क्या आप अपने बच्चों को इसलिए मारते हैं कि वे बड़ों की तरह व्यवहार नहीं करते? 6 नवंबर 2013

पालन पोषण

कल मैंने आपको बताया था कि भारत में बच्चों का पिटना इतना सामान्य कैसे है। हमने पहले भी इस समस्या पर लिखा है और इस बात का ज़िक्र भी किया है कि भारत में मौखिक हिंसा का प्रयोग शारीरिक हिंसा से भी ज़्यादा सामान्य बात है। मगर अब यह मामला हमें और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण लगता है और कारण साफ है: अब हम अपरा के माता-पिता हैं!

बच्चों के प्रति हिंसा कम हो इसके लिए हम पहले से ही प्रयत्नशील रहे हैं और यही कारण है कि हमारे स्कूल का सबसे मुख्य नियम यह है कि किसी भी बच्चे को मारा-पीटा न जाए और वे पूरी तरह अहिंसक वातावरण में पढ़ाई कर सकें। हम यह भी जानते हैं कि सभी नहीं तो अधिकतर बच्चे अपने घरों में पीटे जाते हैं और यह भी कि भारत में यह एक बहुत ही सामान्य बात है। अपने मित्रों के घरों में यह दृश्य हम कई बार देख चुके हैं। आश्रम में आने वाले हमारे भारतीय मेहमान भी आश्रम के बच्चों के संदर्भ में कई बार यही मत व्यक्त करते रहे हैं।

बच्चे शैतानियाँ करते हैं और इधर-उधर धींगा-मस्ती करते ही रहते हैं। यह बिल्कुल स्वाभाविक बात है लेकिन एक बार एक व्यक्ति ने यह देखकर कहा: ये बच्चे एकदम बिगड़ चुके हैं! यह आम धारणा है कि "छड़ी लागे छमछम, विद्या आए घमघम"! या यह कि अगर आप बच्चों की पिटाई न करें तो वे बिगड़ जाते हैं। यानी, वे अनुशासन में रहना नहीं सीख पाते और उन्हें काबू में रखने के लिए उन्हें मारना-पीटना ज़रूरी होता है। विडम्बना यह कि मैंने कई ऐसे भी परिवार देखे हैं, जहां बच्चों को मारा पीटा जाता है मगर उनके बच्चे शिष्टाचार और अनुशासन के मामले में बेहद खराब होते हैं। इसका कारण यह होता है कि एक सीमा के बाद बच्चे अपने अभिभावकों के प्रति बिल्कुल बेपरवाह हो जाते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि अपने माता-पिता से उन्हें मार तो खानी ही है।

समस्या यह है कि ऐसे अभिभावक इस बात को समझ ही नहीं पाते कि आखिर बच्चों और बड़ों में क्या अंतर है। बच्चे शैतानियाँ करते हैं क्योंकि वे बच्चे हैं! अगर आप वही शैतानियाँ करेंगे तो यह अजीबोगरीब और गलत लगेगा। लेकिन वे बच्चे हैं। आप सोचते हैं कि बच्चा मूर्ख और नासमझ है लेकिन आप यह नहीं समझ रहे हैं कि वह ‘महज’ एक बच्चा है और बड़ों की (आपकी) बात नहीं समझ पाएगा। सच्चाई यह है कि आप स्वयं मूर्ख हैं, जो यह अपेक्षा रख रहे हैं कि एक बच्चा बड़ों की तरह व्यवहार करेगा! आपको ही यह समझना होगा कि वे बच्चे हैं इसलिए उन्हें शैतानियाँ करने का हक़ हासिल है। वे शैतानियाँ करके दुनिया की खोजबीन करते हैं, उसे समझने की कोशिश कर रहे होते हैं और यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि उन्हें बताएं कि क्या नहीं करना चाहिए और क्या वे कर सकते हैं या क्या उनके लिए खतरनाक हो सकता है और क्या नहीं!

हमारे आश्रम में आजकल अपरा की उम्र के कुछ बच्चे हैं और स्वाभाविक ही जब वे खेल रहे होते हैं तो किसी न किसी अभिभावक को उनकी तरफ ध्यान रखना पड़ता है। वे आपसे बातें करने की कोशिश करते हैं और आपको उन्हें जवाब देना होता है, उन्हें खेल दिखाना होता है या खेलना सिखाना पड़ता है। खिलौनों के लिए उनके बीच होने वाली छोटी-मोटी लड़ाइयों का आपको निपटारा करना होता है और उनकी धमाचौकड़ी से होने वाले नुकसान से उन्हें बचाना भी पड़ता है। हमारा बच्चा भी उन बच्चों के साथ खेलता है और स्वाभाविक ही हम नहीं चाहेंगे कि कोई उसे या उसके साथ खेलने वाले किसी भी बच्चे को मारे-पीटे! बल्कि इससे बढ़कर, हमने मौखिक हिंसा सहित किसी भी प्रकार की हिंसा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हुआ है। कोई भी मेरी बच्ची को या उसके साथ खेलने वाले किसी भी बच्चे को यह भी नहीं कह सकता कि उसे किसी भी कारण से पीटा जाएगा!

हम चाहते हैं कि हमारी बच्ची अहिंसक और सुरक्षित माहौल में बड़ी हो और किसी से मार खाने का या मार पड़ने की धौस का उसे कोई डर न रहे। हमारे कर्मचारियों को शुरू से यह बात सिखाई गई है कि वे किसी बच्चे को डराएँ-धमकाएँ नहीं, उनकी जरूरतों पर तुरंत हाजिर हों और कोई शैतानी करने पर उन्हें समझाएँ कि क्यों यह शैतानी उन्हें नहीं करनी चाहिए। आज भी इस बात पर हमारा सबसे ज़्यादा ज़ोर है और आगे भी हम देखेंगे कि सभी कर्मचारी यह बात अच्छी तरह से समझ लें कि बच्चों पर खीझना या चीखना-चिल्लाना और धौंस जमाकर उनसे कोई बात मनवाना हमारे यहाँ पूरी तरह मना है। उसके स्थान पर उन्हें उनके साथ प्यार से पेश आना होगा।

हमारा बच्ची की खातिर, हमारे बच्चों की खातिर!

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