औसत पश्चिमी माँ का जीवन – 17 अप्रैल 2013

पालन पोषण

कल मैंने औसत भारतीय माँ के परिवेश का वर्णन किया था। वह एक संयुक्त परिवार में अपने पति के अभिभावक और सहोदरों के साथ एक ही घर में रहती है। ये सारे लोग उसके बच्चे या बच्चों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करते हैं और माँ को अपने बच्चों की देखभाल में उन सभी का सहयोग प्राप्त होता है। आज मैं इस बात की तुलना औसत पश्चिमी माँ के परिवेश के साथ करना चाहूँगा।

सामान्य रूप से एक भारतीय माँ को जो सहयोग सहज ही प्राप्त हो जाता है पश्चिम में वहाँ की माँओं को दुर्लभ है! उनके पास अपना स्वयं का फ्लॅट या घर होता है, अक्सर अपने या अपने पति के अभिभावकों के घरों से काफी दूर। कोई सोच भी नहीं सकता कि वह किसी भी हालत में अपने सहोदर भाइयों या बहनों और उनके परिवारों के साथ रह सकता है। पश्चिम में अभिभावक भी खुद अपना स्वतंत्र जीवन जीते हैं और अपनी देखभाल भी स्वयं ही करते हैं। यही वहाँ का रिवाज है।

इसलिए इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि वहाँ माँएं अपनी दिनचर्या से बहुत थक जाती हैं और चिंतित रहती हैं। बच्चों के साथ रहने के लिए, घर को सुचारू रूप से चलाने में और खुद अपनी देखभाल की जिम्मेदारियों के बोझ से वे अकेली जूझती हैं। उन्हें शायद ही विश्रांति के लिए कुछ समय मिल पाता है। शायद केवल तब, जब कि बच्चा सो रहा होता है लेकिन उस वक़्त भी उन्हें बहुत से दूसरे काम होते हैं जिन्हें बच्चे के जागने पर वे नहीं कर सकतीं! कपड़े धोना, प्रैस करना, फर्श साफ करना, बर्तन साफ करना या चिट्ठियाँ, बिल्स छांटना या कोई और काम जिसे करना बहुत ज़रूरी है।

ध्यान दें कि मैं अकेली माँओं (सिंगल मदर) की बात नहीं कर रहा हूँ जहां पति होता ही नहीं है! वे तो इससे भी ज़्यादा बेसहारा होती हैं लेकिन अभी मैं सामान्य परिस्थितियों में एक पश्चिमी माँ की दिनचर्या के बारे में बात कर रहा हूँ जहां उसका पति सुबह से शाम तक अपने काम में व्यस्त रहता है! जब वह थका-मांदा घर आता है तो उसे कुछ पल विश्रांति की आवश्यकता होती है और कुछ देर बाद डिनर की भी! उसके बाद ही वह अपना कुछ वक़्त बच्चों के साथ बिता सकता है-आखिर वह दिन भर व्यस्त रहा है, परिवार के लिए धन जुटाने के लिए भागता-दौड़ता रहा है। अक्सर यह उसका दोष नहीं होता कि वह अपनी पत्नी के रोज़मर्रा के कामों में हाथ नहीं बंटा पाता क्योंकि किसी न किसी को तो परिवार के लिए जीविका कमानी ही होगी।

पत्नियाँ आम तौर पर यह समझती हैं और इस सच्चाई का सम्मान भी करती हैं लेकिन इसका नतीजा यह होता है कि उनके अकेले के कंधों पर घर चलाने का पहाड़ सा बोझ आ जाता है! उन्हें नन्हें बच्चे या कुछ बड़े बच्चे की भी दिन भर पूरी देखभाल करनी पड़ती है, जिसमें छोटे बच्चों को हो सकने वाले हर खतरे शामिल हैं। इसके बाद सारे घर की साज-संभाल उनकी ज़िम्मेदारी होती है और फिर अपने पति के लिए हर वक़्त चुस्त-दुरुस्त बने रहना भी आवश्यक है! उसकी शर्ट प्रैस करना, उसकी पसंद का खाना बनाना, और जब उसकी ख्वाहिश हो उसकी बातें सुनने के लिए तैयार रहना कि कैसे वह दिन भर किस काम में व्यस्त रहा और इस वक़्त उसके दिमाग में क्या चल रहा है।

मैंने अपनी दो महिला मेहमानों से सुना है कि उनकी छोटे बच्चों वाली अधिकतर सहेलियाँ कहती हैं कि बच्चे पैदा करने का निर्णय लेकर उन्होंने अपने जीवन की आज़ादी के साथ बहुत बड़ा समझौता किया है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, सबकी एक कीमत होती है जो चुकानी पड़ती है। अब वे काम के दबाव तले पिसकर रह जाती हैं। कोई नहीं कह सकता कि अपने निर्णय से वे 100% सुखी हैं।

कुछ महिलाओं के लिए छोटे बच्चों का लालन-पालन अपने वैवाहिक जीवन के एक हिस्से को खोने जैसा है। प्रेम के लिए वे अपने आपको कुछ ज़्यादा ही थका और पस्त पाती हैं और इस कारण उनमें अपराधबोध भर जाता है। वे समझती हैं कि अपने पति के साथ बिताने के लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाता और 'बेबीसिटर' को पैसे देकर एकाध रात की छुट्टी लेनी पड़ती है कि अपने पति के साथ फिर से प्रेम के कुछ पल गुज़ार सकें!

क्या यह दुखद नहीं है कि आप समझें कि आपके बच्चे ने पति के साथ आपके प्रेम-संबंध में सेंध लगा दी है? कि आपको प्रेम करने के लिए भी छुट्टी लेनी पड़ती है, अपने साथी के साथ रहने के लिए बच्चे से मुक्त समय! आप अपने पारिवारिक जीवन का पूरा आनंद नहीं उठा पातीं क्योंकि आप बच्चे को दिए जाने वाले अपने समय को अपना नुकसान समझती हैं। हमेशा नहीं, लेकिन आप यह स्वीकार नहीं करेंगी कि कभी-कभी आपको यह अवश्य लगता होगा कि आप इतनी थकी और पस्त होती हैं कि बच्चे के साथ बिताए जाने वाले पलों का आनंद भी ठीक तरह नहीं उठा पातीं।

यह है जो मैं पश्चिमी देशों में देखता हूँ- और मुझे संदेह होता है कि पश्चिमी व्यक्तिवाद वाकई आपको खुश रख पाता है।

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