लेखकों: जब कोई आपकी रचना की नक़ल करे तो सम्मान महसूस करें! 1 सितम्बर 2014

क्या आप लेखक हैं? भले आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हुई हो, हो सकता है आप ब्लॉग-राइटर भी न हों, सिर्फ आपकी लिखने में रुचि भर हो-और अपना लिखा कभी-कभार लोगों तक पहुँचा भर देते हों? हाँ? तब आपने इसका अनुभव अवश्य किया होगा, जिसके बारे में आज मैं यहाँ लिखने जा रहा हूँ: अर्थात आपके अत्यंत कुशल, मजेदार और आज तक न देखे गए सर्वथा मौलिक लेखन की शर्मनाक चोरी।

जी हाँ, यह अक्सर होता है। अतीत में भी यह होता रहा है और यह हमेशा होता रहेगा-लेकिन इसके तरीके बदलते रहेंगे! इस दौरान मुझे इसका पर्याप्त अनुभव हो चुका है!

जब मैं भारत में प्रवचन करता था, उस समय भी लोग मेरे व्याख्यानों की सफलता देखकर वैसे ही प्रवचन करना चाहते थे। लेकिन किस तरह? उसका सबसे अच्छा तरीका था- नोट्स बनाइये और खुद वैसा ही कीजिए! पुराने समय में- ऐसा कहते हुए लग रहा है जैसे मैं काफी वृद्ध हो चुका हूँ लेकिन दरअसल इस बीच तकनीक ने बहुत अधिक विकास कर लिया है! टेप-रिकॉर्डर हुआ करते थे, जिसमें व्याख्यान रिकॉर्ड करके लोग उसके टेप बेचते थे। और बहुत से कथावाचक कैसेट से सुनकर, घर बैठकर उस व्याख्यान को उसके लहजे और भावनात्मक उतार-चढ़ाव सहित शब्दशः याद कर लेते थे। उसके बाद, निश्चित ही, कई लोग हो सकते थे, जो हूबहू मेरी तरह प्रवचन कर सकते थे। परन्तु अवश्य ही वे प्रवचन समाप्त करते ही तुरत-फुरत स्टेज से भाग खड़े होते होंगे, जिससे कोई उनसे उस विषय पर कोई प्रश्न न कर सके! क्योंकि वे एक का भी उत्तर नहीं दे सकते थे!

उस वक़्त भी नहीं जानता था- और अब भी नहीं जानता कि कौन मेरे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन ऑनलाइन आपको कभी-कभी शब्दों के ऐसे टुकड़े या समूह या पूरे के पूरे वाक्य पढ़ने को मिल जाते हैं, जिनसे आपको एहसास होता है कि आपने उन्हें पहले भी कहीं देखा या पढ़ा है। आप उन्हें पढ़ते हैं और आपको लगता है, 'मैं पूरे मन से इनसे शब्दशः सहमत हूँ!' और जब आप कुछ आगे बढ़ते हैं तो कह उठते हैं, 'अरे वाह! यह तो ऐसा है जैसे मैंने ही लिखा हो!' और कुछ पलों बाद ही आपकी समझ में आ जाता है, 'अरे भई, यह तो मेरा ही लिखा हुआ है!' सिर्फ एक पंक्ति नहीं, दो नहीं, पूरा ब्लॉग ही, 600 या उससे ज़्यादा शब्द!

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि क्या मुझे इस बात पर खुश होना चाहिए कि वे मेरा लिखा जस का तस मार ले गए- कि सावधानी पूर्वक रचे वाक्यों के साथ उन्होंने कोई छेड़छाड़ नहीं की, यह दावा करते हुए कि यह उनका खुद का लिखा हुआ है, बिना जाने-बूझे बीच-बीच में अपना कुछ जोड़ा नहीं!

एक बार अमेरिका में किसी ने मुझसे एक किताब की भूमिका लिखने को कहा। मैंने लिख दिया। जब मुझे उसकी प्रति मिली तो मैंने देखा, नाम तो मेरा है मगर नीचे लिखे शब्द मेरे नहीं हैं! शायद मुझे गर्व होना चाहिए कि मैं इतना लोकप्रिय हो गया हूँ कि दुनिया भर की उक्तियों को मेरे नाम से छाप दिया जाए। उसने मेरे द्वारा लिखा प्रस्तावना बदल दिया था और उसमें अपनी तरफ से भी काफी कुछ जोड़ दिया था! और किताब में अन्दर बहुत से मेरे वक्तव्य जैसे के तैसे अथवा थोड़ी छेड़छाड़ के साथ उसने अपने नाम से छाप दिए थे! अब किताब के साथ साथ मेरे भावों का रचयिता भी वही बन बैठा था!

खैर, किसी भी लेखक की यह कड़ुवी त्रासदी है। लेकिन फिर मुझे लगता है कि इसे मुझे एक चैरिटी का ही काम मानकर भूल जाना चाहिए: हाल ही में एक फेसबुक मित्र से मेरी झड़प हो गई, जिसके प्रोफाइल पर बिना मेरे नाम के या मेरे पृष्ठ या मेरी वेबसाइट की लिंक के लगातार मेरी टिप्पणियाँ दिखाई दे रही थीं। पहले तो पकड़े जाने पर वह शर्मिंदा हुआ और बदलने के लिए राज़ी हो गया। दूसरी बार उसने माफ़ी मांगी और बोला, 'यह मेरी आदत बन चुकी है'। लेकिन तीसरी बार उसने वास्तविकता बता ही दी:

"स्वामी जी जबसे मैं आपका लिखा अपनी प्रोफाइल पर पोस्ट करने लगा हूँ तबसे लोग मुझे भी समझदार समझने लगे हैं!" अपने साथी की अच्छी इमेज बनाने के लिए थोड़ी सी चैरिटी? 🙂

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