मैं कैसे धर्म, अंधविश्वास और ईश्वर से कैसे मुक्त हुआ? – 13 फरवरी 2013

मेरे विचार

यह सप्ताह मैंने उन लोगों के बारे में लिखते हुए शुरू किया था जो दावा करते हैं कि वे धार्मिक हैं मगर अंधविश्वासी नहीं, और उसे आगे बढ़ाते हुए उन लोगों के बारे में लिखा जो धर्म को नहीं मानते मगर ईश्वर पर विश्वास करते हैं। मैंने ज़िक्र किया था कि कैसे ये दोनों रवैये, ऐसे विश्वासों को पूरी तरह त्याग देने की दिशा में उठाए गए छोटे-छोटे कदम सिद्ध हो सकते हैं। मैं हमेशा अपने व्यक्तिगत अनुभवों को आधार बनाकर अपने ब्लॉग लिखता हूँ- और जहां तक इस विषय का प्रश्न है मैं बहुत लंबे और गंभीर अनुभवों से गुज़र चुका हूँ। आज मैं उस परिवर्तन के विषय में लिखना चाहूँगा जो पिछले दिनों मेरे द्वारा लिखे जा रहे ब्लोगों का आधार है।

मैं धार्मिक माहौल में पैदा हुआ और उसी माहौल में मेरा लालन-पालन भी हुआ। समाज में हर तरफ धर्म व्याप्त था और हमारे घर में भी उसकी उपस्थिति ठीक उतनी ही थी। शायद कुछ ज़्यादा ही, क्योंकि मेरे पिता एक धर्मोपदेशक थे और धर्मग्रंथों के विषय में सामान्य लोगों से ज़्यादा जानकारी रखते थे। वृन्दावन जैसी जगह में बचपन गुजारते हुए और वह भी एक धर्मोपदेशक के पुत्र के रूप में बड़े होते हुए स्वाभाविक ही मैं ईश्वर पर विश्वास करता था। और यह भी बहुत संभव था कि मैं खुद भी धर्मोपदेशक बन जाता, जो कि मैं बन भी गया।

उस वक़्त मेरी धार्मिकता का क्या स्तर था? स्वाभाविक ही मैं बहुत धार्मिक था। आज के हिसाब से मैं थोड़ा अंधविश्वासी भी था, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं। इसके बावजूद कई बातें जिन पर और लोग विश्वास करते थे मेरे लिए मूर्खतापूर्ण अंधविश्वास थे। जैसे, मुझे इस बात से कोई डर नहीं लगता था कि कोई मुझ पर जादू-टोना कर सकता है। अपने अंधविश्वास का कोई उदाहरण देना हो तो वह यह था कि मैं भी यह मानता था कि बाँयी आँख फड़कने पर कोई न कोई अशुभ बात होती है। किसी धार्मिक पुस्तक में यह लिखा है और आपने नोटिस किया होगा कि कभी-कभी बाँयी आँख फड़कती भी है। अगर यही बात आपकी दाहिनी आँख या दाहिनी बांह के साथ हो तो वह शुभ होता है, ऐसा माना जाता है। अगर आप ऐसी पुस्तकें बार-बार पढ़ेंगे और उस पर प्रवचन भी देंगे तो यह स्वाभाविक है कि उस पुस्तक में बताई गई बातों पर आपको विश्वास भी होने लगता है! संयोग से ऐसा कभी-कभी ठीक भी हो सकता है। जब कई बार ऐसा नहीं होता था तो मैं उलझन में पड़ जाता था। बाद में किसी समय, मेरे लंबे गुफा प्रवास के बाद मुझे महसूस हुआ कि गुरु और शिष्य के बीच दूरी अनुचित है और यह भी कि जातियों के बीच की इतनी बड़ी खाई जो धर्म द्वारा पैदा की गई है और धर्मग्रंथ जिसका प्रचार करते हैं, वह भी बहुत अनुचित है। उसके बाद मैंने धर्म की इन बातों को मानना बंद कर दिया लेकिन धार्मिक व्यक्ति अब भी बना रहा और हर रोज़ बिना नांगा पूजा और यज्ञ करना जारी रखा।

यह प्रक्रिया मुझे कुछ आगे अवश्य ले गई और मैंने अक्सर धर्मशास्त्रों की कई बातों पर और धर्म पर भी, प्रश्न करना शुरू कर दिया। और फिर धीरे-धीरे मैं ऐसी स्थिति में पहुँच गया जब रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के लाभों पर शंकालु हो गया। तभी मेरे पैर में चोट लग गई और मैंने पूजा-पाठ और कर्मकांडों में व्यस्त अपनी व्यक्तिगत दिनचर्याओं का परित्याग कर दिया और उसके बाद, कुछ और आंतरिक परिवर्तनों के पश्चात, अंततः दूसरे सभी रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों को भी तिलांजलि दे दी।

इसी दौरान कोई वक़्त रहा होगा जब मैं हर तरह से अ-धार्मिक हो गया। लेकिन मैं तब भी ईश्वर पर भरोसा करता था! मुझे विश्वास था कि हमारे चारों तरफ कोई ऊर्जा, विशाल और सारे संसार से परे कोई हस्ती होती है और हम उसके अंश हैं। आप में से बहुत से लोग जो बहुत अर्से से मेरी डायरियाँ पढ़ रहे हैं, मेरे भीतर क्रमशः आए इस परिवर्तन को, मेरी शुरू की अवस्था से लेकर आज मैं जिस जगह खड़ा हूँ, नोटिस किया होगा।

मुझे महसूस होता है कि मैंने किसी ‘ऊर्जा’ की, उस उच्च हस्ती की, आंतरिक आवश्यकता निरस्त कर दी है। मैंने विज्ञान का कोई कोर्स नहीं किया जिसकी वजह से मैं वह समझ पाया जिसे पहले नहीं समझा था। मैं किसी एक घटना पर उंगली नहीं रख सकता कि इसके कारण मुझमें यह परिवर्तन आया। ऐसा भी नहीं है कि किसी के साथ कोई वार्तालाप किया, या किसी किताब का कोई अंश जिसे मैंने पढ़ा और अलग तरह से सोचने पर मजबूर हो गया। यह सब बहुत धीमी गति से सम्पन्न हुआ और आज मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि मैं धर्म पर बिल्कुल भरोसा नहीं करता, कि मैं बिल्कुल अंधविश्वासी नहीं हूँ और यह भी कि मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं करता।

मैं प्रेम में विश्वास करता हूँ, मैं यह महसूस करता हूँ कि मैं इस धरती का एक हिस्सा हूँ और यहाँ के सभी लोगों से मेरा संबंध है क्योंकि हम सब उसी हवा में सांस ले रहे हैं। बहुत सी बातों के स्पष्टीकरण में मैं पहले ‘ऊर्जा’ का हवाला देता था मगर अब उनके लिए किसी मनोवैज्ञानिक तर्क का उपयोग करता हूँ। बहुत सी सच्चाइयाँ जस की तस हैं मगर मेरा मन उन्हें बदले हुए संदर्भों में देखना सीख गया है।

हर एक के लिए यह एक अलग प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है। धर्म से विलग होने की मेरी कहानी 15 वर्ष लंबी है। यह परिवर्तन एकाएक नहीं होता और इसमें भिन्न-भिन्न तरह के कई अनुभवों से गुज़रना पड़ता है लेकिन मैं सोचता हूँ कि यह एक सही तरीका है और अधिकतर धार्मिक व्यक्ति किसी न किसी दिन इसी राह से गुजरेंगे। और जब ऐसा होगा तब, मुझे विश्वास है कि, उन्हें मेरा लेखन उपयोगी और रोचक लगेगा। शायद उसी रास्ते से गुज़र चुके एक व्यक्ति से प्राप्त थोड़ा सा प्रेरणास्पद लेखन।

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