जीवन का आनंद लेते हुए खुद को अपराधी महसूस न करें! 5 अक्टूबर 2015

मनोविज्ञान

कई बार मुझे अपने ब्लॉग के विषय उन लोगों से बातचीत के दौरान प्राप्त होते हैं जो किसी न किसी ऐसी समस्या से दो-चार हो रहे होते हैं जो बहुत से दूसरे लोगों की समस्या भी हो सकती है। ऐसी ही एक समस्या के विषय में आज मैं लिखना चाहता हूँ: एक मेहमान आश्रम आई थी जो यह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि आगे कहाँ जाए। उसका कार्यक्रम पहले से तय था, उसके पास और भी विकल्प थे और वह अपने पसंदीदा स्थानों की यात्रा भी करना चाहती थी-लेकिन क्या वह इतना स्वार्थी हो सकती थी कि अपनी मनचाही जगह चली जाए?

इस महिला ने बड़ा मददगार स्वभाव पाया था और वह कुछ संगठनों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी। अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से चैरिटी का काम किया करती थी, अपने देश में भी और तीसरी दुनिया, अफ्रीका और भारत में। पैसे कमाने के लिए वह एक बड़ी कंपनी में काम करती थी और बड़ी खुश थी कि इस बार उसे पूरे छह हफ्ते का अवकाश मिला है। इतना लंबा अवकाश उसे पहले कभी नहीं मिला था। वह घूम-फिरकर उन जगहों को देखना चाहती थी जहाँ वह पहले खुद सेवा-कार्य कर चुकी थी।

क्योंकि वह एक सुरक्षित वातावरण में रहकर भारत को जानना-समझना चाहती थी इसलिए सबसे पहले एक सप्ताह उसने हमारे साथ बिताया। अपने अंतिम दो सप्ताहों को छोड़कर बाकी समय का उसने कोई पक्का कार्यक्रम नहीं बनाया था। इन दो सप्ताहों में वह पश्चिम बंगाल के एक चैरिटी संगठन के लिए, जिसकी मदद वह पिछले कई साल से कर रही थी, कुछ स्वैच्छिक सेवा-कार्य करना चाहती थी। वह एक अनाथाश्रम में बच्चों को पढ़ाना चाहती थी। इस बीच वह खाली थी लेकिन जब वह हमारे यहाँ रह रही थी, यह निर्णय करने में कि कहाँ जाए, उसे बड़ी परेशानी हो रही थी।

उसे समुद्र से बड़ा प्रेम था और केरल, गोवा में भारत के बहुत से सुहाने समुद्र किनारों को उसने देख रखा था-वास्तव में उसकी इच्छा वहीं, किसी बीच में जाकर पाम वृक्षों की छाया में लेटकर विश्राम करने की थी। लेकिन उसके सामने पहले अनाथाश्रम जाकर बच्चों को पढ़ाने का विकल्प भी था या किसी दूसरे चैरिटी में शामिल होकर विकलांग बच्चों के किसी स्कूल में पढ़ाने का।

वह इन विकल्पों के बीच पिस रही थी: वास्तव में वह कामों से कुछ दिनों का विराम लेकर समुद्री बीच के खुशनुमा एहसास का आनंद लेना चाहती थी लेकिन इससे उसे अपने स्वार्थी होने का एहसास होता था, बल्कि लगता था, जैसे वह बहुत आत्मकेंद्रित व्यक्ति है जो चैरिटी कार्यों के अपने दोनों विकल्पों को छोड़कर अपना समय और पैसा अपने सुख और आनंद पर खर्च कर रही है!

मैंने उससे कहा कि वही करो, जो तुम्हारा दिल चाहता है। अगर तुम्हारी इच्छा है कि बीच पर जाकर विश्राम किया जाए, तो वही करो। अपराधबोध के इस हास्यास्पद एहसास को खुद पर हावी न होने दो, उसे इस बात की इजाज़त मत दो कि तुम्हें ही निर्देश देने लगे। मुझे गलत मत समझो, मैं खुद चैरिटी का काम करता हूँ और उसमें सबकी मदद का स्वागत है-मगर तुम खुद भी महत्वपूर्ण हो! यह पैसा कमाने के लिए तुमने बहुत श्रम किया है। कंपनी की व्यस्त नौकरी में तुमने बहुत तनाव झेला होगा और इस प्रवास के बाद वापस जाकर फिर तुम्हें अपने आपको उसी में झोंक देना है। इतना करने के बाद तुम्हारा विश्राम करने का पूरा हक़ है।

वैसे भी तुम कुछ समय बाद दो हफ्तों तक बच्चों को पढ़ाने वाली ही हो! इस काम में भी बहुत ऊर्जा खर्च होती है और जब तुम पर्याप्त विश्राम कर लोगी तभी तुम्हें वह ऊर्जा प्राप्त होगी! अगर तुममें ऊर्जा बचेगी ही नहीं तो तुम क्या पढ़ा पाओगी!

इस बात के लिए कभी खुद को अपराधी मत समझो कि आपके पास दूसरों से अधिक है। क्योंकि अधिक है, इसीलिए आप दूसरों को दे पा रहे हो-लेकिन आपको अपनी चिंता भी करनी चाहिए, अपना खयाल रखना चाहिए। दूसरों को खुश करने के लिए खुद को दुखी मत करो! इस तरह काम नहीं चलता!

Leave a Comment