जर्मन भाषा सीखने के लिए 30 साल बाद फिर से ‘स्कूल चले हम!’- 5 अगस्त 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मैं अपनी ज़िंदगी में आए एक परिवर्तन के बारे में आपको बताना चाहता हूँ जिसका मुझ पर दूरगामी असर पड़ सकता है: मैं जर्मन भाषा सीखने के काम में सक्रियता के साथ जुट गया हूँ। जी हाँ! मैंने 30 साल बाद फिर से स्कूल जाना शुरू कर दिया है।

शायद आप लोग जानते होंगे कि पिछले तेरह सालों में मैंने बहुत सा समय जर्मनी में बिताया है। फिर भी, इतना समय गुज़र जाने के बावजूद, जर्मन भाषा पर मेरी पकड़ कमजोर ही है। वैसे, इसकी मुझे कभी बहुत आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। मेरे संपर्क में आने वाले अधिकांश लोग अँग्रेजी बोल और समझ लेते थे। अपने काम के दौरान, आवश्यकता पड़ने पर मैं अपने साथ एक दुभाषिया रख लेता था और व्यक्तिगत व्यवहार में मेरे साथ सदा ही कोई न कोई ऐसा व्यक्ति होता था जो अँग्रेजी और जर्मन भाषाओं का जानकार हुआ करता था। 2007 से तो रमोना हर वक्त मेरे साथ ही रहती है और मैं हर उस बात को जो मुझे जर्मन में ठीक से समझ में नहीं आ रही है उससे समझ लेता रहा हूँ।

दरअसल पिछले कई सालों में मेरी जर्मन पत्नी ने कई बार कोशिश की कि मैं ठीक से जर्मन भाषा सीख लूँ। उसने खुद मुझे जर्मन पढ़ाने की कोशिश की। यहाँ बता दूँ कि वह बहुत अच्छी शिक्षक है। मगर हर वक्त इतने महत्वपूर्ण काम लगे रहते हैं कि मैंने उससे कहा कि मेरी व्यस्तता जर्मन सीखने के काम में बहुत बड़ी बाधा है और फिलहाल यह संभव नहीं है।

तो यह तो हुई जर्मन न सीखने की अपनी कहानी। जब कि मैं 13 वर्ष से जर्मन लोगों के संपर्क में रहने की बावजूद उनकी भाषा सीख नहीं पाया, मेरी पत्नी को मेरे परिवार वालों, कस्बे वालों, और आश्रम के बच्चों के साथ हिन्दी में संवाद करने में मुश्किल से दो साल लगे थे। जर्मन भाषा के बहुत से शब्द मैं जानता हूँ, बहुत से ऐसे शब्द जिनसे मैं जर्मन भाषा में हो रही बातचीत का अंदाज़ा लगा लेता हूँ, उसका रुख समझ जाता हूँ, लेकिन बोलते समय मैं व्याकरण की बहुत गलतियाँ करता हूँ। पहले मैं समझता था कि अपनी बेटी के साथ बात करके मैं सीख लूँगा या जैसे-जैसे वह सीखेगी मैं भी सीखता चलूँगा। लेकिन वह इतना जल्दी सीखती है कि उसने बहुत पहले ही मुझे बहुत पीछे छोड़ दिया है।

इस बार जब हम जर्मनी में थे तब मुझे अपने निवास-अनुमतिपत्र (रेज़िडेन्स परमिशन) का नवीनीकरण कराने विदेश विभाग जाना पड़ा। इस बार वहाँ के अफसर ने मुझसे लिखवा लिया है कि मैं जल्द से जल्द कोई जर्मन कोर्स लेकर जर्मन भाषा सीख लूँगा। ऐसी हालत में आप कुछ नहीं कर सकते-वे बिना कोई सवाल पूछे मेरे सामने मेरा निवास-अनुमातिपत्र रखते हैं, क्योंकि मेरी पत्नी और बेटी जर्मन नागरिक है, लेकिन फिर दस्तखत करने के लिए एक कागज भी सामने कर देते हैं जो एक तरह का इकरारनामा होता है कि मैं तुरन्त कोई न कोई जर्मन भाषा का कोर्स पूरा करूंगा। वैसे मुझे उनकी बात उचित ही लगती है क्योंकि जर्मन पत्नी और जर्मन बेटी के साथ जर्मनी में ही रहना है तो जर्मन भाषा तो आनी ही चाहिए। इसलिए उनके छोटे-मोटे तंज़ पर उन्हें माफ कर देना ही उचित समझता हूँ। 🙂

उन्होंने मुझे जर्मन सीखने की फीस में डिस्काउंट भी दिया है। परिस्थितिवश जब हम भारत वापस आए तो मैंने तुरंत दिल्ली जाकर मैक्समुलर भवन स्थित गेटे इंस्टीट्यूट में 14 जुलाई 2013 से जर्मन भाषा सीखने के लिए दाखिला ले लिया।

मैंने उनका "मिश्रित जर्मन कोर्स" लिया है जिसका एक हिस्सा दिल्ली जाकर ही सीखना होगा और कुछ ऑनलाइन उपलब्ध होगा। इससे मुझे घर बैठे सीखने की सुविधा रहेगी। रमोना भी मुझे रोज़ इस काम में मदद कर रही है और मैं समझता हूँ कि मैं धीरे-धीरे प्रगति कर रहा हूँ।

इंस्टीट्यूट में ग्यारह लोगों का एक छोटा सा समूह है और मैं कह सकता हूँ कि इस उम्र में स्कूल जाना, बचपन में स्कूल जाने से बहुत भिन्न अनुभव है। मैं अपनी शिक्षिका से बहुत खुश हूँ और घर में मैंने सबको बताया कि क्यों वह मुझे इतना पसंद है: वह हम पर चिल्लाती-चीखती नहीं है, वह कभी गुस्सा नहीं करती और न डांटती-डपटती है। उसमें बड़ा संयम है और वह हम सबसे बड़े आदर और शिष्टाचार के साथ बात करती है और सबसे बड़ी बात यह कि वह हमारी पिटाई नहीं करती! 😀