भारत में धर्म एक व्यापार है: यहाँ लाभ के लिए भगवान बना दिए जाते हैं! 5 सितंबर 2011

समाचारों के लिए मैं अखबार पढ़ता हूँ लेकिन कभी-कभी टीवी पर भी समाचार देख लेता हूँ। सन 2011 में चले अन्ना हज़ारे के आंदोलन को मैंने थोड़ा-बहुत टीवी पर देखा है। अन्ना हज़ारे स्टेज पर बैठे हैं और उनके सामने भीड़ जमा है और उनमें से कुछ लोग उनकी आरती उतार रहे हैं। यह तमाशा देखकर मुझे बड़ी हंसी आई। क्या अब अन्ना हज़ारे भी भगवान बन गए हैं? क्या उन्होंने लोगों से कहा है कि उनकी आरती उतारो? मुझे लगा, नहीं, वे नहीं चाहते; बल्कि वे इस तमाशे को देखकर झुँझला रहे होंगे। फिर लोग किसी व्यक्ति के न चाहते हुए भी उसके भक्त कैसे बन जाते हैं?

कुछ दिनों बाद मैंने अखबार में एक आलेख पढ़ा और मेरी आँखें खुल गईं: पूजा कराने के लिए अन्ना हज़ारे को साक्षात उपस्थित रहने की भी ज़रूरत नहीं है।

1 सितंबर के दिन देश भर में गणेश चतुर्थी मनाई गई। इस दिन, माना जाता है कि गणेश भगवान का जन्म हुआ था। हिन्दू बहुमत वाला देश होने के कारण भारत में यह त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है और कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, गणेश की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं, जिन्हें विशाल पंडालों में सजाकर रखा जाता है और 10 दिन तक रोज़ उनकी पूजा की जाती है। पंडाल में ही बहुत पैसा खर्च करके विशाल झाँकियाँ सजाई जाती हैं और आसपास बहुत सी दुकानें लगी होती हैं, जिसमें खाने-पीने की वस्तुओं के अलावा कई फ़ैन्सी चीज़ें बिकती हैं। लोग बड़ी संख्या में इन झांकियों को देखने आते हैं और ख़रीदारी करते हैं। आलेख से पता चला कि इस बार गणेश के अलावा पंडालों में अन्ना हज़ारे की मूर्तियाँ और चित्र भी सजाए गए थे। रोज़ गणेश के साथ उनकी भी पूजा हो रही है, उनके नाम का प्रसाद बांटा जा रहा है! और निश्चय ही, वहाँ टीशर्ट बिक रहे हैं, जिन पर अन्ना हज़ारे के चित्र अंकित हैं और गांधी टोपियाँ भी।

मैंने हिन्दू धर्म के लचीलेपन का ज़िक्र पहले भी किया है और यहाँ आप पुनः देख सकते हैं कि उन्हें थोड़ा-बहुत बदलने में, कुछ नया करने में और अपने आयोजनों में, रस्मों-रिवाजों में और यहाँ तक कि कर्मकांडों में और पूजा-अर्चना में भी परिवर्तन करने में कोई परेशानी नहीं होती। पंडे-पुरोहित और आयोजक दरअसल एजेंट का काम करते हैं, धर्म उनका व्यापार है, ये टेंट और पंडाल उनकी दुकानें हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि आज बेचने के लिए वे एक नया सामान लेकर आए हैं: अन्ना हज़ारे! उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए कोई न कोई काम करना होगा, कुछ न कुछ बेचना होगा और अगर वे अपने ग्राहकों को अन्ना हज़ारे की मूर्ति और उनके चित्रों से आकर्षित कर सकते हैं तो वे क्यों न करें! लेकिन मैं मानता हूँ कि यह मानव-पूजा है और पूरी तरह गलत और हानिकारक है।

मैं जानता हूँ कि बहुत से गुरु और स्वामी मानव-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं, भले ही वे यह बात उतनी स्पष्टता से नहीं कहते, जितनी स्पष्टता से मैं कह रहा हूँ। इसी कारण मैं एक बाबा, बाबा रामदेव के राजनैतिक विचारों का विरोध करता हूँ। वे देश की राजनीतिक व्यवस्था बदलना चाहते थे, जिसमें इस वक़्त संसद के पास राष्ट्रपति की तुलना में ज़्यादा अधिकार हैं। वे चाहते थे कि अमरीकी व्यवस्था की तरह भारत में भी राष्ट्रपति के पास ज़्यादा अधिकार हों। रामदेव राजनीतिक जीवन में आगे बढ़ते हुए एक दिन राष्ट्रपति बनना चाहते थे। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर वे बन जाते हैं तो क्या होगा। भारत एक धार्मिक राष्ट्र है और बहुत से लोग धर्म और साधू-संतों को लेकर बहुत भावुक और कट्टर हो जाते हैं। अगर वे राष्ट्रपति बन जाते हैं तो उनकी ऐसी पूजा होगी जैसी पहले किसी की नहीं हुई होगी!

दुनिया भर के इतिहास में ऐसे उदाहरण इस बात को बार-बार रेखांकित करते हैं कि मानव-पूजा कभी भी लाभप्रद नहीं रही और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे सैकड़ों नाम गिनाए जा सकते हैं लेकिन मुझे विश्वास है कि आप समझ रहे होंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ और उनके नाम यहाँ लिखने की ज़रूरत नहीं है। अन्ना हज़ारे पहले ही ऐसे लोगों से घिरे दिखाई देते हैं, जो मानव-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं और मुझे लगता है कि उन्हें बहुत सतर्क रहना चाहिए। वह उनके मकसद को ही कमजोर कर सकता है क्योंकि मानव-पूजा खुद ही एक भ्रष्टाचार है!

मुझे गलत मत समझिए। मैं इस पूजा के लिए अन्ना हज़ारे को दोष नहीं देता बल्कि उनके आसपास उन्हें घेरे हुए लोगों की बात कर रहा हूँ और उससे अधिक उन धन-पिपासु धार्मिक लोगों की, जो उनकी लोकप्रियता को भुनाकर पैसा कमाना चाहते हैं। ऐसा न करें! यह ठीक नहीं है और निश्चय ही वे ऐसा नहीं चाहते होंगे। अपनी पूजा कराने के लिए उन्होंने यह आंदोलन नहीं शुरू किया था। उन्हें अन्ना ही बने रहने दीजिए, ईश्वर मत बनाइए। वे भले व्यक्ति हैं और उन्हें एक भला इंसान ही बना रहने दें। उनकी पूजा न करें। उन्होंने आपको नींद से जगाया है, आपको एक अच्छे काम के लिए प्रेरित किया है और अब यह आपकी जिम्मेदारी है कि उस काम को अंजाम तक पहुंचाएँ। मैंने उनके समर्थन में एक पत्र भी लिखा था और एक पत्र प्रधानमंत्री को भी लिखा था कि अन्ना भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के महज एक प्रतीक हैं। यहाँ तक कि मैंने उनके विरोधियों से भी कहा था कि कृपा करके इस आंदोलन का समर्थन करें क्योंकि यह किसी व्यक्ति का आंदोलन नहीं है बल्कि देश को भीतर से खाए जा रहे भ्रष्टाचार के विरोध का आंदोलन है। अब यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इस काम को आगे बढ़ाएँ। अगर आप सब कुछ उन्हीं पर छोड़ देंगे और इसे एक तरह का धर्म बना देंगे और उन्हें इस धर्म का ईश्वर मान लेंगे तो इस आंदोलन की मूल भावना का अंत हो जाएगा!

यह अच्छी बात है कि मीडिया भी इस आंदोलन का समर्थन कर रहा है और उसे अच्छा कवरेज दे रहा है। इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए मैं उनका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहता हूँ कि अब उन्हें शांति के साथ रहने दीजिए! आपको उनकी हर बात का बखान करने की ज़रूरत नहीं है, जैसे वे कोई दैवी शक्ति हों। वे कैसे नहाते हैं, कैसे खाते हैं आदि का ब्योरा देते रहेंगे तो आप लोगों के लिए एक साधु-महात्मा का प्रतिरूप गढ़ देंगे! वे धर्मगुरु नहीं हैं! आपने उनका समर्थन करके एक आंदोलन को मजबूत किया है मगर अब आपका कर्तव्य है कि ऐसा कोई काम न करें कि लोग उन्हें देवता या साधु-संत मानने लगें। मैंने उनका और उनके आंदोलन का समर्थन भ्रष्टाचार समाप्त करने के मकसद से किया था, उन्हें भगवान बनाने के लिए नहीं।

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