भारतीय अभिभावक और उनकी दिनचर्या में शामिल शारीरिक और मानसिक हिंसा- 5 नवंबर 2013

बच्चों के लालन-पालन के तरीकों के सन्दर्भ में पश्चिमी देशों और भारत में कुछ बातें बिल्कुल भिन्न हैं। मेरी पत्नी ने जर्मनी की तुलना में इस अंतर को और भी ज़्यादा शिद्दत के साथ महसूस किया है। उनमें से सबसे अफसोसनाक है बच्चों के साथ मौखिक और शारीरिक हिंसा!

एक दिन आश्रम के एक कर्मचारी से मिलने उसकी पत्नी आई थी। वह अपने बच्चे को खाना खिलाने की कोशिश कर रही थी मगर बच्चा गेंद खेलने के लिए मचल रहा था और खाना खाने में उसका मन नहीं लग रहा था। अचानक जब रमोना उसके पास से गुज़री, उस महिला ने उसकी बांह पकड़कर खींचा और धमकाते हुए कहा: "चलो, खाओ! नहीं तो ये आंटी तुम्हारी पिटाई कर देंगी!" सुनकर रमोना पल भर के लिए हतप्रभ रह गई। उसने पलटकर देखा तो पाया कि उस महिला का इशारा उसी की तरफ था। लड़का भी आश्चर्य और भयभीत आँखों से उसकी तरफ देख रहा था।

रमोना ने वही किया, जो किसी भी समझदार व्यक्ति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती थी। वह उस महिला के पास बैठ गई और उस बच्चे से स्पष्ट शब्दों में कहा कि यहाँ कोई भी तुम्हें मारने वाला नहीं है। उसने गेंद लेकर बच्चे के हाथ में थमा दी और उसे खेलने के लिए रवाना कर दिया। फिर वह माँ से मुखातिब हुई और कहा: आगे से कभी भी यह मत कहना कि रमोना उसे मारेगी! तुम खुद भी कभी उसकी पिटाई मत करना और न ही पिटाई की धमकी देना क्योंकि यही आश्रम का नियम है और अगर वह चाहती है कि वह और उसके बच्चे स्वतन्त्रतापूर्वक आश्रम आ-जा सकें तो उसे इस नियम का पालन करना होगा।

क्या यह कोई सख्त रवैया है? होगा, मगर वास्तव में ऐसा करना ही आवश्यक है। हमारे बहुत से कर्मचारी हमारे साथ रहते हैं और हम उन्हें एक घरेलू वातावरण प्रदान करना चाहते हैं, जिससे वे अपने परिवार वालों को भी सहजता के साथ आश्रम ला सकें, यहाँ उन्हें कुछ दिन रख सकें ताकि वे भी यहाँ की दैनिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकें। अगर कोई कर्मचारी या उनका कोई रिश्तेदार अपने साथ बच्चों को लेकर आता है तो वे अपनी परिवेशगत आदतों के चलते अपने बच्चों को मारने-पीटने में कोई संकोच नहीं करते! अगर वे खाना नहीं खाते तो मार खाते हैं। कोई शैतानी करते हैं तो मार खाते हैं। चिल्लाते हैं तो उनकी पिटाई होती है।

बात यहीं खत्म नहीं होती! आप उन्हें मारने-पीटने से मना कर दें तो वे हाथ दिखाकर (हाथ ऊंचा करके) धमकाते हैं। मारते नहीं क्योंकि मना किया गया है। या फिर मारेंगे नहीं मगर मौखिक हिंसा से काम लेंगे। डांट-डपट और धमकियों से काम लेंगे कि अगर वे चिल्लाना बंद नहीं करते तो इतना मारेंगे कि गाल लाल हो जाएंगे। बच्चे बहुत सी शैतानियाँ सिर्फ इसलिए करते हैं कि दुनिया को समझ सकें मगर ये अभिभावक इस बात को समझ ही नहीं पाते!

और फिर अभिभावक केवल खुद मारने का डर ही बच्चों को नहीं दिखाते बल्कि अब वो डराने के लिए कोई नया पात्र खोजते हैं! क्योंकि एक बार जब डर चला जाता है, जैसा कि आमतौर पर पिटने वाले बच्चों और हिंसात्मक धमकियों के साथ होता ही है, तो उन्हें बच्चों को डराने के लिए नए उपाय करने पड़ते हैं और उस प्रयास में वो बच्चों को डराने के लिए ‘आपका’ मतलब अपने अगल-बगल के आंटी और अंकल का उपयोग करते हैं! तो अब आप बुरे व्यक्ति बन गए, जिससे कि बच्चा डरता है, क्योंकि उनको इसके अलावा और कोई उपाय नहीं पता कि वे अपने बच्चे को किस तरह समझाएँ! अब आप कल्पना कर सकते हैं कि बच्चे के मन में आपकी क्या छवि बनी होगी!

मैं कह नहीं सकता कि कितनी बार हमने ऐसे अभिभावकों से, जो मारने-पीटने के अलावा कुछ जानते ही नहीं है, बात की है, उन्हें समझाने की कोशिश की है कि मारने-पीटने से बच्चे पर गलत असर होता है। शुरू में लगता था कि यह उनके खून में है कि वे अपने बच्चों के साथ हिंसा का रास्ता अपनाएं लेकिन बाद में हमें समझ में आ गया कि वे जानते ही नहीं है कि मारने-पीटने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी अपनाया जा सकता है। और यही बात है, जिसे उन्हें समझना चाहिए। वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं। उन्हे चाहिए कि वे यह सीखने की कोशिश करें कि अपने बच्चों को बड़ा कैसे किया जाता है, कैसे बिना मारे-पीटे उनका लालन-पालन किया जा सकता है। फिलहाल हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि ये बच्चे अपने अभिभावकों और आसपास के दूसरे लोगों के आतंक से मुक्त होकर बड़े हो सकें।

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