भारतीय माँ के लिए संयुक्त परिवार के लाभ – 16 अप्रैल 2013

मैंने कल ही बताया था कि यहाँ हर वक़्त अपरा की देखभाल के लिए कोई न कोई उपलब्ध होता है और पश्चिम के हमारे कुछ मित्र हैं जो चिंतित हैं कि वह अकेले खेलना कभी सीख ही नहीं पाएगी। हालांकि बिना किसी साथी के उसने अपने आपको व्यस्त रखने की क्षमता अर्जित कर ली है उनकी इस चिंता ने मुझे यह समझाया है कि पश्चिमी अभिभावकों के लिए यह कितना महत्वपूर्ण होता है और किसी परिवार में ऐसा हो रहा है तो वह कितना सामान्य माना जाता है। इस विचार ने मेरे सोच को एक सामान्य भारतीय और पश्चिमी परिवार की परिस्थितियों के बीच एक और तुलनात्मक अंतर की ओर मोड़ दिया। आइये, सबसे पहले एक माँ के नज़रिये से एक समान्य परिस्थिति को देखें। हमारे यहाँ तो एक असामान्य परिस्थिति है क्योंकि आश्रम में बहुत सारे लोग होते हैं जो हमारी बच्ची का ख्याल रख सकते हैं। अपरा के लिए यह बहुत अच्छी बात है कि वह उन सबसे बहुत सारी बातें सीखती है, और हमारे लिए भी! हम दोनों अपना काम तब भी कर सकते हैं जब वह सोती है और तब भी जब वह खेलती है, बच्चों के साथ, चाचाओं के साथ या किसी और के साथ। यह असल में एक विशिष्ट परिस्थिति है-हम अपने कंप्यूटर से कभी भी उठकर उसके साथ खेल सकते हैं और ऐसे मौके बहुत कम आते हैं जब किसी मेहमान के साथ व्यस्त होने कि वजह से अपरा हमारे साथ न रह पाई हो। हर कोई उसे देखता रहना पसंद करता है और उसके साथ खेलना पसंद करता है इसलिए हम जो कुछ कर रहे हैं उसके साथ उसका पूरा सामंजस्य बैठ गया है। भूख लगने पर रमोना उसे खाना खिला देती है या नींद आने पर सुलाती है और यह सब करने के बाद भी उसके पास इतना समय बच ही जाता है कि वह बहुत सारा काम कर लेती है।

जहां मैं यह जानता हूँ कि हमें यहाँ आश्रम में बहुत से कर्मचारियों का और असामान्य रूप से बहुत बड़े परिवार का सहयोग प्राप्त है, वहीं मेरे विचार में एक सामान्य भारतीय माँ के लिए भी परिस्थिति लगभग इतनी ही सुविधाजनक होती है। सामान्य भारतीय माँ के आसपास इतनी बड़ी संख्या में लोग भले न हों मगर उसके पास भी कुछ लोग तो होते ही हैं जो उसके बच्चे से प्रेम करते हैं और जिनके साथ उनका बच्चा एक तरह का भावनात्मक रिश्ता कायम कर लेता है। एक भारतीय महिला के लिए विवाह के बाद अपने पति के परिवार में जगह बना लेना एक सामान्य सी बात है। इसका मतलब यह होता है कि बच्चे के माँ-बाप के अलावा वहाँ आम तौर पर बच्चे के पिता के अभिभावक भी होते हैं, यहाँ तक कि कि कई बार परदादा और परदादी भी और चाचा चाची/चाचियाँ और उनके बच्चे, सारे एक ही छत के नीचे रहते हुए मिलते हैं। अगर पिता की कोई अविवाहित बहन है तो वह भी।

इस प्रकार माँ की सहायता के लिए कम से कम दो-तीन ऐसे लोग हर वक़्त होते हैं जो थोड़े-थोड़े समय के लिए बच्चे की देखभाल कर सकते हैं, जिस समय वह नहा सकती है, खाना बना सकती है या दूसरे घरेलू काम निपटा सकती है। बच्चे की देखभाल होती रहती है, माँ आसपास ही है और उसे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है और उसके पास समय है कि वह अपनी मर्ज़ी का कोई काम कर सके- यहाँ तक कि खुद अपने मनोरंजन के लिए समय निकाल सकती है, कोई किताब पढ़ सकती है, सहेलियों के साथ गपशप कर सकती है या नींद ले सकती है!

स्वाभाविक ही एक या अधिक बच्चों की उपस्थिति में घर का सारा काम सुचारु रूप से निपटाना काफी मुश्किल होता है और ऐसा भी नहीं है के ये महिलाएं दिन भर टीवी देखती हों और उनके रिश्तेदार घर का काम करते हों। निश्चित ही उन पर काम का बहुत बोझ होता है मगर कई लोगों का स्वैच्छिक सहयोग भी उपलब्ध होता है।

अगर घर की आर्थिक परिस्थिति माँ को नौकरी करने के लिए विवश कर देती है या बच्चों के बड़े हो जाने के बाद वह स्वयं कुछ अतिरिक्त आय अर्जित करना चाहती है तो उसके लिए बाहर निकलना आसान होता है! बच्चा या बच्चे परिवार के दूसरे सभी सदस्यों के साथ हिल-मिल चुके होते हैं और वे अकेलापन महसूस नहीं करते और जहां माँ की अनुपस्थिति का अहसास तो होता है मगर उसकी बहुत आवश्यकता नहीं होती। बाकी का सारा परिवार उसके बच्चे या बच्चों को खुश और व्यस्त रखते हुए उनके खाने पीने का सारा इंतज़ाम कर लेते हैं। यह सब पश्चिमी परिवेश में बहुत मुश्किल होता है और उन्हें 'डे-केयर सेंटर' या 'क्रेश' में रखने के बाद भी उतनी निश्चिंतता महसूस नहीं होती जितनी भारत के सम्मिलित परिवारों में हो पाती है।

सबसे मुख्य लाभ यह होता है कि अभिभावक और बच्चे दोनों एक प्रेम करने वाले परिवार के बीच रह पाते हैं और वे जो भी करें उसमें उन्हें उनका सहयोग प्राप्त होता है। एक साधारण भारतीय परिवार में भौतिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी कोई न कोई होता है जो उनकी जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए हर वक़्त तत्पर रहता है।

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