दोस्त ने पार्टी में नहीं बुलाया-ठीक है, कोई बात नहीं! बल्कि अच्छा ही है! 23 अक्तूबर 2013

आज आपको मैं एक ऐसी घटना के बारे में बताना चाहूंगा, जो पुनः यह स्पष्ट करती है कि कैसे धर्म, ईश्वर और उससे जुड़ी हुई चीज़ों पर विश्वास न करने पर जीवन में बहुत से परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है।

हमारे एक नजदीकी पारिवारिक मित्र ने हाल ही में नया मकान बनवाया। जब घर का निर्माण चल रहा था, मैं और मेरे परिवार के सदस्य वहां गए भी थे और उत्सुक थे कि कब निर्माण कार्य पूर्ण होता है और वे यहाँ रहने आते हैं, क्योंकि वह नया मकान हमारे बिल्कुल पड़ोस में ही बन रहा था। आखिर गृहप्रवेश का वह दिन आया और उन्होंने गृहप्रवेश के पूजन और रिशतेदारों, मित्रों के लिए सामूहिक भोजन का आयोजन किया।

भारत जैसे धर्मप्रधान देश में नए घर में प्रवेश करते समय ग्रहप्रवेश की पूजा की जाती है और लोगों को पूजा में और पूजा के बाद होने वाले प्रीतिभोज में शामिल होने का न्योता दिया जाता है। उस परिवार ने हमें उनके ग्रहप्रवेश की तारीख बताई। मेरी पत्नी बड़ी खुश हुई और परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ उस आयोजन में शिरकत करने की मंशा से तैयार होने लगी। उन्होंने इस अवसर पर देने के लिए उपहार भी तैयार कर लिया और आश्रम में आए अपने मित्र को भी बताया कि वे लोग कुछ समय आश्रम में उपलब्ध नहीं होंगे क्योंकि उन्हें गृहप्रवेश की पार्टी में जाना है।

इस तरह के आयोजनों में मेरी बहुत रुचि नहीं होती मगर मेरी पत्नी उन्हें पसंद करती है। क्योंकि हमें तारीख का पता था मगर किस समय आयोजन होने वाला है यह पता नहीं था, मेरी जर्मन पत्नी ने एक दिन पहले मुझसे पूछा कि उसे किस वक़्त उनके यहाँ पहुँचना चाहिए। मैंने उससे कहा कि हमारे बीच इतने औपचारिक संबंध नहीं है कि लिखित निमंत्रण-पत्र भेजे जाएँ और जब भी आयोजन होगा वे हमें बुला लेंगे और उस वक़्त तुम लोग चले जाना!

वे इंतज़ार करते रहे-लेकिन कोई बुलाने नहीं आया। सारा दिन व्यतीत हो गया, वे गेट से बाहर हलवाइयों को उनके यहाँ बर्तन और खाद्य सामग्री ले जाते देखते रहे, आयोजन की गहमागहमी उन्हें साफ नज़र आती रही, मगर किसी ने उनसे आने के लिए नहीं कहा।

शाम को उस पड़ोसी परिवार के एक सदस्य का फोन आया। उसे हम भी जानते थे और उसके साथ हुई बातों का लब्बो-लुबाव कुछ इस तरह था कि इस खयाल से कि हम लोग शायद धार्मिक आयोजन पसंद नहीं करते, हमें जानबूझकर बुलाया ही नहीं गया है। हम धार्मिक कर्मकांडों में विश्वास नहीं करते, हम नास्तिक हैं-इसलिए उन्होंने यही उचित समझा कि हमें ऐसे आयोजन में बुलाया ही न जाए।

भारत जैसे धार्मिक देश में सभी अवसर किसी न किसी धार्मिक कर्मकांड और रस्म-रिवाजों से संबन्धित होते हैं। हर आयोजन और समारोह में, चाहे वह गृहप्रवेश हो, नामकरण हो, विवाह या अंतिम-क्रिया हो, धर्म सारे आयोजन का सबसे प्रमुख हिस्सा होता है। विशेषकर धार्मिक परिवार ऐसे कर्मकांडों और रीति-रिवाजों का बड़ा ध्यान रखते हैं और निश्चय ही उस दिन के समारोह में भी यही सब मुख्य रूप से होना था। शायद हवन वगैरह भी होने वाला था और एक अधार्मिक के रूप में, ऐसे आयोजनों में हमारी वहाँ कोई आवश्यकता नहीं समझी गई थी।

स्वाभाविक ही, यह अनुभव मेरे लिए भी प्रीतिकर नहीं था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हमारी अपावन उपस्थिति उस आयोजन के पवित्र वातावरण को नष्ट कर देगी। खैर, उनके लिए कारण कुछ भी रहा हो, हमें बुलाया नहीं गया था। भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील मनुष्य होने के नाते मेरे लिए यह बर्दाश्त करना मुश्किल था कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसे हम अपने मित्र से भी ज़्यादा समझते थे, हमें अपनी खुशियों में सहभागी बनाना नहीं चाहता। स्वाभाविक ही, सिर्फ मैं ही नहीं, परिवार के सारे सदस्य, जिन्होंने वहाँ शामिल होने के लिए बड़े उत्साह के साथ तैयारियां की थीं, बड़े निराश और दुखी हुए।

हम इस विषय पर बात करते रहे मगर अंततः मैं ऐसी भावनाओं को ज़्यादा देर तक मन में नहीं रखता और न ही उन्हें खुद पर हावी होने का मौका देता हूँ। मैं घटनाओं के सकारात्मक पहलुओं को देखने की कोशिश करता हूँ और ये सकारात्मक बातें मेरे सामने स्पष्ट थीं: हमें इस बात पर खुश होना चाहिए कि लोग हमारे बारे में बेहतर तरीके से जानने लगे हैं। वे समझ गए हैं कि हमारे विचार क्या हैं और अब धार्मिक आयोजनों में हमें नहीं बुलाएँगे। स्वाभाविक ही, इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि धार्मिक आयोजनों के बाद होने वाले प्रीतिभोज में, समारोहों में और नाच-गाने में भी आपको न बुलाया जाए, लेकिन मेरी नज़र में वह भी खुश होने की ही बात है।

हमें ऐसी घटनाओं के बाद बहुत हल्का महसूस करना चाहिए क्योंकि वह आपको बहुत सी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त करती हैं। जब मैंने इस घटना को फेसबुक पर शेयर किया तो हमारा वह पड़ोसी परिवार दुखी हो गया-लेकिन मैं उसके बारे में कल आपको बताऊंगा।

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