बच्चों के प्रति अहिंसा की प्रशंसा की जाती है मगर बुरी आदतें मुश्किल से छूटती हैं- 26 फरवरी 2014

पालन पोषण

भारतीय अभिभावकों को लिखे अपने पत्र में बच्चों के विरुद्ध हिंसा के विषय में लिखने पर मुझसे पूछा जाता है कि क्या मैं सोचता हूँ कि मैं अपने लेखन द्वारा लोगों के मन-मस्तिष्क में कोई परिवर्तन ला सकता हूँ। सबसे पहले तो यह कि लिखने का मेरा मकसद यह है ही नहीं, मैं सिर्फ अपने मन की बात लिखना चाहता हूँ। आप उससे क्या प्राप्त करते हैं यह आपकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है। अगर वह कुछ अभिभावकों और उनके बच्चों के जीवन में कोई परिवर्तन ला पाए तो मुझे खुशी होगी। मैं जानता हूँ कि यह परिवर्तन काफी मुश्किल है क्योंकि शब्दों और कर्मों द्वारा व्यक्त हिंसा ज़्यादातर लोगों की आदत बन चुकी है। मुझे लगता है कि इसके लिए कुछ व्यावहारिक सहायता की भी आवश्यकता होगी। मैं अपने आश्रम का उदाहरण देना चाहता हूँ, जहां फिलहाल यही घटित हो रहा है।

हमारा एक कर्मचारी हमारे यहाँ काफी समय से काम कर रहा था जबकि उसकी पत्नी बच्चों के साथ दूर किसी गाँव में रहती थी। सप्ताहांत में एक बार वह उनसे मिलने गाँव गया। वह देख चुका था कि हम आश्रम में रहने वाले बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यहाँ तक कि कर्मचारियों के एक बच्चे के साथ भी, जो उसके बच्चे की आयु का, अर्थात लगभग दो साल का है, वही व्यवहार किया जाता है। अभिभावकों से हम अक्सर कहते रहते हैं कि वे अपने बच्चों को मारा पीटा न करें और ये बातें उस कर्मचारी ने भी सुन रखी थीं। उसने हमारे मुंह से वे तर्क भी सुने थे, जिनमें हम बताते थे कि बच्चों के विरुद्ध हिंसा और उन्हें धमकियाँ देना क्यों अनुचित और हानिकारक है।

वह अच्छी तरह समझ रहा था कि यह उचित ही है। वह अपने बच्चे के लिए भी यही वातावरण चाहता था और इसलिए वह अपने गाँव जाकर उन्हें आश्रम ले आया। अब उसकी पत्नी भी आश्रम में काम करती है और अपने बच्चों और पति के साथ यहीं रहती है।

फिर भी उसके लिए बच्चों को पीटने की आदत से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल सिद्ध हुआ। उसे और उसकी पत्नी को, जो बच्चों के साथ उससे ज़्यादा समय बिताती थी, बच्चों को शिक्षित करने के तरीके को बदलने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी। या यह कहें कि बच्चों को वास्तविक शिक्षा प्रदान करने में, क्योंकि मैं हिंसा के जरिये ‘शिक्षित’ किए जाने को पूरी तरह खारिज करता हूँ।

उन्हें बच्चों पर हाथ उठाना बंद करने में काफी वक़्त लगा। इसके लिए हमें कड़ाई के साथ बच्चों को मारने और मारने की धमकी देने पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। और हमारे उदाहरण द्वारा और हमारी लगातार समझाइश और इस तरह हमारी सहायता के कारण ही वे अपने हिंसक रवैये को रोक पाने में सफल हो सके। वे दूसरा कुछ जानते ही नहीं थे! वे स्वयं भी मार खाते हुए बड़े हुए, उन्होंने जीवन भर दूसरों का लालन-पालन भी हिंसक तरीके से होता हुआ देखा और अब यहाँ उन्होंने जाना कि बच्चों को पालने और उन्हें बड़ा करने का कोई दूसरा तरीका भी हो सकता है।

तो इस तरह हम उनकी सहायता कर रहे हैं और उन्हें वह दूसरा रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं और समझ रहे हैं कि बिना हिंसा के बच्चों का लालन-पालन करना कितना अच्छा हो सकता है। अब उन्हें इस नए तरीके की आदत डालनी होगी और उनके बच्चों को भी। बच्चे भी पहले दो वर्ष तक मार खाते हुए ही बड़े हुए हैं और मार भी ऐसी कि जिसका कारण उन्हें अधिकतर समझ में नहीं आ सका, अधिकतर उन्हें बिना किसी चेतावनी के या बिना किसी स्पष्टीकरण के पीटा गया। अब उन्हें पुनः सीखना होगा कि नए नियमों का पालन करते हुए, अपने अभिभावकों में अचानक आए परिवर्तन के साथ और आश्रम के स्नेहिल वातावरण के साथ तालमेल बिठाते हुए अब उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए।

मुझे विश्वास है कि उन अभिभावकों के साथ और उनके बच्चों के साथ इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता था। और आश्रम के लिए भी क्योंकि, जैसा कि मैंने कल कहा था, हम इसे अपनी बेटी के लालन-पालन के लिए एक आदर्श स्थान बनाना चाहते हैं-हिंसा रहित और प्रेम और सद्भाव से परिपूर्ण!

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