जर्मनी की चुनाव-प्रक्रिया भारत की तुलना में अधिक न्यायपूर्ण और जनतान्त्रिक क्यों है! 21 मई 2014

शहर:
डीसन
देश:
जर्मनी

शायद आप जानते ही होंगे कि हाल ही में हमारे देश में लोकसभा के चनाव हुए हैं। जनसंख्या के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा बड़ा देश है और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यही कारण है कि सारे देश में चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने में पाँच सप्ताह का लम्बा समय लगा। यहाँ मैं चुनाव के नतीजों की चर्चा नहीं करने वाला हूँ क्योंकि मैं अपने ब्लॉग को फिलहाल राजनीति से दूर रखना चाहता हूँ। मैं भारत की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बारे में भी लिखना नहीं चाहता और हालाँकि सरकार के निर्णयों पर बाद में कभी लिख सकता हूँ मगर आज चुनाव नतीजों पर आगे कुछ नहीं लिखुंगा। इसकी जगह मैं चुनाव-व्यवस्था के बारे में लिखना चाहता हूँ!

भारत में, जिस पार्टी ने भारत की जनता के सिर्फ 31% वोट पाए हैं उसने अगले पांच साल के लिए देश पर राज करने का हक़ प्राप्त कर लिया है क्योंकि उसे लोकसभा में सीटों का बहुमत प्राप्त हुआ है। इसका अर्थ यह है कि 69% लोगों ने इस पार्टी को नकार दिया है। ऐसा इसलिए होता है कि भारत में हम स्थानीय उम्मीदवारों को वोट देते हैं। स्थानीय स्तर पर जो बहुमत में वोट हासिल करता है वह लोकसभा के लिए चुन लिया जाता है और बाकी के वोट व्यर्थ हो जाते हैं। वह एक वोट से भी जीत सकता है और भारी बहुमत से भी, लेकिन उसकी पार्टी को एक सीट मिल जाती है। इस तरह, भले ही 69% वोटर उस पार्टी का शासन नहीं चाहते, हमारी चुनाव-व्यवस्था की खामी के कारण इस पार्टी ने संसद में बहुमत पा लिया है और उसके लिए देश पर शासन करना आसान हो गया है-और इस कारण हमारा लोकतंत्र वास्तव में लोकतंत्र नज़र ही नहीं आता।


भारत की जनसंख्या

1 270 000 000 (2014)

कुल मतदाता

815 000 000(2014)

पार्टी

प्राप्त मत

प्राप्त सीटें

भाजपा

17,16,57,549

282

कांग्रेस

10,69,38,242

44

बीएसपी

2,29,46,182

0

टीएमसी

2,12,59,681

34

एसपी

1,86,72,916

5

एआईडीएमके

1,81,15,825

37

सीपीएम

1,79,86,773

9

टीडीपी

1,40,94,545

16

एएपी

1,13,25,635

4

 

जब मैंने यह सब अपने जर्मन मित्रों को बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि जर्मन चुनाव-व्यवस्था में यह संभव नहीं होता। जब मैंने पूछा कि क्यों और कैसे तो आयरिस ने बहुत विस्तार से मुझे समझाया। उसने बताया कि यह थोड़ा जटिल अवश्य है लेकिन वह बहुत न्यायसंगत है, बल्कि दुनिया भर की चुनाव-व्यवस्था में सबसे अधिक युक्तियुक्त और न्यायसंगत है-और मुझे उससे सहमत होना पड़ा!

जबकि भारत में हम लोग मत-पत्र पर एक निशान लगाते हैं, जर्मनी में दो लगाए जाते हैं। पहले वे चुनाव में शामिल पार्टियों में से किसी एक पार्टी को, जिसके कार्यक्रमों को वे सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं, वोट देते हैं। उसके बाद वे किसी विशेष स्थानीय उम्मीदवार को वोट देने के लिए एक और निशान लगाते हैं। अगर यह उम्मीदवार चुनाव जीत लेता है तो वह सीधे संसद में पहुँच जाता है। इस तरह वे ऐसे स्थानीय उम्मीदवार को भी चुन सकते हैं, जो उस पार्टी का, जिसे उन्होंने पहले वोट दिया है, नहीं होता।

जब वोट गिने जाते हैं तो पहला वोट यह बताता है कि लगभग 600 सीटों की जर्मन संसद में कितने प्रतिशत सीटें किस पार्टी को मिली हैं।

साथ ही हर इलाके से चुना गया उम्मीदवार भी सीधे संसद में पहुँच जाता है। दूसरे वोट से यह पता चल जाता है।

इस तरह यदि एक पार्टी ने 30% वोट प्राप्त किए हैं तो उस पार्टी को संसद में 30% सीटें प्राप्त होती हैं। ये सीटें उन उम्मीदवारों द्वारा भरी जाती हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों से चुनकर आए हैं। अगर उस पार्टी के पर्याप्त संख्या में स्थानीय उम्मीदवार चुनकर नहीं आए हैं तो बची हुई सीटों को क्रमानुसार उसी पार्टी के चुने हुए उम्मीदवारों से भरा जाता है। इस क्रम की घोषणा चुनावों से पहले ही की जाती है और उसमें ऐसी व्यवस्था होती है कि न्यायसंगत संख्या में हर जर्मन प्रान्त के उम्मीदवार जर्मन संसद में पहुंच सकें।

इसके बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है: क्या हो अगर किसी पार्टी के स्थानीय रूप से जीते हुए उम्मीदवारों की संख्या उस पार्टी द्वारा प्रथम वोट से प्राप्त प्रतिशत के अनुसार निर्धारित सीटों से ज्यादा हो? ऐसी स्थिति में ही 'Uberhangmandate' सीटों यानी अतिरिक्त जनादेश या हाथ उठाकर (overhand) सीटों की व्यवस्था संसद में करना पड़ती है। ये सभी उम्मीदवार भी संसद में जाएंगे और इस कारण दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी उसी अनुपात में संसद में प्रवेश मिल जाता है, जिससे हर पार्टी के सांसदों का कुल प्रतिशत चुनाव में प्राप्त प्रतिशत के बराबर ही बना रहे। इस तरह संसद-सदस्यों की संख्या बढ़ जाती है मगर उनके सदस्यों का प्रतिशत वही बना रहता है।

स्थानीय रूप से जीते हुए सभी उम्मीदवार संसद में जाने के हकदार होंगे। इसके अलावा हर वोट गिने जाने के बाद प्राप्त वोटों की संख्या के अनुपात में उतनी प्रतिशत सीटें हर पार्टी के लिए सुनिश्चित हो जाएंगी।

मुझे लगता है कि यह न्यायसंगत है। मुझे लगता है कि यह भारतीय चुनाव-व्यवस्था से ज़्यादा न्यायसंगत और तार्किक है, यह ज़्यादा जनतांत्रिक है और ज़्यादा लोगों की इच्छाओं और पसंद का प्रतिनिधित्व करती है।