अपने बच्चों के साथ बहुमूल्य समय गुजारने का मौका कभी न छोड़ें – 23 अप्रैल, 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि आजकल मैं अपरा के साथ कितना अच्छा समय व्यतीत कर रहा हूँ! अब मुझे इस बात का पहले से भी ज़्यादा एहसास हो रहा है कि आपका कोई बच्चा हो, यह बात आपको कल्पनातीत सुख पहुंचाती है।

कुछ सप्ताह पहले, एक छोटे से वक्फ़े के लिए-शायद कुछ दिन या एक या दो हफ्ते के लिए, अपने काम में मैं कुछ ज़्यादा ही व्यस्त हो गया था। सामान्य से कुछ ज़्यादा ही और जब आप एक साथ कई काम करते हैं तो ऐसा होना विशेष आश्चर्य की बात भी नहीं है। आप जानते हैं कि हमें एक साथ अपनी वैबसाइट अपटूडेट रखनी पड़ती है, अपने चैरिटी के कामों में व्यस्त रहना होता है, अपनी कंपनी और रिट्रीट्स का काम देखना होता है, स्कूल के बच्चों के काम होते हैं और आश्रम के मेहमान… तो, कुल मिलाकर कुछ दिनों के लिए कुछ ज़्यादा ही काम हो गया था और व्यस्तता में मुझे इसका एहसास भी नहीं हुआ कि मैं आजकल अपरा के साथ बहुत कम समय गुजारता हूँ।

हालांकि मैं हर वक्त वहीं रहता था, पूरे समय वह मेरी नज़रों में बनी रहती थी, उसके साथ ही मैं भोजन करता था लेकिन मेरे पास कोई अतिरिक्त समय उसके साथ खेलने के लिए नहीं होता था। फिर एक दिन मैंने अचानक महसूस किया कि मैं उसके साथ गुज़ार सकने का यह मौका खो रहा हूँ, जब मैं यहीं इधर से उधर घूमता रह सकता हूँ, उसे अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुना सकता हूँ या सिर्फ सोफ़े पर बैठकर उसे दुलार सकता हूँ उसे गले से लगा सकता हूँ। मैंने तुरंत तय किया कि इस स्थिति को बदला जाना चाहिए।

मैं इस बात की शिकायत कर सकता था, दुखी हो सकता था कि मेरे पास इतना ज़्यादा काम है कि अपनी बेटी के साथ खेलने के लिए समय ही नहीं निकाल पाता। लेकिन मैंने वह नहीं किया। उसकी जगह मैंने अपने सारे कामों को पीछे छोड़ दिया और निश्चय किया कि अपरा के साथ मैं अब ज़्यादा समय व्यतीत करूंगा क्योंकि वही मेरी सबसे मुख्य प्राथमिकता है।

मैंने पक्का निर्णय कर लिया और सोचा कि मेरे लिए कोई भी बात मेरी बेटी से ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। एक दिन में करने के लिए इतने सारे काम होते हैं और सभी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं- लेकिन भविष्य में वे इतने ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं होंगे कि अपनी बेटी के साथ व्यतीत किया जाने वाला समय भी उन्हीं कामों में खपा दूँ! सभी चीज़ें कल भी वैसी ही रहेंगी यानी जीवन का यह खेल चलता रहेगा लेकिन आपके बच्चे की जो उम्र आज है, हमेशा नहीं रहेगी।

तब से मैं अपने बेटी के साथ, पहले की तरह, ज़्यादा समय गुज़ार रहा हूँ और जितना ही मैं ऐसा कर रहा हूँ उतना ही मैं खुद को पुरस्कृत महसूस करता हूँ! स्वाभाविक ही, तात्कालिक सुख तो है ही लेकिन यह भी तो है कि प्रतिदान स्वरूप वह मुझे कितना कुछ देती है! जब वह थक जाती है तो मुझे पूछती है और आकर सीधे लिपट जाती है। वह हमारे छोटे-मोटे कामों में शामिल होती है: जब मैं उससे कहता हूँ कि चलो टहलने चलते हैं तो वह कहती है, अपना धूप का चश्मा पहन लीजिए और जैसे ही हम बाहर निकलकर घूमना शुरू करते हैं वह कहती है, कहानी सुनाओ।

यह शुद्ध प्रेम है, जो मुझे हर बार उससे प्राप्त होता है और हर बार मैं उसे शिद्दत के साथ महसूस करता हूँ और मैं खुश हूँ कि मैं कितना भी व्यस्त रहूँ मैं ऐसी परिस्थिति निर्मित कर सका, इतना समय निकाल सका कि रोज़ नियमित रूप से अपनी बेटी के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकूँ और यह भी कि हमारे पास हमारी प्यारी अपरा मौजूद है।