स्पष्ट है कि पिछले कुछ दिनों के ब्लॉग्ज मेरे मन में आ रहे विचारों का प्रतिबिंब हैं। जब मैं अपने जीवन में आए बहुत से परिवर्तनों के विषय में सोचता हूँ तो पाता हूँ कि बहुत से ऐसे लोग हैं जो खुद भी मेरे साथ थोड़ा-थोड़ा बदलते रहे हैं या हम लोग अब भी आपस में वैसा ही स्नेह रखते हैं, भले ही हमारे बीच विचारों की बहुत चौड़ी खाई निर्मित हो चुकी है। मैं उन सभी के संबंध में सोचकर बहुत खुश होता हूँ।
जब मैं अपने परिवार पर नज़र दौड़ाता हूँ तो मेरे गर्व की सीमा नहीं रहती कि मेरे जीवन में आए इन बड़े परिवर्तनों के वे भी साझीदार बने! उन्होंने खुद अपने जीवनों को बदला, धर्म से विलग हुए और कर्मकांडों और धर्मशास्त्रों को त्यागने का साहस दिखाया। मेरे माता-पिता ने, यहाँ तक कि मेरी नानी ने भी, जिनके लिए धर्म उनके जीवन का हिस्सा था, अपनी बहुत सी आदतों और आस्थाओं को इस तरह तिलांजलि दे दी कि देखकर भी अविश्वसनीय लगता है। अगर किन्हीं बिन्दुओं पर वे सहमत नहीं होते थे तो भी वे मेरे विचारों का और मेरे विपरीत निर्णयों का हमेशा स्वागत ही किया करते थे।
अपने भाइयों के विषय में यही कहूँगा कि परिवर्तन की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वे हमेशा मेरे साथ रहे। मैंने किसी से नहीं कहा कि मेरे साथ वे भी अपने विचारों को परिवर्तित करें। मेरे भीतर क्या चल रहा है, इस बारे में मैं हमेशा सबको बता देता था और वे मेरे अनुभवों के प्रत्यक्ष साक्ष्य थे और यह बात मुझे छू जाती थी। मेरे अनुभवों को जीते हुए, उनके बारे में विचार करते हुए उनका सोच और उनकी अनुभूतियाँ भी बदल रहे थे।
और अंत में मेरी पत्नी, रमोना। जब हमारी मुलाक़ात हुई, हम दोनों में कोई समानता नहीं थी। उस समय हम जो भी थे, अब बहुत बदल चुके हैं और मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ कि जहां एक तरफ उसके बदलने का कारण मैं रहा हूँ वहीं, उसी अनुपात में मेरे बदलने में उसकी भूमिका रही है। एक वही है, जहां मैं अपने दिल को पूरी तरह खोलकर रख देता हूँ और उसके दिल की गहराइयों से निकलती बातों को सुनता हूँ।
जहां तक मित्रों का सवाल है, मैंने उनमें भी बदलाव देखा है। निश्चय ही वे अपने तरीके से बदले हैं और मैं अपने तरीके से लेकिन अनोखी बात यह है कि मेरे कई मित्र ऐसे भी हैं जो मुझमें आए परिवर्तनों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं बल्कि उनका समर्थन भी करते हैं।
मेरा पहला जर्मन मित्र, माइकल जिसके साथ मैंने घंटों, ईश्वर और धर्म सहित, हर विषय पर चर्चा की है। जब मैंने उसे एक दिन बताया कि मैं अब ईश्वर पर आस्था नहीं रखता तो हमारे बीच बेहद रोचक वार्तालाप चल निकला और उसने बताया कि न्यूरोसाइन्स इस बात की परवाह नहीं करता कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। दरअसल वह मनोचिकित्सक है और न्यूरोसाइन्स में उसकी स्वाभाविक रुचि है।
मेरे प्रिय मित्र, थॉमस और आयरिस, जिनके साथ मिलकर हमने पहले अनगिनत धार्मिक समारोह किए थे और जो खुद भी बहुत से ढोंगी गुरुओं का अनुभव प्राप्त कर चुके थे। हम सबने आपस में अपने-अपने अनुभव साझा करते हुए एक साथ अपने अतीत को त्यागने की ओर कदम बढ़ाए थे, नई प्राथमिकताओं और जिम्मेदारियों की ओर। इन वर्षों में लगातार अटूट प्रेम-बंधन में बंधे हुए।
दुनिया भर में मेरे ऐसे ही कई और भी मित्र हैं, जिन्होंने मुझे बार-बार अपने घर बुलाया, अपने दिल में जगह दी और जो हजारों मील दूर होने के बावजूद लगातार मेरे संपर्क में बने रहे और इस तरह मेरी परिवर्तन यात्रा के साझीदार बने।
लेकिन अधिकतर लोग मेरे इतने निकट कभी नहीं रहे और बहुत से लोगों ने मुझसे पूरी तरह किनारा कर लिया। मुझे खुशी है कि मैं इन सब बातों को भी स्वीकार कर सका और उनसे, जो मेरे आसपास हैं, तहे-दिल से प्रेम कर सका!
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