प्रिय भारतीय अभिभावक: मैं अपने बच्चे को आपके पास क्यों नहीं छोड़ सकता! 19 फरवरी 2014

प्रिय भारतीय अभिभावकगण,

मुझे आपसे एक शिकायत है।

यह सिर्फ मेरी और आपकी ही समस्या नहीं है लेकिन हाँ, यह एक ऐसी समस्या है, जो आपके व्यवहार के चलते पैदा होती है। लेकिन वह मेरे लिए साफ इशारा है कि मैं अपने बच्चे को आपके घर पर अकेला न छोड़ूँ।

ईमानदारी की बात यह है कि मैं स्वयं भी ज़्यादा देर तक आपके साथ और आपके बच्चों के साथ नहीं रह सकता।

आप पूछेंगे: क्यों?

क्योंकि आप अपने बच्चों की पिटाई करते हैं। क्योंकि आप हमेशा अपने बच्चों को मारने-पीटने की धमकी देते रहते हैं, भले ही उस वक़्त आप उसे न मार रहे हों। क्योंकि हिंसा आपके घर की हवा में उपस्थित है, वह आपके परिवार के वातावरण में रच-बस गई है।

मैं यह जानता हूँ कि आप मेरे बच्चे को कभी नहीं मारेंगे। मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी उपस्थिति में आप अपनी हिंसा पर लगाम लगाने पर मजबूर हो जाते हैं, कि आप कोशिश करते हैं कि आप अपने बच्चे को भी न मारें और अगर अचानक आपका हाथ आदतन उठ भी जाता है तो मैं आपकी आँखों में क्षमा-याचना, अपराधबोध और एक तरह की अपरिभाषेय अनुभूति को पढ़ पाता हूँ। मुझे लगता है कि तब आप यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि देखिये, मेरा बच्चा कितना शरारती है। जैसे मैं मान लूँगा कि बच्चे की शरारत पर आपका एक झापड़ किस तरह बिल्कुल जायज़ है।

लेकिन मैं ऐसा नहीं समझता। किसी भी सूरत में नहीं!

मैं आपके बच्चे के लिए करुणा से भर उठता हूँ। एक बच्चा जो बचपन की शुरुआत से ही यह सीख रहा है कि हिंसा भी एक प्रत्युत्तर हो सकता है। एक बच्चा जो प्रेम से सिखाए जाने की जगह मानसिक रूप से टूट चुका है। क्योंकि आप कुछ भी कहें, मैं आपके थप्पड़ में कोई प्रेम नहीं देख पाता। मैं देखता हूँ कि आप अपने बच्चे को आहत कर रहे हैं। भले ही यह आघात हमेशा के लिए नहीं है या शारीरिक रूप से नहीं है तो भी मानसिक आघात तो है ही। मैं आपके बच्चे के लिए दुख महसूस करता हूँ।

लेकिन इससे बढ़कर यह कि मैं अपने बच्चे को इस हिंसा से दूर रखना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि मेरा बच्चा यह सोचे भी कि मार खाना ठीक हो सकता है। मैं नहीं चाहता कि मेरा बच्चा यह धमकी सुने कि उसका मित्र खेल-खेल में जो कर रहा है, जो अपने खिलंदड़ेपन में वह करना चाहता है, जिसे वह समझने की कोशिश कर रहा है, खोज रहा है, जान रहा है, उस पर आप उसकी पिटाई कर सकते हैं।

मैं जानता हूँ कि कभी न कभी मेरी बच्ची हिंसा को अपनी आँखों से देखेगी। कुछ बड़ी होने पर वह अपनी किसी सहेली के यहाँ आई हुई होगी और नहीं चाहती होगी कि अब भी मैं उसके साथ हर जगह जाऊँ। वह देखेगी कि आप उसकी मित्र को पीटने की धमकी दे रहे हैं या इससे बढ़कर, वह अपनी सहेली को थप्पड़ खाता देख लेती है।

लेकिन उस दिन के आने तक मैं अपनी बच्ची को यह अच्छी तरह समझा चुका होऊंगा कि हिंसा अनुचित है। मैं यह सुनिश्चित कर चुका होऊंगा कि उसके भीतर यह मानसिक शक्ति आ जाए कि वह इस हिंसा को झेल सके और शायद यह हिम्मत भी आ जाए कि वह आपसे कह सके कि अपनी बेटी के साथ आपकी हिंसा गलत है। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि वह उस पीढ़ी की एक लड़की बने जो देश में एक परिवर्तन ला सकती है, जैसा कि उसकी माँ के देश में हुआ है।

मैं जानता हूँ कि अगर मैं आपका निमंत्रण स्वीकार न करूँ तो आपको बुरा लगेगा। मैं जानता हूँ कि बहुत आवश्यक होने पर अपनी बेटी के साथ आपके यहाँ आऊँ और आपके घर पर ज़्यादा देर न रुकूँ तो आप दुखी होंगे। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि अपने दिल की गहराइयों में आप भी जान रहे हैं कि मेरी सोच उचित ही है। अगर आप अभी नहीं समझ पा रहे हैं तो जब हमारे बच्चे बड़े हो जाएंगे, तब समझ जाएंगे।

तब तक मैं अपने घर में अपनी बच्ची के लिए एक हिंसा रहित जगह और माहौल तैयार कर रहा हूँ। वह मार नहीं खाएगी, वह मार-पीट के बारे में सुन भी नहीं पाएगी और न ही अपने मित्रों को पिटता देखेगी। अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे कुछ अलग माहौल देख सकें, एक अलग अनुभव प्राप्त कर सकें तो उन्हें हमारे यहाँ भेजिए। देखें कि यह कितने शांतिपूर्ण तरीके से, बिना हिंसा के और प्यार भरे वातावरण में संभव होता है।

इस आशा के साथ कि आप यह बात समझेंगे,

प्यार सहित, आपका अपना,

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