विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के चलते बच्चे कैसे हों इस पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण – 15 अप्रैल 2013

आज मैं हमारी बिटिया, अपरा, उसका परिवेश, दूसरे बच्चे और देश-विदेश के लोग जो उससे मिलते रहते हैं, इन सब बातों पर अपने अनुभव प्रस्तुत करूंगा।

अपरा अब ठुमक-ठुमककर चलने वाली 15 माह की लड़की है- मुझे बताया गया है कि वह अब बच्ची नहीं रही और हम एक नए स्तर पर पहुँच गए हैं। यह हम हर हफ्ते अनुभव करते रहे है, असल में हर दिन जब से वह पैदा हुई है। वह इतना तेज़ी से सीख रही है कि वह हमें बार-बार किसी न किसी नई कारस्तानी से हतप्रभ कर देती है! वह काफी समय पहले बोलना सीख गई थी और अब उसका शब्दज्ञान इतना ज़बरदस्त हो चुका है कि आप उसके साथ छोटा-मोटा वार्तालाप भी कर सकते हैं! इस दृष्टि से हमारे आसपास के उसकी उम्र के दूसरे बच्चों से वह बहुत आगे निकल चुकी है। हमें लगता है कि इस तीव्र विकास का कारण यह है कि पहली बार आँखें खोलने के साथ ही उसे विभिन्न लोगों के संपर्क में आने का और उनसे घुल-मिल जाने का मौका दूसरों की तुलना में अधिक प्राप्त हुआ।

वह हर वक़्त बहुत से लोगों से घिरी होती है- कभी वह मेरे और अपनी माँ साथ खेलती है, फिर वह अपने किसी चाचा के साथ, अपने दादा या अपनी परनानी के साथ गप्प लड़ाने चल देती है। सिर्फ इतना ही नहीं, जब उसका मन करता है वह अपने छह बड़े भाइयों के साथ खेलने चली जाती है जो उसके साथ अपने अलग-अलग तरह के खेल खेलते हैं। इसके अलावा आश्रम के अन्य सदस्य, हमारी रसोई के कर्मचारी, बगीचे में काम करने वाले और बहुत से दूसरे लोग भी उसके लिए अनजान नहीं हैं! वह सभी को उनके नामों से जानती है और खुद बिना किसी सहायता के रसोई में चली जाती है और खाने की विभिन्न चीज़ें मांगने लगती है, बगल में बंधी हुई गायों के पास चली जाती है और बगीचे के काम में मदद करने की कोशिश करती है। जिसके भी संपर्क में आती है वह उससे कुछ न कुछ बात करते हुए उसे बहुत से नए शब्द सिखाता चलता है और आसपास की दुनिया के बारे में नई जानकारियाँ भी देता है।

हमारे लिए यह शुरू से साफ है कि यह अच्छी बात है और मैं एक बार वाकई आश्चर्य में पड़ गया जब आश्रम में आए कुछ पश्चिमी मेहमानों ने इस सच्चाई पर चिंता व्यक्त की। उन्हें संदेह था कि क्या कभी हमारी बेटी अकेले अपने आपको व्यस्त रखने का पाठ भी सीख पाएगी। वे सोच रहे थे कि उसे हमेशा किसी खेलने वाले की आवश्यकता होगी और उन्होंने कहा कि बाद में उसकी माँ को कितनी परेशानी हो सकती है जब उसके साथ समय बिताने के अलावा वह दूसरा कुछ कर ही नहीं पाएगी। हमने उन्हें बताया कि हमारे यहाँ आम तौर पर ऐसी परेशानियाँ पेश नहीं आतीं क्योंकि हमेशा कोई न कोई उसके साथ खेलने के लिए लालायित व्यक्ति मिल ही जाता है, बल्कि कई लोग अपनी बारी आने का इंतज़ार करते हैं। लेकिन क्या कभी उसे अपना एकांत, अपना व्यक्तिगत समय और शांति भी मिल पाएंगे? इस तरह के उनके प्रश्न थे।

जी हाँ, मेरे प्रिय मित्रों, मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूँ कि जो कुछ उसके लिए सीखना ज़रूरी था, उसने सीख लिया है! जब बच्चे उसके ज़्यादा करीब आने लगते हैं और उसे अच्छा नहीं लगता तो वह उन्हें मना करती है, अधिकतर ‘ना’ कहकर और अगर वे नहीं मानते तो ज़ोर से चीख-पुकार मचा देती है कि उसे अपने लिए ज़्यादा जगह चाहिए और अभी वह नहीं चाहती कि कोई उसे हाथ भी लगाए, प्यार करे या गोद में ले। वह खिलौने लेकर आधा-आधा घंटे लकड़ी के गुटकों और छोटे-छोटे टुकड़ों को जमाकर कुछ न कुछ बनाने का खेल खेलती रहती है। कभी अपने रंगों का बक्सा निकालकर चित्र बनाती है या पेंटिंग करती है तो कभी किताबों में चित्रित जानवरों को काल्पनिक खाना खिलाने लगती है। बीच-बीच में वह सिर उठाकर देखती रहती है कि हम लोग आसपास हैं या नहीं और जब कुछ बना लेती है तो हमारे पास आकर हमें दिखाती है कि देखो मैंने क्या बनाया! उसे इस तरह खेलते देखना बहुत मोहक होता है- आप देख सकते हैं कि वह कैसे अपनी नई जानकारियों को आवश्यकतानुसार ढालकर व्यवहार में ला रही है, जो आपने उसे सिखाया या दिखाया था उसे दोहरा रही है, दो-तीन शब्दों के वाक्यों में, उन शब्दों को बुदबुदाते हुए, जो उसने अभी-अभी सुने थे।

कुछ दिन पहले एक भारतीय महिला की टिप्पणी सुनकर मुझे पुनः संकृतियों की भिन्नता के बारे में याद करते हुए हंसी आ गई: हमारे स्कूल की एक शिक्षिका अपनी बच्ची को लेकर आई, जो अब दो साल की है। दोनों बच्चियाँ एक-दूसरे को देखकर बहुत खुश हुईं और अपरा उसे आसपास पड़ी अपनी किताबें और खिलौने दिखाने लगी। कुछ देर उस लड़की के साथ बिताने के बाद वह अचानक एक कार लेकर उसे इधर-उधर दौड़ने लगी। उस शिक्षिका ने कुछ चिंताजनक स्वर में कहा, ‘अरे, यह तो अकेले खेलना पसंद करती है!’ रमोना ने हँसते हुए उसे आश्वस्त किया कि वह बिल्कुल भी एकाकी लड़की नहीं है और निश्चय ही दूसरे बच्चों के साथ भी बहुत खेलती है!

तो आपने देखा, हमारा सांस्कृतिक परिवेश ‘बच्चों को कैसा होना चाहिए’ यह तय करता है और हम अपने-अपने सांस्कृतिक परिवेश के अनुसार ही अपने बच्चों के व्यवहार को भिन्न-भिन्न मानदंडों पर तौलते हैं। लेकिन यह भी सच है कि हम सब अपने बच्चों की खुशी के लिए अच्छा से अच्छा और ज़्यादा से ज़्यादा करने की कोशिश करते हैं। हम इस विषय पर लिखी एक से एक बेहतरीन किताबें पढ़कर और लोगों से सुनी हिदायतों के अनुसार बच्चों की परवरिश कर सकते हैं मगर मैं समझता हूँ कि हमें अपने बच्चों को ज़्यादा से ज़्यादा प्रेम देना चाहिए और इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं करनी चाहिए कि दूसरे क्या कहते हैं। आपका बच्चा जैसा है, ठीक है और आप एक अच्छे पालक हैं। हर बच्चा दूसरे बच्चों से अलग परिवेश में विकास करता है और मैं समझता हूँ कि अगर आप भी मेरी बात पर थोड़ा गौर करें तो अपने बच्चों की खुशी के लिए आप भी उनसे अधिक से अधिक प्रेम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे -और इतना काफी होगा!

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