भारतीय लोग बच्चों को क्यों लगातार चिढ़ाते रहते हैं? 7 नवंबर 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

मैंने आपको बताया कि हमारे आश्रम में आजकल अपरा की उम्र के भी कुछ बच्चे हैं और स्वाभाविक ही हम देखते रहते हैं कि लोग अपरा और उन बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। रमोना ने एक बात खास तौर पर नोट की है कि अधिकांश भारतीय, चाहे वे बच्चे के अभिभावक हों, कोई कर्मचारी हो या बाहर से आया कोई मेहमान हो, बच्चों के साथ बड़ा विचित्र व्यवहार करते हैं: वे अक्सर उन्हें चिढ़ाते हैं!

दो साल का एक बच्चा भी आश्रम में ही रहता है क्योंकि उसके माता-पिता, दोनों ही, आश्रम के कर्मचारी हैं। क्योंकि अब ठंड पड़ने लगी है, उसकी माँ उसके लिए गरम जूते लेकर आई और पहली बार जूते पहनकर वह खुशी से पूरे समय उछलता-कूदता रहता है और सबको अपने नए जूते दिखाता फिरता है। इस तरह उसे खेलते-कूदते और प्रसन्नमुख देखना बेहद सुकून और खुशी प्रदान करता है। वह सबके पास एक-एककर गया और अपने जूते दिखाए और हमने उसके जूतों को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की। फिर वह हमारे एक कर्मचारी के पास गया और उस कर्मचारी ने उसके जूतों को गौर से देखकर कहा: "वाह, नए जूते! मैं उन्हें अपने घर ले जाऊंगा!" स्वाभाविक ही बच्चा दुखी हो गया और वहाँ से भाग गया। वह व्यक्ति बड़ा खुश हुआ और हँसता रहा।

ऐसी स्थिति मैंने कई बार नोट की है! अपरा खुशी-खुशी अपना चाकलेट खा रही है और कोई आएगा और उससे कहेगा: "ओह चाकलेट! मैं पूरी खा जाऊंगा!" स्वाभाविक ही वह चीखकर "नहीं" कहती है! "नए कपड़े? वह मैं पहन लूँगा!" वह उन्हें कसकर पकड़ लेती है और बाहों में छिपाने की कोशिश करती है। वह व्यक्ति हंस देगा और हम अपनी बच्ची को समझाने की कोशिश करते रहेंगे कि वे लोग मज़ाक कर रहे हैं, कोई भी तुम्हारे कपड़े, खिलौने, जूते या चाकलेट नहीं ले जा सकता।

यहाँ तक कि पूरी तरह अजनबी लोग भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं! अगर आप उन्हें ऐसा करने से मना करें तो उनका जवाब होगा: "हम तो यूं ही उसे चिढ़ा रहे थे!" मगर क्यों? क्यों भाई! आप इतनी छोटी सी बच्ची को क्यों चिढ़ा रहे हैं? उसका छोटा सा मन आपके बारे में क्या सोच रहा होगा, आपने सोचा है कभी? आप हमारी बेटी के लिए एकदम नए हैं और सबसे पहली बात जो आप उसके मन में बिठा रहे हैं, वह यह है कि आप उसकी चीज़ें छीनकर ले जाएंगे! क्या यह मज़ाक की बात है कि एक बच्ची आप पर भरोसा नहीं करती? और फिर आपको बुरा भी लगेगा कि वह आपके पास नहीं आती!

जी हाँ, हम जानते हैं कि आप बच्चे से कोई चीज़ छीनना नहीं चाहते लेकिन वह बच्चा यह नहीं जानता! आप देखते हैं कि बच्चा आपसे नाराज़ है और आपका यह मज़ाक उसे अच्छा नहीं लग रहा है-लेकिन आप अपना मज़ाक चालू रखते हैं, जैसे यह बेहूदा मज़ाक आपके लिए कोई खेल हो! हाँ, हम यह भी जानते हैं कि आप किसी बुरी नीयत से ऐसा नहीं कर रहे हैं और यह भी कि आप यह नहीं चाह रहे हैं कि वह नाराज़ हो जाए बल्कि आप उसके साथ खेल रहे हैं, मज़ाक कर रहे हैं-लेकिन आप ऐसा कोई खेल क्यों नहीं खेलते जिसे वह पसंद करे, आप वैसा कोई मज़ाक क्यों नहीं करते, जिसका मज़ा वह भी ले सके?

बच्चे पर दीर्घावधि में होने वाले असर के बारे में सोचिए! अब वे कभी भी अपनी किसी चीज़ पर खुशी का इज़हार नहीं करेंगे, बल्कि उसे दूसरों से छिपाकर रखेंगे कि कहीं वह उसे उनसे छीन न ले। या हो सकता है कि वे इस बात से बेपरवाह हो जाएँ कि दूसरे क्या कहते हैं! और क्यों न हों? क्योंकि बच्चे यह देखते हैं कि ये लोग कहते कुछ और हैं परन्तु उसका मतलब कुछ और होता है! फिर जब आप बच्चों को किसी चीज़ से आगाह करते है या कोई चीज़ बताते हैं, जो उनके लिए एक नया पाठ या जानकारी हो सकता है तो वे उस पर भी ध्यान नहीं देते! वे नहीं जान सकते कि आपकी किस बात पर यकीन करें और किस पर न करें!

पश्चिम में किसी वयस्क को बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार करते मैंने कभी नहीं देखा-लेकिन भारत में यह व्यवहार रोज़मर्रा की बात है! समस्या यह है कि भारत में बच्चों को अक्सर बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता! वे उनका मज़ाक उड़ाते हैं, वे उन्हें चिढ़ाते हैं, वे उन्हें हास्यास्पद बातें कहने और करने के लिए उकसाते हैं और उनके मुख से उन्हें सुनकर या उनकी अजीबोगरीब हरकतें देखकर खुश होते हैं-लेकिन उन्हें कोई महत्व नहीं देते। वे बच्चों को एक साधारण मनुष्य समझने का महत्व नहीं समझते। जी हाँ, एक छोटा सा मनुष्य, मगर मनुष्य में पाई जाने वाली सभी भावनाओं, संवेदनाओं और इच्छाओं से युक्त मनुष्य! जो भी आप उसके साथ आज कर रहे होते हैं उसी से उसका चरित्र और उसके विचार विकसित होने वाले हैं और खुद के प्रति और अपने आसपास के परिवेश के प्रति उसका व्यवहार और रवैया तय होने वाला है। जब आपका बच्चा किसी बात की इच्छा ज़ाहिर करता है तो आपको उसकी बात को गंभीरता से लेना चाहिए। अगर आप उसकी इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं तो अवश्य करें। अगर नहीं तो अपने बच्चे को समझाएँ कि आप उसकी इच्छा क्यों नहीं पूरी कर सकते। जब भी संभव हो, बच्चे के सामने उसके विकल्प रखें, यह नहीं कि उसकी इच्छाओं के बारे में आप स्वयं ही निर्णय लेना शुरू कर दें! किसी बात के संदर्भ में जो भी आप करें या न करें, उसे विस्तार से समझाएँ कि आप वैसा क्यों कर रहे हैं या नहीं कर रहे है और उसे भी वैसा ही कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करें।

और जो भी आप करें, यह कहकर कि मैं तुम्हारी यह चीज़ छीन लूँगा, बच्चों को कदापि न चिढ़ाएँ!