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श्री श्री रविशंकर पर लिखने के बाद प्रशंसा , अपशब्दों एवं चेतावनियों का लेखा – जोखा – 22 फरवरी 13

श्री श्री रविशंकर की मोबाइल फोन चार्ज करने की तथाकथित चमत्कारी शक्तियां हों या मेरे लेखों पर आईं प्रतिक्रियाएं, इस पूरे सप्ताह डायरी के पन्नों पर श्री श्री रविशंकर छाए रहे। मैंने सोचा कि क्यों न अपनी डायरी के इन पन्नों पर विभिन्न लोगों की प्रतिक्रियाओं को आपसे साझा करूं। आपके लिए भी रोचक रहेगा यह जानना।

निःसंदेह श्री श्री रविशंकर के अनुयायियों और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के सदस्यों की प्रतिक्रिया आक्रोश से भरी हुई थी। कुछ लोगों की प्रतिक्रिया तो इतनी भद्दी थी कि वे गाली – गलौज पर उतर आए थे। मैं ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग अपने ब्लॉग पर नहीं करता हूं और इसीलिए यहां भी उसे नहीं लिखूंगा। इन बीते चार दिनों में उन्होंने जिस अश्लील, अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग मुझे लताड़ने के लिए किया है, उसकी शायद कल्पना भी न कर पाएं आप। मजे की बात तो यह है कि ये सभी लोग वे हैं जो ध्यान करते हैं, जो शांति और संतुलन की खोज में रहते हैं एवं जिन्हें उनके गुरु स्वयं यह शिक्षा देते हैं उन्हें किसी के भी बारे में कुछ भी बुरा न कहना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।

जब कभी भी मैं किसी पाखंडी गुरु के बारे लिखता हूं या उसके कपट का भंडाफोड़ करता हूं तो ऐसा ही होता है। यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। उनसे मुझे यही उम्मीद थी कि वे एक डरे हुए जानवर की भांति दुम दबाकर भाग जाएंगें। अपने पूज्य गुरु की धोखाधड़ी से आमना – सामना होने पर ये भक्तगण अपने बचाव के लिए आक्रमण की मुद्रा में आ गए हैं लेकिन अफसोस कि ये अपना बचाव भी समझदारी के साथ नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ सामान्य प्रतिक्रियाएं भी आईं हैं। एक व्यक्ति जिसने श्री श्री की सिखाई हुई प्राणायाम की क्रियाओं का अभ्यास किया और उनसे लाभान्वित भी हुआ, उसने अपने गुरु की इन बेतुकी बातों की सफाई देने की कोशिश की। लेकिन वह स्वयं इस प्रश्न पर उलझन में था कि क्यों कोई ऐसी बेहूदा बात लिखेगा या अपने प्रवचन में कहेगा। तो उसने गुरु के वचनों को जायज़ ठहराने के लिए एक रास्ता निकाला कि उस प्रवचन में आए श्रोता ग्रामीण अंचलों के ‘भोले – भाले‘ और ‘कम बुद्धि‘ के लोग थे और अपने गुरु के श्रीमुख से ऐसी ही कहानियां सुनना चाहते थे।

दर असल इस कहानी की इस प्रकार व्याख्या करना बड़ा ही हास्यास्पद है। आप बड़ी चतुराई से यह कहना चाह रहे हैं: कि श्रोता मूर्ख हैं, इसलिए गुरु जी को उनके स्तर की बात करनी पड़ती है। वाह, क्या बात है! क्या एक प्रबुद्ध व्यक्ति से इस प्रकार की उम्मीद की जाती है? सबसे पहली बात तो यह है कि कभी भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति मूर्ख है। इसके अलावा आप यह नहीं कह सकते कि श्रोता जो सुनना चाहते थे, उन्हें वहीं सुना दिया गया। एक ईमानदार व्यक्ति कदापि ऐसा व्यवहार नहीं करेगा। चलिए मान लेते हैं कि लोग श्री श्री रविशंकर से यही सब सुनना चाहते हैं, तो भी क्या लोगों को खुश करने के लिए उन्हें ऐसी बेहूदी बातें बोलनी चाहिए थीं?

नहीं, मैं नहीं मानता कि आप उनके बचाव में यह स्पष्टीकरण या बहाना पेश कर सकते हैं। मेरे विचार से कोई एक ऐसा व्यक्ति नियुक्त है जो सब कुछ लिखता है या प्रत्येक प्रवचन को रिकॉर्ड करता है और फिर उसका एक अलग वेबपेज बनाता है, एक अलग लेख लिखता है जिसका कोई रीव्यू नहीं किया जाता श्री श्री ने यह सब कहा, इसे प्रकाशित किया गया और जब उन्होंने देखा कि हर कोई उनके ‘सर्वज्ञ‘, ‘सर्वव्यापी‘ या ‘आलौकिक‘ होने की बात पर यकीन करने को तैयार नहीं है तो उन्होंने इस कहानी को वेबपेज से हटा लिया।

कई पाठकों और मित्रों ने मेरा समर्थन करते हुए टिप्पणियां की हैं। जो लोग इस संगठन की कार्यप्रणाली से निराश हुए हैं एवं वे जो उन्हें एक सच्चा और संजीदा गुरु मानते थे, उनके भी कॉमेंट्स आए हैं। कुछ मित्र इन लेखों को लेकर मेरे बारे में चिंतित हैं। उनका मानना है कि श्री श्री का संगठन बहुत बड़ा है और उनके पास पैसे की ताक़त है, पहुंच वाले लोग हैं, अतः मुझे किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इस समर्थन के लिए मैं आप सभी मित्रों का धन्यवाद करता हूं। मेरे बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है। मैं जानता हूं कि मैं अकेला नहीं हूं जब मैं इन पोंगापंथी गुरुओं के बारे में लिखता हूं, इनकी धोखाधड़ी का भंडाफोड़ करता हूं या जब इन पाखंडियों, लम्पटों और नकली धर्मगुरुओं की खबरें इकठ्ठी करता हूं। मेरी तरह और भी हजारों लाखों लोग हैं जो इन गुरुओं से नाखुश हैं। वे जानते हैं कि जो हो रहा है, वह ग़लत है और वे सभी मेरा समर्थन करते हैं। मैं जानता हूं कि वे मेरी तरह मुखर नहीं हैं। लेकिन इस बात को केवल मैं ही नहीं जानता, वे सारे गुरु भी अच्छी तरह से जानते समझते हैं।

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