अपने बच्चों को गंभीरता से लें – उनके साथ बात करें! 15 जुलाई 2014

पालन पोषण

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे अपरा सफ़र और उससे जुड़ी परेशानियों को सहजता से स्वीकार कर लेती है भले ही परिणामस्वरूप चार दिन में चार अलग-अलग स्थानों पर लगातार भिन्न और ज़्यादातर अपरिचित लोगों से मिलना-जुलना होता हो। स्वाभाविक ही, इसमें बहुत सी बातों का योगदान होता है: उसकी मिलनसार प्रकृति से लेकर उसके रहन-सहन के तौर-तरीकों तक और यह बात भी कि उसके माँ और पा भी हमेशा उसके साथ होते हैं और जहाँ भी वह जाती है, नए खिलौनों और किताबों से लेकर बच्चों और पालतू जानवरों से प्रेम करने वाले मित्रों तक, एक से एक नए मनोरंजन उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। लेकिन इसके बावजूद, जिस तरह हम उसे दिनचर्या में होने वाले परिवर्तनों के लिए हर बार तैयार करते हैं, वह भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है!

यह बात रेखांकित करती है कि आप अपने बच्चों को कितनी गंभीरता से लेते हैं। आप कुछ भी करें, अपने बच्चों को-चाहे वे बहुत छोटे बच्चे हों, चाहे किशोर-अपने पीछे घसीटने की कोशिश मत कीजिए; यह मत कहिए कि वे यह करें या यह न करें बल्कि सारे कार्यक्रम को उनके सामने विस्तार से रखें कि इस परिस्थिति में उनके लिए क्या संभावनाएँ खुल सकती हैं और तब वे जान सकेंगे कि आगे क्या होने वाला है और खुद निर्णय कर सकते हैं कि वे इस नई परिस्थिति में क्या करेंगे, किस तरह पेश आएँगे। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इससे बाद में आने वाली संभावित परेशानियों से भी आप बच जाएँगे।

जब भी हम किसी यात्रा पर निकलते हैं, हम अपरा को एक दिन पहले बता देते हैं कि हम कहाँ जाने वाले हैं, वहाँ हम कैसे जाएँगे, कहाँ रहेंगे, किन-किन लोगों से मिलेंगे और वहाँ हम क्या करेंगे। अगर हमारे पास वहाँ के और वहाँ मिल सकने वाले लोगों के चित्र या विडिओ उपलब्ध हैं तो वे भी हम उसे दिखाते हैं। अगर वह पहले उनसे मिल चुकी होती है तो उनकी याद दिलाने की कोशिश करते हैं। इस तरह उसे आने वाले दिनों का कुछ अनुमान हो जाता है और तदनुसार वह मन ही मन उसकी तैयारी करने लगती है बल्कि वहाँ जाने के लिए उत्सुक हो उठती है!

इस तैयारी में हमें बहुत प्रयास करना पड़ता हो, यह बात भी नहीं है। बल्कि कहना चाहिए, यह खेल-खेल में ही हो जाता है! आपको सिर्फ उसके साथ बातचीत के लिए थोड़ा सा वक़्त निकालना पड़ता है और बस, इतना ही काफी होता है। उसके साथ खेलते हुए, जब आप थोड़ा फुरसत में होते हैं, आराम कर रहे होते हैं या भोजन के समय भी, यदि आप अपने कार्यक्रम के बारे में अपने बच्चों को बता सकें तो उतना ही पर्याप्त होता है!

मेरा मानना है कि ये कदम सिर्फ सफ़र के वक़्त ही नहीं बल्कि वास्तव में आपके दैनिक जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं! आपके बच्चे को पता होना चाहिए कि आप उसे गंभीरता से लेते है! अगर आपकी तीन साल की बेटी अभी खेल रही है और आप अचानक उससे उसका खेल छुड़ाकर बाज़ार चलने के लिए या किसी मित्र के यहाँ चलने के लिए कहेंगे तो यह उचित नहीं कहा जा सकता और न ही उसे ये बर्ताव अच्छा लगेगा! आपकी बेटी को लगेगा कि उसके जीवन में होने वाली घटनाओं पर उसका कोई जोर नहीं है, कि उसके जीवन में होने वाली घटनाएँ उसकी मर्ज़ी के बगैर हो रही हैं और यह भी कि वह उतना स्वतंत्र नहीं है, जितना एक बच्चे को होना चाहिए! वह अपनी मर्ज़ी से कुछ कर रही होती है और आप एक तूफ़ान की तरह आते हैं और उसके सुखद एहसास के परिदृश्य को तहस-नहस कर देते हैं।

मैंने देखा है कि भारत में यह अक्सर होता है, नन्हे बच्चों के साथ और बड़े, किशोरों के साथ भी। वयस्क, यहाँ तक कि अभिभावक भी अपने बच्चों को गंभीरता से नहीं लेते। वे उनके साथ बात करना, घर के किसी भी मामले में उनकी राय लेना आवश्यक ही नहीं समझते। किसी महत्वपूर्ण विषय पर विचार करते समय उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाता। आपके बच्चे की उम्र कुछ भी हो, उसकी भी ख्वाहिश होती है कि उसे महत्व दिया जाए और आपको समझना चाहिए कि आपका बच्चा भी आपके परिवार का ही सदस्य है, जिसकी बातों और जिसकी इच्छा का ध्यान भी आपको रखना है। और मुझे लगता है कि यह नन्हे बच्चों से ही शुरू हो जाना चाहिए!

हम अपने दैनिक कार्यक्रमों के बारे में अपरा के साथ बराबर चर्चा करते रहते हैं। स्वाभाविक ही, जब वह बहुत थक जाती है या भूखी होती है तो परेशान हो जाती है। निश्चय ही, कभी कभी वह हमारे द्वारा तय सीमा का उल्लंघन कर जाती है, जोकि स्वाभाविक ही है! लेकिन जब भी हम किसी यात्रा पर निकलते हैं, वह पूरे उत्साह के साथ हमारे साथ चलने के लिए प्रस्तुत होती है। और इसीलिए हमें उसके साथ सफ़र करना बहुत अच्छा लगता है, हम जानते हैं कि सफ़र उसके लिए भी आनंददायक ही होगा!

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