खुद अपने बारे में कुछ बातें – 21 अक्टूबर 2014

मेरे विचार

स्वयं पर कुछ नोट्स:

-मैं खाना पकाना पसंद करता हूँ मगर अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए।

-मैं परवाह नहीं करता कि मैं क्या पहना हुआ हूँ मगर इसका ध्यान रखता हूँ कि मैं क्या खा रहा हूँ। इसीलिए मैं कपड़ों पर पैसे खर्च करना पसंद नहीं करता मगर अच्छे भोजन पर खर्च करते हुए ज़्यादा नहीं सोचता।

-मुझे सुविधाएँ अच्छी लगती हैं और धन से खरीदी जा सकने वाली सुविधाओं का मैं पूरा आनंद उठाता हूँ।

-मुझे पैसे से भी प्यार है।

-जिन कामों को मैंने हाथ में लिया, उनमें हमेशा सफलता पाई है और पैसे कमाकर तथा उन्हें खर्च करके मैं आनंदित होता हूँ।

-हमेशा से ही मैं और मेरा परिवार चैरिटी के काम करते रहे हैं और खुद पर खर्च करने की अपेक्षा अपनी आमदनी का ज़्यादातर हिस्सा हम ग़रीबों की भलाई पर खर्च करते हैं।

-मैं विलासिता पसंद करता हूँ और पाँच सितारा होटलों में छुट्टियाँ बिताने में मुझे बड़ा लुत्फ आता है लेकिन जब मैं किसी गरीब को देखता हूँ तो सोचता हूँ कि काश, मैं इस व्यक्ति को भी अपने साथ ले जा सकता- और इसी अभिलाषा के चलते मैंने कई बार गरीबों को पाँच सितारा होटल के रेस्तराँ में ले जाकर भोजन करवाया है।

-मैं दूसरों के बनाए नियमों पर चलना पसंद नहीं करता लेकिन जीवन में अनुशासित रहना मुझे अच्छा लगता है।

-वैसे तो मैं काम करना पसंद करता हूँ और बिना काम के नहीं रहना चाहता मगर छुट्टियों के समय मैं काम की चर्चा करना भी पसंद नहीं करता।

-मैं ऊँचा सोचता हूँ मगर छोटे-छोटे लक्ष्य रखता हूँ।

-मुझे अपनी पत्नी के साथ बैठकर काम करना अच्छा लगता है, उसके साथ बैठकर व्यापार की, ग्राहकों की, चैरिटी सम्बन्धी भविष्य की योजनाओं की चर्चा करना पसंद है। मगर अपने सोने के कमरे में प्रवेश करते ही हम काम की या पैसों की कोई बात नहीं करते।

-मैं अपने लाभ के लिए कभी झूठ नहीं बोलता मगर कभी-कभी दूसरों के लाभ की संभावना देखकर खामोश रह जाता हूँ- हालाँकि ऐसे मौके यदा-कदा ही पेश आते हैं।

-मुझे ईमानदारी पसंद है।

-मुझे लगता है कि मैं हमेशा से ईमानदार रहा हूँ लेकिन धर्म से विमुख होने के बाद अधिकाधिक ईमानदार होता गया हूँ।

-जब मैं किसी ऐसे युवक या युवती को कड़ी मेहनत करता देखता हूँ, जो बच्चा तो नहीं रह गया है मगर पूरी तरह वयस्क नहीं हुआ है, तो उसके लिए कुछ न कुछ करने के लिए उतावला हो उठता हूँ। मैं ऐसे लोगों के जीवनों में परिवर्तन लाना चाहता हूँ, मगर महसूस करता हूँ कि अपने बेहद सीमित संसाधनों में जितना करना चाहता हूँ, उतना कर नहीं पाता।

-जब मैं हिंसा देखता हूँ तो उद्वेलित हो उठता हूँ। समझ नहीं पाता कि किसी को कष्ट पहुँचाकर कोई आनंदित कैसे हो सकता है।

-मैं दूसरों का सम्मान करना पसंद करता हूँ और खुद भी दूसरों से यह अपेक्षा रखता हूँ लेकिन न तो किसी को 'सर' कहना पसंद करता हूँ और न ही दूसरों से अपने लिए यह शब्द सुनना चाहता हूँ। इसका इस्तेमाल चाहे उम्र या ज्ञान के आदरस्वरूप ही क्यों न किया गया हो, इस शब्द से मुझे गैरबराबरी का एहसास होता है। मैं जानता हूँ कि उम्रदराज़ होने के पीछे किसी को कोई प्रयास नहीं करना पड़ता और मेरा विश्वास है कि किसी व्यक्ति को किसी दूसरे क्षेत्र में आपसे बढ़कर ज्ञान हो सकता है!

-मैं एक भावुक इंसान हूँ।

-मुझे हँसना-खिलखिलाना अच्छा लगता है और हर वक़्त मुस्कुराते रहना मेरी आदत में शुमार है।

-मैं बहुत जल्द लोगों से लगाव महसूस करने लगता हूँ।

-मैं पारिवारिक इंसान हूँ और लोगों के बीच रहना पसंद करता हूँ।

-मैं नहीं मानता कि प्रेम में दगाबाज़ी का कोई स्थान है। दूसरे को होने वाले दुःख के लिए आपका कोई भी बहाना उचित नहीं कहा जा सकता।

-मेरा प्रेम पर गहरा विश्वास है।

%d bloggers like this:
Skip to toolbar