मेरी मित्रताएँ प्रेम पर आधारित हैं न कि समान विचारों पर – 28 जून 2013

मेरे विचार

जीवन की कुछ घटनाओं ने और एक ईमानदार जीवन गुजारने के पक्के इरादे ने मुझे एक प्रतिष्ठित गुरु और कट्टर आस्तिक से नास्तिक में परिवर्तित कर दिया। मेरे कदम परिवर्तन के साथ चले और मैं अपनी भावनाओं और विचारों में परिवर्तन के अनुरूप अपने व्यवहार में भी परिवर्तन लाता चला गया। मैंने समझौते नहीं किए बल्कि इस बात का ध्यान रखा कि मेरे विचारों, वचनों और मेरे व्यवहार में कोई अंतर न हो। अपनी इस यात्रा में मैंने बहुत कुछ खोया मगर बहुत कुछ पाया भी। कई दोस्तों को मैंने खो दिया जो मेरे विचारों में परिवर्तन को बर्दाश्त नहीं कर सके। लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरे असली मित्र मेरे साथ फिर भी बने रहे- मजेदार बात यह कि उनमें से कई मेरे परिवर्तित विचारों से सहमत नहीं हैं!

जब मैंने इस बात को सबके सामने रखा तो जवाब में मुझसे कई लोगों ने कहा कि वास्तविक मित्रता समान विचारों वाले लोगों के बीच ही संभव है। इस बात ने मुझे मित्रता, समान विचार, किस बिना पर मित्र हुआ जा सकता है और मैं स्वयं क्यों उन लोगों का मित्र हूँ जो मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं, आदि विषयों पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

अपने पिछले जीवन में, जब मैं गुरु हुआ करता था, मेरे शिष्यों में समाज के हर वर्ग के लोग हुआ करते थे: झोपड़पट्टी वालों से लेकर अरबपति तक। लेकिन जब मेरे विचारों में परिवर्तन आया और मैं आस्तिक नहीं रह गया, लोगों की दिलचस्पी मुझमें कम होने लगी। क्योंकि मुझसे जुड़े रहने का कारण ख़त्म हो चुका था, वे मुझे छोड़कर चल दिए। उन्हें अब मेरी कोई ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने दूसरा गुरु खोजना शुरू कर दिया जो उनके विश्वासों को सहारा दे सके। वे धार्मिक कारणों से मुझसे जुड़े हुए थे। वे जुड़े हुए थे क्योंकि हमारे विचार मिलते थे।

कई मित्रों के संदर्भ में साथ ऐसा हुआ। मेरे भीतर विचारों के परिवर्तन को वे स्वीकार नहीं कर सके। वे मुझसे बहुत दूर चले गए और मैंने उन्हें जाने दिया। कुछ मामलों में मुझे दुख भी हुआ लेकिन फिर मुझे समझ में आया कि वे, दरअसल, मेरे सच्चे मित्र थे ही नहीं। क्यों? क्योंकि मैं अपने मित्रों से प्रेम के ज़रिए जुड़ना चाहता हूँ, विचारों की समानता के कारण नहीं।

अगर किसी विशेष कारण से आपने किसी से दोस्ती की है तो उन कारणों के न रहने पर आपकी मित्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस समय, इस दौर में, इस दुनिया में मुझे लगता है कि मित्रताएँ ज़्यादातर किसी न किसी प्रयोजन से, किसी न किसी मतलब से की जाती हैं। वास्तविक मित्र मिलना मुश्किल हो गया है। जो व्यक्ति किसी से इसलिए मित्रता करता है कि उसके पास धन है, सत्ता है या प्रतिष्ठा है तो धन, सत्ता या प्रतिष्ठा न रहने पर वह अपने मित्र को छोडकर चल देगा! और कोई व्यक्ति आपके किसी विचार से प्रेम करता है तो उस विचार में परिवर्तन होने पर वह आपको छोड़ देगा!

किसी के विचारों में परिवर्तन होने पर उसके प्रति आपकी भावनाओं में परिवर्तन हो जाए, तो वहाँ प्रेम नहीं होता। मैं जानता हूँ कि मैं इस वक़्त जिस जगह पर हूँ, वहाँ खुश हूँ और अपने आपको बहुत मजबूत महसूस करता हूँ क्योंकि मेरे दिल में वे चमकते हुए रत्न बसे हुए हैं जिन्होंने मेरे मस्तिष्क में हुए परिवर्तन के बाद भी अपने दिल में मुझे बसाए रखा। मेरी माँ, मेरे पिताजी, भाई और बहुत से नजदीकी मित्रों ने कभी नहीं कहा कि मेरे नास्तिक हो जाने के कारण उन्हें मुझसे प्रेम करने में कोई दिक्कत है। उन्हें समस्या नहीं है क्योंकि मेरे लिए उनका प्रेम किसी विचार या विश्वास पर आधारित नहीं है। उनके लिए यह महत्वपूर्ण है कि मैं उनके सामने साक्षात हूँ! मेरे विचारों में परिवर्तन से मेरे प्रति उनके प्रेम में कोई अंतर नहीं आया है। मेरी नज़र में यही सच्ची मित्रता है।

अब इतने सारे परिवर्तनों के बाद मेरे पास वही लोग बचे हैं जो मुझसे कुछ नहीं चाहते, सिर्फ मुझे चाहते हैं। ये लोग मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और मेरे दिल में रहते हैं। वे मेरे प्रेम और मित्रता के पात्र हैं और मैं जानता हूँ कि इस सच्चाई में कभी कोई परिवर्तन नहीं होगा।

Leave a Comment