अपने अत्यल्प साधनों से भी योगदान करें क्योंकि छोटी चीज़ का भी असर होता है – 6 अक्टूबर 2015

मनोविज्ञान

कल मैंने आपको हमारी एक मेहमान के बारे में बताया था जो इस कारण खुद को अपराधी महसूस कर रही थी कि अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से सेवा करने की जगह समुद्री बीच पर जाकर विश्रांति प्राप्त करना चाहती थी। ऐसे नरमदिल, संवेदनशील लोगों की, जो वास्तव में दूसरों की मदद करना चाहते हैं, अक्सर एक दूसरी समस्या होती है: उन्हें इस संसार की बुरी हालत देखकर बड़ा दुःख होता है।

जो थोड़ा भी संवेदनशील होगा वह इस एहसास को एक हद तक समझ सकता है: कोई भी अखबार उठाकर देखें, हर तरफ मारा-मारी की खबरें-दुनिया भर में मानव जाति एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा, इस धरती को नष्ट करने को आतुर, दूसरे सभी प्राणियों के कष्टों का अंत नहीं! टीवी और रेडियो की खबरें देखकर ऐसा लगता है, जैसे प्रलय बस आने ही वाला है!

सीरिया और मध्य-पूर्व के युद्धों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि लोग भूखों मर रहे हैं, उनके साथ हर तरह की ज्यादती हो रही है, उनकी सरे आम हत्याएँ की जा रही हैं, लोग अपने देशों से भागने को मजबूर हैं, शरणार्थियों की समस्या भीषण रूप ले चुकी है और उसके कारण दक्षिणपंथी ताक़तें मजबूत हो रही हैं। दुनिया भर में सभी धर्म एक-दूसरे के खिलाफ युद्धरत हैं, मंदिरों-मस्जिदों में या आतंकवादियों के बमों से रोजाना निरपराध लोग मारे जा रहे हैं। आतंकवादी समूह शक्तिशाली हो रहे हैं, कहीं से भी लड़कियों का अपहरण कर लेना या नवयुवकों को बहला-फुसलाकर उनके दिमाग में फितूर पैदा करना आम बात हो गई है। निरपराध लोगों को, जिनमें डॉक्टर, नर्सें और सेवा करने वाले कर्मचारी शामिल हैं, मौत के घाट उतारा जा रहा है। हजारों एकड़ जंगलों को आग के हवाले कर दिया जाता है, किशोर बंदूकें लेकर स्कूल जाते हैं और अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर देते हैं, नशीले पदार्थों का व्यवसाय करने वाले गुंडों ने शहरों को खतरनाक बना दिया है। और उस पर बड़े-बड़े व्यावसायिक कार्पोरेशन्स और निश्चित ही सरकारें हैं जो सिर्फ अपने स्वार्थ और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखती हैं।

रोज़ सबेरे उठते ही आपको यह सब देखना-सुनना पड़ता है-इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ लोग जब दुनिया की इस हालत पर विचार करते हैं तो अवसादग्रस्त हो जाते हैं! इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि आप सोचते हैं कि दुनिया में क्लेश बढ़ता ही जा रहा है और आपके प्रयास उसके सामने कुछ भी नहीं हैं, उनका कोई असर नहीं होने वाला है।

लेकिन आपका अवसादग्रस्त हो जाना किस तरह इस मामले में सहायक होगा? यदि आप बिस्तर पर लेटकर आँसू बहाएँ तो क्या किसी को कोई लाभ हो सकता है? अगर आप बाहर निकलना बंद कर दें कि दुनिया बहुत बुरी है, तब कुछ होगा? उत्तर है, नहीं होगा! बल्कि अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपने लिए चिंतित करके आप दुनिया का दुःख और बढ़ा देंगे!

उठिए, उन भावनाओं को निकाल बाहर कीजिए और अपनी छोटी सी दुनिया को खुशनुमा बनाइए। अपने से शुरू कीजिए और सबसे पहले सुनिश्चित कीजिए कि आप खुश रहेंगे। फिर दूसरों की मदद कीजिए। जो समस्याएँ आपको सबसे ज़्यादा मथती हैं, उन्हें दूर करने में लोगों की मदद कीजिए। अगर आपको लगता है कि आप बेघर लोगों की या शरणार्थियों की मदद करना चाहते हैं तो आपके शहर में ही कोई न कोई रैनबसेरा या कोई स्वयंसेवी संगठन होगा, जहाँ जाकर आप स्वैच्छिक रूप से उनका हाथ बँटा सकते हैं। अगर आपका मन चीनी फैक्ट्रियों में जारी अमानवीय कार्य-प्रणालियों का विरोध करना चाहता है तो सुनिश्चित करें कि आप उनका सामान न खरीदकर किसी ज़िम्मेदार कंपनी का सामान ही खरीद रहे हैं, जो ऐसी अनुचित और गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त नहीं हैं! जब भी आपको लगे कि आप अपना समय और पैसा इन सत्कार्यों में लगा सकते हैं तो जहाँ ज़रूरत हो, ऐसा अवश्य करें। सोशल मीडिया के ज़रिए, पिटीशन भेजकर और आसपास के लोगों को उसकी जानकारी देकर ऐसे कार्यों के प्रति अपना समर्थन अवश्य व्यक्त करें।

आप सारे युद्धों को रोक नहीं सकते। इस ग्रह की सारी समस्याओं का निपटारा आप अकेले नहीं कर सकते! हाँ, आप अपनी दुनिया में परिवर्तन ला सकते हैं। दुनिया के विशाल परिदृश्य में वह बहुत छोटा सा प्रयास होगा, गहरे अँधेरे में प्रकाश की हल्की सी किरण जैसा! लेकिन आप ऐसी इकलौती किरण नहीं हैं और इसलिए हम सब साथ मिलकर एक विशाल प्रकाश-पुंज बन सकते हैं, सब मिलकर दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए काम कर सकते हैं।

अपनी सतह पर कुछ न कुछ अवश्य कीजिए- फर्क अवश्य पड़ेगा!

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