अहिंसक शिक्षा: बच्चों को आपका समय, तवज्जो और संवाद की जरुरत हैं! 3 मार्च 2014

पालन पोषण

मैंने आपको बताया था कि हम अपने कर्मचारियों में से उन्हें, जो बच्चों के अभिभावक भी हैं, सिखाते हैं कि कैसे बिना हिंसा के बच्चों को शिक्षित किया जा सकता है। उनके लिए यह आसान नहीं होता, खासकर इसलिए कि वे यहाँ आने से पहले जानते ही नहीं हैं कि यह विकल्प भी उपलब्ध है! लेकिन दूसरे विकल्पों के विषय में सोच पाने की अक्षमता हमारे कर्मचारियों में ही हो, ऐसा नहीं है। मैंने इसे साधारण भारतीय परिवारों में बहुतायत से देखा है कि वे यह तो समझते हैं कि बिना मारे-पीटे बच्चों को पढ़ाना अच्छी बात है लेकिन वे यह नहीं जानते कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं। इसलिए मैंने सोचा कि इस विषय में उपयोगी कुछ मूल बातें लिखता चलूँ।

1) अपने बच्चों के साथ पर्याप्त समय बिताइए और उन्हें पूरी तवज्जो दीजिए।

यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है! मैं अक्सर देखता हूँ कि एक माँ का एक बेटा है, जो पूरे समय उसके साथ चिपका रहता है मगर उसकी माँ उसके साथ बात नहीं करती। वह उसके पास ही खेल रहा है और वह अपने काम में लगी हुई है या वह माँ के पास अलिप्त सा आकर बैठ जाता है, जबकि माँ का काम खत्म हो चुका है।

उन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं होती, न ही कोई खेल या संपर्क जैसा कुछ होता है। जब तक उसका बच्चा हल्ला-गुल्ला नहीं करता या कोई बेतुकी बात नहीं करता या जब तक वह किसी खतरे में नहीं होता, माँ न तो उससे कोई बात करती है और न उसके खेल या उसके किसी काम में कोई दखलंदाज़ी करती है। बेटा तभी उसका ध्यान आकर्षित कर पाता है जब वह कोई ऐसी बात करता है, जो उसे नहीं करनी चाहिए। अब आप अनुमान लगाइए, वह क्या सबसे ज़्यादा करता है।

बच्चे आपकी तवज्जो चाहते हैं और वे उसे प्राप्त करके ही रहते है। अगर आप उन्हें तब तवज्जो नहीं देते जब वे अच्छा व्यवहार करते हैं तो वे ऐसा काम करते हैं, जिस पर आपको प्रतिक्रिया देनी ही पड़ती है अर्थात उसकी तरफ या उसके काम की तरफ ध्यान देना ही पड़ता है। इसलिए अपने बच्चों के साथ होना, अपने बेटे या बेटी को पर्याप्त तवज्जो देना बहुत महत्वपूर्ण है। अपने बच्चे के साथ किताब पढ़ें, उनके साथ खेलें, उन्हें कहानियाँ सुनाएँ या उन्हें दुनिया से रूबरू करवाएँ!

आप देखेंगे कि परस्पर साथ बिताया गया यह बहुमूल्य समय किस तरह आपके आपसी रिश्तों की डोर को मजबूत करता है। और ऊपर से आप उससे वह सम्मान भी अर्जित करते हैं, जो उससे बार-बार ‘नहीं’ कहने से आपको कभी प्राप्त नहीं होगा!

और इसके साथ हम इसी से सम्बद्ध अगले बिन्दु पर आते हैं:

2) बच्चों के साथ बात कीजिए और शांति से, खुशी से और कोमलता के साथ बात कीजिए।

आपका बच्चा लगातार सीखने की प्रक्रिया से गुज़र रहा है। खासकर जीवन के पहले कुछ साल तक बच्चे का मस्तिष्क बड़ी तेज़ी के साथ विकसित होता है और जितना ज़्यादा जानकारी आप उसे देंगे, जितना ज़्यादा उसके दिमाग में चीज़ें भरेंगे, उतना ही उसके लिए अच्छा होगा। आपकी बेटी बोलना सीखती है, सुनती है कि कैसे उसे बोलना है और आपके बोले हुए शब्दों की नकल करती है और उसी तरह अपने वाक्य बनाने की कोशिश करती है।

आप सोच रहे होंगे कि इन सब बातों का अहिंसा से क्या संबंध है! जब आप बात कर रहे होते हैं तो आपका बच्चा न सिर्फ आपके कथन को सुन रहा होता है बल्कि उनमें आए शब्दों को भी सुन रहा होता है, उन शब्दों का अर्थ जान रहा होता है, उनमें मौजूद हाव-भाव, उच्चारण और भावनाओं को समझ रहा होता है! इसलिए उसके साथ सुंदर चीजों के बारे में बात करें, अच्छी कहानियाँ सुनाएँ कि कैसे लोग शांतिपूर्वक आपस में खेलते हैं और कैसे सारा संसार हंसी-खुशी और आनंद से भरा हुआ है।

अपने बच्चे को अनवरत हिंसा के वातावरण की जगह खुशी के वे संस्कार दीजिए। अगर आप सिर्फ डांट-डपट के लिए या सिर्फ बच्चे पर चीखने-चिल्लाने के लिए मुंह खोलेंगे तो आपका बच्चा उसका आदी हो जाएगा और आपके गुस्से की तरफ ध्यान देना बंद कर देगा-क्योंकि आप तो अक्सर यही कर रहे होते हैं!

अगर अपनी बेटी के साथ आप अक्सर शांतिपूर्वक और मुस्कुराते हुए बात करते हैं और सिर्फ धमकियाँ और चीख-पुकार ही नहीं मचाए रहते तो जब आप गंभीर होंगे तो वह आपकी बात मानेगी। तब ज़्यादातर आपको ऊंची आवाज़ में अपनी बात कहने की आवश्यकता भी नहीं होगी।

क्योंकि अभी बहुत से सुझाव बाकी है, कल मैं इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए इस ब्लॉग में कुछ और सुझाव लिखूंगा।

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