बच्चों की परवरिश के मामले में देशों की सीमाएँ धुंधली पड़ रही हैं – 3 जून 2014

पालन पोषण

कल के ब्लॉग में आपने पढ़ा कि कुछ भारतीय अपने बच्चों को अपने से अलग करके सुदूर बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ने के लिए भेज देते हैं। जर्मनी में यह ज़्यादा देखने को नहीं मिलता लेकिन किसी ने मुझे बताया कि यह व्यवस्था इंग्लैण्ड से शुरू हुई है- और इस बात में दम है क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं है कि भारत पर अंग्रेजों का कितना अधिक प्रभाव है। और मैंने यह भी सुना है, बल्कि मैं जानता हूँ कि जर्मनी में भी धनाढ्य और अभिजात्य परिवारों में भी यह एक आम बात है। इससे पता चलता है कि आजकल आप बहुत सी प्रवृत्तियों को 'भारतीय' या 'पश्चिमी' नहीं कह सकते बल्कि ऐसी सीमाएँ तेज़ी के साथ धुँधली होती जा रही हैं।

दरअसल यह आजकल बहुत हो रहा है और कई क्षेत्रों में हो रहा है जैसे बच्चों की परवरिश के मामले में। अभिभावक जिन स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते हैं, उनका उदहारण हम पहले ही देख चुके हैं। यही बात परवरिश की बहुत सी मूलभूत बातों में भी होती है। भारत में बच्चों की परवरिश किस तरह होती है? वे अपने बच्चों को ज़्यादा आज़ादी देते हैं, उन्हें धूल-मिट्टी में खेलने देते हैं, वे बच्चों को बहुत सारे नियमों-कानूनों में नहीं बाँधना चाहते और और बच्चे क्या करें या क्या न करें, इस बात पर ज़्यादा अंकुश नहीं लगाते बल्कि बच्चों को समझदार वयस्क बनाने की उन्हें कोई जल्दी नहीं होती। पश्चिमी देशों में सामान्यतः आप समझते हैं कि वे बच्चों को बचपन से ही बहुत से नियमों और दायरों में बाँध देते हैं, कि वे नहीं चाहते कि बच्चे खुद को या अपने कपड़ों को गन्दा करें और यह भी कि वे बच्चों को क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए इस पर अक्सर हिदायतें देते रहते हैं।

लेकिन दरअसल ऐसा नहीं है। बल्कि कहना चाहिए कि अब ऐसा नहीं है। या फिर जिनके बारे में आप बात कर रहे हैं उन लोगों के सामाजिक हैसियत, उनकी आर्थिक स्थिति या उनके निवास की जगह का उल्लेख भी किया जाना चाहिए। क्योंकि इससे फर्क पड़ता है।

जबकि ऐसे बहुत से भारतीय हैं, विशेषकर गरीब परिवारों में और गाँवों और कस्बों में रहने वाले भारतीय, जो बच्चों के धूल-मिट्टी में सने रहने की तरफ ज़्यादा ध्यान नहीं देते लेकिन सबके लिए आप ऐसा नहीं कह सकते। आप 'औसत भारतीयों' के लिए भी ऐसा नहीं कह सकते। उच्च वर्ग के ही नहीं मध्यम वर्गीय भारतीय अभिभावक भी, जो आर्थिक रूप से अपने माता-पिता से आगे बढ़ने के संघर्ष में लगे हुए हैं, महानगरों में ही नहीं छोटे शहरों में रहने वाले भारतीय परिवार भी आजकल सफाई पर बहुत जोर देते हैं, बच्चों के प्रति सख्ती के साथ पेश आते हैं और उन्हें सड़क पर और धूल-मिट्टी में खेलने से ज़ोरदार तरीके से मना करते हैं!

अगर कोई आधुनिक पश्चिमी व्यक्ति इन भारतीय अभिभावकों को देख ले और यह देख ले कि किस तरह कुछ माँएँ अपने बच्चे को क्रिकेट खेलता हुआ या धूल में लोटता देखती है तो लगभग मूर्छित हो जाती है क्योंकि वे इसे बहुत बुरा और असामान्य समझती हैं, जैसे वह उसके बच्चे के वर्तमान स्वभाव के विरुद्ध पुराने जमाने की बात हो, जब उनके अभिभावक (पुरानी पीढ़ी के लोग) अपढ़, पिछड़े और नासमझ हुआ करते थे। यह अभी हाल की बात है, महज एक या दो पीढ़ी पहले की, जब से यह माना जाने लगा कि बच्चों को गंदगी और धूल-मिट्टी से दूर रहना चाहिए। इसके विपरीत, आजकल पाश्चात्य अभिभावक पैसा खर्च करके बच्चों के लिए धूल-मिट्टी में खेलने के अवसर उपलब्ध कराते हैं! वे अब समझने लगे हैं कि बच्चों के लिए जंगलों में घूमना-फिरना, मटरगश्ती करना, हाथों को धूल-मिट्टी में सान लेना और धरती की तरह-तरह की बनावट और सतहों को महसूस करना कितना महत्वपूर्ण है!

क्या पश्चिमी अभिभावक बच्चों के प्रति अति-सुरक्षात्मक होते हैं? आजकल तो बिलकुल नहीं! क्या अभिभावक बच्चों के दैनिक समय के ज़्यादा हिस्से में खुद को शामिल न करने की कोशिश करते हैं? भारतीय अभिभावक भी आजकल यही सोचते हैं!

भारत और पश्चिम एक दूसरे के करीब आ रहे हैं और सीमाएँ धुँधली होती जा रही हैं। सिर्फ दूसरों की अच्छाई को अपनाने की ज़रूरत है और तभी वैश्वीकरण का पूरा लाभ मिल पाएगा!

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