बच्चों से सेक्स के बारे में बातें कब और कैसे करनी चाहिए? 23 जून 2014

शहर:
टेनेरिफ
देश:
स्पेन

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि ग्रान कनारिया में "सेक्स और स्वतंत्रता" पर मैंने एक व्याख्यान दिया था। इस व्याख्यान के दौरान एक महिला ने मुझसे पूछा कि मेरे विचार में बच्चों को सेक्स विषयक जानकारी कब और कैसे दी जानी चाहिए। बच्चे की किस उम्र में उसके साथ इस विषय पर बात की जा सकती है और बातचीत का स्वरुप क्या होना चाहिए? मुझे लगता है बाल-बच्चों वाले बहुत से अभिभावकों के सामने यह प्रश्न उपस्थित होता होगा, खासकर इसलिए कि सदियों से सेक्स सम्बन्धी चर्चा के साथ तरह-तरह की वर्जनाएँ जुड़ी हुई हैं। इसीलिए मैं समझता हूँ, इस पर तुरंत विचार करना आवश्यक हो गया है।

और अंत में इस विषय पर मेरा जवाब बहुत साधारण सा था: इसे स्वाभाविक रहने दें! जब भी सेक्स की बात चलती है तो सभी इतने सकुचा जाते हैं कि बच्चे तुरंत जान जाते हैं कि उसके साथ कोई न कोई अनुचित बात जुड़ी हुई है! लेकिन उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है! अगर आप बच्चे को बताना चाहते हैं कि सेक्स एक साधारण सी नैसर्गिक चीज़ है-जोकि वह है ही-तो इस बात को आप बहुत सहज-स्वाभाविक तरीके से कहें!

अपने जननांगों और विपरीत लिंगी जननांगों के प्रति उत्तेजक भावनाएँ, यौनिकता और उसके प्रति संवेदनशीलता हर व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से मौजूद होती हैं। स्वाभाविक ही ये भावनाएँ समय के साथ विकसित होती हैं और आप चार साल के बच्चे से वही बातें नहीं कर सकते जो आप किसी पंद्रह साल के किशोर के साथ करते हैं। आप किसी दूध पीते बच्चे को कंडोम और सम्भोग के बारे में नहीं बताएँगे-लेकिन एक थोड़ी बड़ी बच्ची के सामने यह प्रश्न उपस्थित हो ही सकता है कि लड़कों और पुरुषों के पास लिंग क्यों होता है। स्वाभाविक ही छोटे बच्चे भी यह देखते हैं कि उनके पिता उनकी माँओं से अलग दिखाई देते हैं। इसलिए "उसकी तरफ मत देखो" या उससे बढ़कर, "वह गन्दी चीज़ है, उधर मत देखा करो", यह कहने की जगह आप उन्हें बता सकते हैं कि कि पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी ही होती है और महिलाएँ उनसे अलग दिखती हैं। बस-इतना कह देने से, उचित ही, आप जननांगों को वर्जना के दायरे से बाहर कर देते हैं!

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तरह-तरह के एहसासात और उनके साथ तरह-तरह के प्रश्न जन्म लेते हैं। जब भी वे ऐसे प्रश्न लेकर आपके सामने आएँ, उनसे बात कीजिए लेकिन ध्यान रखिए कि जवाब देते हुए सहज-स्वाभाविक और उन्मुक्त बने रहिए। किसी भी हालत में बच्चे से यह मत कहिए कि अपने और दूसरों के लिंग के बारे में या प्रेम, आकर्षण या सेक्स के बारे में प्रश्न पूछना अनुचित है! यह स्वाभाविक ही है कि समय के साथ सेक्स के प्रति उत्सुकता में वृद्धि होती जाए और आपको इसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए जब आप अपने बच्चे को सेक्स के प्रति सामान्य और स्वाभाविक रवैया रखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं!

अब पुनः ब्रह्मचर्य पर लौटते हैं-जब आप बच्चों में मौजूद यौनिकता को रोज़ देखते हैं तो कैसे कह सकते हैं कि उसका दमन उचित है? वह उनमें जन्मजात मौजूद है, किसी को बताने की ज़रुरत नहीं है-अर्थात यह एक नैसर्गिक तथ्य है और उसके साथ आपका व्यवहार उसके अनुरूप होना चाहिए! उसका दमन मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्तियों के विरुद्ध है लेकिन अगर आप अपने कम उम्र के बच्चों से यह कहते हैं कि सेक्स एक बुरी चीज़ है तो आप उनके साथ यही कर रहे होते हैं। उनमें पैदा होने वाली मानसिक समस्याओं, आपसी रिश्तों से सम्बंधित परेशानियों और भविष्य में प्रेम और सेक्स सम्बन्धी दिक्कतों की जड़ यही है!

इसलिए आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि बच्चे के साथ सेक्स सम्बन्धी बातचीत करते समय अपना व्यवहार सहज-स्वाभाविक रखें!