना, कम से कम उसका स्थूल रूप, न हो तो, बहुत से काम निपटाने के बाद भी, उसे लगता रहेगा कि वह कोई दूसरा ही काम करना चाहती थी और उसका दिन व्यर्थ के कामों में बरबाद हो गया!

दूसरे देशों या संस्कृतियों से आए लोगों के साथ स्थापित किसी निकट संबंध में या दूसरे औपचारिक सम्बन्धों में भी आपको अक्सर समझौते का कोई बिन्दु तलाशना पड़ता है, दोनों पार्टियों को स्वीकार्य कोई समाधान, कोई बीच का रास्ता। हम दोनों ने ही एक-दूसरे की संस्कृतियों का कुछ हिस्सा अपने भीतर जज़्ब कर लिया है-इस तरह का लचीलापन बहुत सी बातों को और भी आसान बना देता है!

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