मेरे जीवन में मेरा शब्दों से बड़ा घनिष्ट संबंध रहा है, संभाषण, प्रवचन, वाद-विवाद और सलाहें। बचपन से ही मैं एक व्यावसायिक वक्ता रहा हूँ और हज़ारों लोगों के सामने बोलकर आजीविका कमाता रहा हूँ, छोटे समूहों के सामने भी और किसी से व्यक्तिगत चर्चा में भी। चाहे आप किसी बड़ी सभा को संबोधित कर रहे हों या किसी एक व्यक्ति के साथ बात कर रहे हों, कुछ बातों का आपको हमेशा ध्यान रखना चाहिए और आज मैं उन्हीं बातों के संबंध में लिखना चाहता हूँ।
1) देख लीजिए कि सामने वाला भी बातचीत में वास्तविक रुचि रखता है या नहीं।
क्या आपके सामने कभी ऐसी स्थिति आई है कि कोई आपसे कुछ कह रहा है लेकिन आप उस विषय में अधिक रुचि नहीं रखते, जिसे वह इतना ज़ोर देकर बता रहा है? मैं अक्सर ऐसी परिस्थिति से दो-चार होता रहा हूँ, जब सामने वाला क्या कह रहा है इसमें मेरी कोई रुचि नहीं रही है और मैं दरअसल सोच में पड़ गया हूँ कि आखिर यह व्यक्ति मुझसे यह सब क्यों कह रहा है। ऐसी स्थिति तब पेश होती है जब मैं किसी विषय के साथ जुड़ नहीं पाता, जब मुझे लगता है कि यह ऐसी बात है, जिसे न तो मैं जानना चाहता हूँ और न ही मुझे उस विषय में जानने की कोई ज़रूरत है!
तो जब भी आप किसी दूसरे व्यक्ति के साथ बात कर रहे हों तो कृपया इस बात की जाँच कर लें कि जो बात आप कह रहे हैं, उसे सामने वाला सुन भी रहा है या नहीं! आप इस बात को उनके चेहरे पर पढ़ सकते हैं, आप उनके शरीर की मुद्रा से पता कर सकते हैं! अगर वे बोर हो रहे होंगे तो आप तुरंत अपनी बात को विराम दें।
2) स्पष्ट बात करें और विषय से बहकें नहीं
जब आपके पास विषय पर कहने के लिए कुछ सार्थक हो, तभी कहें। बहुत से वक्ता कहना शुरू करते हैं और एक विषय से दूसरे पर और वहाँ से और कहीं निकल जाते हैं और बात को लंबा खींचते चले जाते हैं। वे कभी भी किसी स्पष्ट नतीजे पर नहीं पहुँचते और फिर मूल बात, जहाँ से उन्होंने बोलना शुरू किया था और जो वे वास्तव में कहना चाहते थे, उनकी वाचालता में कहीं गुम हो जाती है।
मेरी उन पचासों विषयों में कोई रुचि नहीं है, जिन पर आप बोले चले जा रहे हैं इसलिए कृपया अपनी बात को इतना न बढ़ाएँ कि आपका संभाषण बनावटी लगने लगे।
3) बात को भरसक संक्षिप्त रखें
अगर आप अपना संदेश लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसे बहुत न खींचें! जिसके साथ आप बात कर रहे हैं, संभव है उसके पास उतना समय न हो, जितना आपके पास है। इससे बढ़कर: जितना संक्षिप्त आप बोलेंगे उतना ही अधिक वह प्रभावोत्पादक होगा! वह बिना किसी अलंकृत शब्दावलियों के सुनने वाले के मस्तिष्क में सीधा प्रवेश करेगा!
इसलिए अगर आप अपने विचार किसी के सामने व्यक्त करना चाहते हैं और चाहते हैं कि आपका संदेश वे ग्रहण कर सकें तो उसे कम से कम शब्दों में व्यक्त करें- यह अधिक संतुलित और कारगर होगा!
4) किसी पहले से चल रही चर्चा के बीच व्यवधान पैदा न करें
यह मैं अक्सर देखता हूँ: दो लोग बात कर रहे हैं और तीसरा आता है और सीधे चर्चा में शामिल हो जाता है। आप कभी भी ऐसा न करें! दूसरों की चर्चा में व्यवधान उपस्थित न करें!
हालांकि दुनिया भर में यह सामान्य शिष्टाचार के अंतर्गत आता है, मैंने पाया है कि पश्चिम में इसका बहुत ध्यान रखा जाता है। भारत में बहुत से लोग बोलने के लिए बहुत उतावले रहते हैं और इस बात का कतई खयाल नहीं रखते कि उस समय कोई दूसरा बोल रहा है। यह बहुत अशिष्ट लगता है, भद्दा दिखाई देता है और बहुत बुरा महसूस होता है!
5) दूसरे की बात सुनें
इसके अलावा, अंतिम बिन्दु, जो कि बहुत महत्वपूर्ण भी है: सिर्फ अपने विचार ही व्यक्त न करें, खुद अपने आपको बोलते हुए न सुनते रहें। दूसरे को भी बात करने का मौका दें! दूसरा क्या कह रहा है, उसके संभाषण में भी रुचि लें! तभी सामने वाला बाद में कभी आपकी बात सुनने के लिए पुनः उपलब्ध होगा!
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