किसी दुसरे की ज़िम्मेदारी ओढ़ने की कोशिश भी मत कीजिए- 24 अक्तूबर 2013

कल मैंने बताया था कि कैसे एक मित्र ने अपने गृहप्रवेश के समारोह में मेरे परिवार को आमंत्रित नहीं किया और उससे मैं काफी हद तक उदासीन बना रहा, हालांकि शुरू में मुझे हल्का सा दुख ज़रूर हुआ था। लेकिन कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई-आज मैं आपको उस घटना के चलते पैदा हुए क्रोध, भ्रम और दूसरी भावनाओं के विषय में बताता हूँ।

सभी जानते हैं कि मैं बहुत स्पष्टवादी व्यक्ति हूँ और ज़्यादा देर तक किसी बात को दिल में नहीं रखता। दो दिन बाद जब हमारी भावनाएँ और सारा मामला थोड़ा ठंडा पड़ गया, मैंने संक्षेप में यह कहानी और अपनी भावनाएँ फेसबुक पर शेयर कर दीं। मेरी आदत है कि मैं कभी किसी की पहचान फेसबुक पर ज़ाहिर नहीं करता और इस मामले में भी अपने नियम का पालन करते हुए सिर्फ अपनी भावनाओं का निष्कर्ष ही फेसबुक पर व्यक्त किया।

लेकिन हमारा एक मित्र, जो उस मेजबान का रिश्तेदार था, उस फेसबुक पोस्ट पर बहुत नाराज़ हुआ। फेसबुक पर अपनी नाराजगी ज़ाहिर करते हुए और मेरी नास्तिकता पर, साथ ही फेसबुक पर भी हज़ारों लानतें भेजते हुए उसने उस मेजबान की पहचान ज़ाहिर कर दी, जो मैं बिलकुल नहीं चाहता था। इसलिए मैंने फेसबुक पर उसके कमेन्ट को हटाकर उसे फोन किया और सारे मामले को स्पष्ट करने का आग्रह किया।

संक्षेप में यह कि हमारे उस मित्र ने, जो मेजबान के रूप में उस आयोजन में शामिल हुआ था, मुझसे कहा कि मैंने न्योता न मिलने की बात को गलत ढंग से लिया है और मेजबान का घर इतना छोटा है कि सारे मेहमानों का स्वागत करने में दिक्कत हो सकती थी, और वैसे भी मैं वहाँ आयोजित धार्मिक कार्यक्रम और मिर्च-मसालेदार खाना पसंद नहीं करने वाला था और सबसे ऊपर यह कि कुछ दिन बाद वह मेजबान मुझे अलग से, कुछ ज़्यादा पारिवारिक भोजन के लिए आमंत्रित करने वाला था।

एक हफ्ते बाद मुझे जन्मदिन की मुबारकबाद देते हुए उस मेजबान का फोन आ गया। मगर उस मामले पर अपना स्पष्टीकरण देते हुए उसने बिल्कुल अलग बात बताई। उसने कहा कि उसने किसी को भी बुलाया नहीं था लेकिन सबको आयोजन की तारीख बताई थी। यह बड़ा अजीबोगरीब बयान था- उसके मेहमान यह कैसे जान पाए कि किस समय आना है? क्या यह महज संयोग था कि सभी मेहमान एक समय पर आयोजन में पहुँच गए? अंततः उसे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी। हैरान करने वाली बात यह थी कि उसने इस बात से इंकार किया कि उसने बाद में हमें, अलग से खाने पर बुलाने की बात कही थी और दूसरे स्पष्टीकरणों से भी, जो उस मित्र द्वारा मुझे उसकी तरफ से दिये गए थे।

अब यह स्पष्ट था कि हमारा मित्र उस गलती पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा था जो उसने नहीं, उसके रिश्तेदार मेजबान ने की थी। अगर कोई हमें कुछ दिन बाद खाने पर बुलाना चाहता था तो वह हमें उसी दिन फोन करके बता सकता था। फोन करने में कितना वक़्त लगता है! बाद में उस मित्र से कई बार बात हुई और मैंने उससे कहा कि कोई भी अपने सारे परिवार की और सारे रिश्तेदारों की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है क्योंकि उनके अपने अलग व्यक्तित्व हैं और वे अपने निर्णय खुद लेते हैं, जो, हो सकता है उससे बिल्कुल भिन्न हों, जो उसी परिस्थिति में आप लेते! मैंने उसे यह भी बताया कि मेरे सब भाई और पत्नी तक अपने कामों की ज़िम्मेदारी खुद उठाते हैं!

मेरे मित्र ने मुझसे झूठ बोला था। यह एक अजीब-सा, अनोखा एहसास था, खासकर इसलिए कि झूठ बोलने की उसे कतई आवश्यकता नहीं थी। पहले मुझे न बुलाए जाने का दुख था फिर फेसबुक पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने पर प्रताड़ित होने का और अब यह, कि मुझसे व्यर्थ झूठ बोला जा रहा है।

फिर भी, मेरे अंदर उस मित्र के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है और इस पूरे वाकये के बावजूद हमारी मित्रता पर कोई आंच नहीं आएगी। क्यों? क्योंकि मैं समझ रहा हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया। वह मेरे दुख को कुछ हल्का करना चाहता था और चाहता था कि मेरे और उसके रिश्तेदार मेजबान के बीच कोई कटुता न रहे। यह प्रेम और मित्रता से लबालब कोमल हृदय से की गई मासूम कोशिश थी। मैं जानता हूँ, यह उसका स्वभाव है-दूसरों की गलतियों की अथवा उनके कामों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेना। लेकिन अगर कोई दूसरा भोजन करता है तो उसका पेट नहीं भरने वाला। अगर कोई दूसरा कोई गलती करता है तो उसकी जिम्मेदारी आप नहीं ले सकते! दूसरों की गलतियों का बोझ आप क्यों ढोना चाहते हैं? मुझे अच्छा लगता अगर दूसरे की ज़िम्मेदारी लेने की कोशिश करने की जगह वह सिर्फ इतना कहता: "मुझे पता नहीं, उसने तुझे क्यों नहीं बुलाया"। आखिर, मित्रता इस बात की मोहताज नहीं होनी चाहिए कि आप मुझे अपने हर आयोजन में बुलाएँ ही।

अंत भला तो सब भला! यह कहकर कि यह इतनी बड़ी बात नहीं है, मैंने सारे मामले को रफा-दफा किया। अपनी भावनाएँ और विचार दर्ज करने की गरज से मैंने सोशल मीडिया में इस विषय पर लिखा और अब यहाँ लिख रहा हूँ। इन विषयों पर हमारे विचार और धारणाएँ अलग हो सकते हैं मगर मैं जानता हूँ कि उसके दिल में प्रेम, मित्रता और नेकनीयती हैं- और मैं उससे अभी भी उसी तरह प्रेम करता हूँ।

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