घिसी पिटी औपचारिकताओं से छुटकारा – 1 अगस्त 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

अपनी जन्मभूमि, भारत और अपनाए हुए देश, जर्मनी के निवासियों में पाई जाने वाली आदतों के बारे में लिखते हुए मैं हमेशा सोचता रहा हूँ कि क्या मैं इन घिसी पिटी आदतों में कहीं फिट होता हूँ या नहीं। मैं नहीं चाहता कि अपने बारे में आपके दिल में कोई गलतफहमी रहे और इसलिए इस बारे में अपने विचार लिखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।

मैं हमेशा से बहुत अनौपचारिक व्यक्ति रहा हूँ और आज भी हूँ लेकिन फिर भी कुछ सांस्कृतिक परम्पराएँ ऐसी होती हैं जो आपके रक्त में रच-बस जाती हैं। इसलिए मेरे अंदर भी कुछ ऐसी आदतें थीं जैसे पहले मैं किसी बात पर 'नहीं नहीं' कहता था और बाद में जब सामने वाला बहुत ज़िद करता था तो उसे स्वीकार कर लेता था। यह नम्र और सभ्य दिखाई देने का एक तरीका है। लेकिन मेरे साथ एक ऐसी घटना हुई जिसने मेरी इस आदत का सदा-सदा के लिए अंत कर दिया। मैं अपनी पहली जर्मन यात्रा के दौरान एक बार अपने सबसे पहले जर्मन मित्र डाक्टर माइकल कोसक के यहाँ गया। वह जानता था कि मैं जर्मनी में नया हूँ इसलिए यह कहते हुए कि "रख लो, तुम्हें कभी भी अचानक ज़रूरत पड़ सकती है" वह मुझे कुछ पैसे देने लगा। अब, वह मुझे पैसे दे रहा है और मैं अपनी भारतीय आदत के मुताबिक 'नहीं, नहीं' कहते हुए मना कर रहा हूँ। यह अच्छा हुआ कि वह मेरे और करीब आया और मेरी हथेली हाथ में लेकर यह कहते हुए पैसे रख ही दिये कि "पैसे लेने से कभी भी इंकार नहीं करना चाहिए, इससे धन की बेईज्ज़ती होती है!" उस दिन से मैंने उसकी बात गांठ बांध ली और फिर कभी न तो मैंने पैसे की बेइज्जती करी और न ही पैसे ने मेरी. 🙂

अब मैं आम तौर पर ऐसे सामाजिक रूप से लोकप्रिय खेलों की (जी हाँ, मैं इसे खेल ही कहूँगा) उपेक्षा ही करता हूँ। मैं जब कोई चीज़ देने का प्रस्ताव रखता हूँ तो सामने वाले के लिए यह विकल्प खुला रखता हूँ कि पहली बार में ले लो या फिर आगे के लिए इस बात को ठीक तरह से समझ लो। मैं बार-बार आग्रह नहीं करता; हाँ, कभी-कभी इतना ज़रूर कह देता हूँ कि मैं बहुत औपचारिकता निभाने वाला व्यक्ति नहीं हूँ।

इसी तरह भोजन करते समय भी बार-बार आग्रह और इंकार का नाटक मुझे पसंद नहीं है। मैं इस मामले में ईमानदार और स्पष्ट रहना चाहता हूँ-अगर मैं और खाना नहीं चाहता तो मैं परोसने वाले को साफ मना कर देता हूँ। एक बार मैं खा रहा था और जो महिला परोस रही थी बार बार मुझसे और लेने का आग्रह करती जा रही थी। कम से कम पाँच बार मना करने के बाद भी उसने भोजन मेरी थाली में रख दिया और फिर मैंने उसे छूट दे दी। वह महिला फिर आई और फिर से मेरी थाली में और खाना रख दिया। आखिर जब पूरी प्लेट भर गई तो मैं खाना छोडकर सीधे उठ खड़ा हुआ! मैं उससे कई बार कह चुका था कि मैं और नहीं खा सकता। बताइये मैं क्या करूं, भोजन भले ही आपका हो परन्तु पेट और शरीर तो मेरा अपना है, और मैं उसके साथ अत्याचार नहीं कर सकता।

मैं पहले ही भारतीय मानक समय के बारे में लिख चुका हूँ और समय की पाबंदी की भारतीय समझ के बारे में भी जो जर्मन्स की समय विषयक धारणा से कोसों दूर है। जर्मनी में अपने काम के दौरान मैंने इसे बहुत अच्छी तरह से समझा और हालांकि मैं खुद कभी भी लेटलतीफ़ नहीं था मगर यहाँ मैंने समय की पाबंदी की अपनी आदत को और तराशा और अब कहीं भी मेरे देर से पहुँचने का सवाल ही उत्पन्न नहीं होता।

विदेश में काफी समय व्यतीत करने के बाद मेरा मन-मस्तिष्क और मेरी आदतें काफी बदल गई हैं और हालांकि पहले भी मैं बहुत औपचारिक नहीं था, अब मैंने अपनी बची-खुची आदतों से भी तौबा कर ली है। अब अक्सर लोगों को यह बताना पड़ता है कि मैं औपचारिकताएँ बरतने का आदी नहीं हूँ।

जब कोई मुझे निमंत्रित करता है तो, जैसा कि मैंने कल के ब्लॉग में भी लिखा था, मैं ईमानदारी के साथ उन्हें उत्तर दे देता हूँ कि मैं वृन्दावन के बाहर बहुत कम निकलता हूँ और इसलिए मैं नहीं आ पाऊँगा। लेकिन अगर वे बार-बार आग्रह करते हैं, जैसे अगर वे पाँच बार कहें कि आपको आना ही पड़ेगा तो फिर मैं थक जाता हूँ अपने अनौपचारिक स्वभाव के विषय में बताते हुए और नम्रतावश परंपरागत आदतों के उस औपचारिक खेल में शामिल होकर उनकी हाँ में हाँ मिला देता हूँ।

अगर आप इसे एक खेल के रूप में लें, जैसा कि मैं अक्सर करता हूँ, तो अपने व्यवहार और उस पर दूसरों की प्रतिक्रिया को बारीकी से देखने में आपको मज़ा भी आएगा। लेकिन सबसे ज़्यादा मज़ा मुझे तब आता है जब सामने वाला भी अपनी सारी औपचारिकताओं को ताक पर रख देता है और मुझसे दिल खोलकर खरी-खरी बात करता है। सौभाग्य से यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि एक बार आप उन औपचारिकताओं से बाहर निकले कि लोग अपना दिल खोल देने के लिए तत्पर हो जाते हैं और खुलकर बात करते हैं। जी हाँ, हर संस्कृति की अपनी कुछ न कुछ विशेषताएँ होती हैं और मैं हर संस्कृति की उन बारीकियों का ध्यान से निरीक्षण और परीक्षण करना पसंद करता हूँ; विशेषकर दो संस्कृतियों की इन विशेषताओं की तुलना करने में मुझे बहुत आनन्द प्राप्त होता है!