अपरा की बीमारी और इस दौरान उसके साथ हुए रोमांचक अनुभवों के बारे में बताने के बाद आज मैं आपको अपरा द्वारा अभी हाल ही में उठाए गए एक और बड़े कदम के बारे में बताना चाहता हूँ: उसने माँ का दूध पीना छोड़ दिया है, अंग्रेज़ी में कहें तो "Apra is now fully weaned"। क्योंकि यह बड़ी आसानी से हो गया, हमारी अपेक्षा से अधिक आसानी से, इसलिए यह कैसे हुआ, इसका विवरण मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन ऐसा करने से पहले आइए देखते हैं कि रमोना और मेरी परम्पराओं में यानी पश्चिमी और भारतीय संस्कृतियों में, जिनका मिला-जुला रूप हम अपरा को प्रदान कर रहे हैं, स्तनपान का क्या स्वरूप है और दोनों में क्या भिन्नताएँ या समानताएँ हैं।
पश्चिम में महिलाएँ सामान्यतः मुश्किल से छह माह तक बच्चों को स्तनपान कराती हैं। बहुत सी महिलाएँ तीन माह के बाद ही बंद कर देती हैं और कुछ स्तनपान कराती ही नहीं हैं। गर्भावस्था के समय ही महिलाएँ यह तय कर लेती हैं कि बच्चा होने के बाद वे स्तनपान कराएँगी या नहीं, कराएँगी तो कितने समय के लिए कराएँगी या अपने नवजात बच्चे को शुरू से सिर्फ बच्चों को पिलाने वाला नुस्खा पिलाएँगी। स्वाभाविक ही कई औरतों में दूध न आने की समस्या होती है और जिनके बच्चों को माँ का दूध नहीं मिल पाता मगर यह भी सच है कि बड़ी संख्या में पश्चिमी औरतें शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी अपने नवजात शिशुओं को स्तनपान न कराने का निर्णय लेती हैं।
उनका काम इसके आड़े आता है। औरतें बहुत जल्दी काम पर चली जाती हैं क्योंकि पेशे के प्रति निष्ठा उन्हें अपने काम से अधिक समय के लिए दूर नहीं रहने देती। सिर्फ कुछ माह बाद ही दूध छुड़ाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया को झेलने की कल्पना से कुछ महिलाओं को स्तनपान कराना ही व्यर्थ लगने लगता है। कुछ महिलाएँ ब्रेस्ट-पंप की सहायता से अपना दूध निकालकर बोतल में दूध पिलाने का विकल्प अपनाती हैं, जिससे बच्चे को अपनी माँ के दूध का लाभ बराबर मिलता रहे। दूसरी महिलाएँ शुरू से ही बाज़ार में मिलने वाला नवजात शुशुओं के लिए विशेष रूप से तैयार नुस्खा (बेबी-फार्मूला) पिलाती हैं। लेकिन यह तथ्य मुझे विचलित कर देता है क्योंकि स्तनपान न सिर्फ बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है-जोकि कोई भी नुस्खा नहीं कर सकता-बल्कि वह माँ और बच्चे के बीच घनिष्ठ रिश्ता कायम होने के लिए बहुत ज़रूरी होता है।
तो यह तो वस्तुस्थिति हुई मगर अलग तरह के विचार रखने वाले लोगों में-योग और दूसरी कोई वैकल्पिक जीवन पद्धति अपनाने वाले या आध्यात्मिकता और नैसर्गिक जीवन में यकीन करने वाले लोगों में-ऐसी औरतें मिल ही जाती हैं, जो तब तक स्तनपान कराती रहती हैं जब तक कि बच्चा खुद स्वेच्छा से दूध छोड़ न दे। जब तक कि माँ के दूध से उसे विरक्ति न हो जाए। मूलतः मैं इस विचार का समर्थक हूँ लेकिन फिर ऐसे बच्चे तीन, चार, छह, यहाँ तक कि आठ साल तक भी दूध पीते रह सकते हैं! माँ की छाती से लगकर दूध पीने के लिए निश्चय ही यह उम्र कुछ ज़्यादा ही कही जाएगी!
भारत में ज़्यादातर बच्चों को दो या तीन साल तक स्तनपान कराया जाता है। परंपरागत रूप से अक्सर औरतें काम पर नहीं जातीं और जाती भी हैं तो तब, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं। यानी माँएँ बच्चों के लिए घर पर ही उपलब्ध रहती हैं और बच्चो को स्तनपान करा सकती हैं। बड़े परिवारों में अक्सर बहुत से नवजात बच्चे होते हैं और इसलिए कई औरतें न सिर्फ अपने बच्चे या बच्ची को बल्कि अपने भतीजों और भतीजियों को, यहाँ तककि आस-पड़ोस के बच्चों तक को अपना दूध पिलाती हैं! स्वाभाविक ही इससे न तो माँ के दूध की आपूर्ति कभी रुकती है और न ही वह कभी कम होती है।
जबकि परंपरा से यह अक्सर होता रहा है और लोग इसके आदी हैं लेकिन शहरों में अब, स्वाभाविक ही, स्थिति बदल रही है। औरतें अब बड़ी संख्या में नौकरियाँ कर रही हैं, जहाँ जर्मनी की तरह नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं हैं कि एक निश्चित संख्या में कुछ महीनों का सवैतनिक अवकाश मिल सके। यहाँ अधिकांश कंपनियों में अगर आप नौकरी पर नहीं आए हैं तो अक्सर वेतन से आपके पैसे काट लिए जाते हैं और अगर साल भर तक आपका यही रवैया रहा तो संभव है आपको नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाए। तो आधुनिक भारतीय महिलाएँ दूध जल्दी छुड़ा देती हैं और अगर वे नौकरी करते रहना चाहती हैं तो बाज़ार में मिलने वाले नुस्खों से काम चलाती हैं।
आप हमारे स्कूल के बच्चों की माँओं जैसी गरीब औरतों के बारे में सोच रहे होंगे, जिन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अक्सर कोई न कोई काम करना पड़ता है। भारत में ऐसी औरतों और उनके होने वाले बच्चों के लिए काम करने की जगह पर मातृत्व अवकाश का कोई प्रावधान नहीं होता और न ही बच्चों के लिए कोई सुविधा या अभिभावकों के लिए किसी निधि की व्यवस्था होती है। यह कटु यथार्थ है कि गरीब औरतें गर्भावस्था में या बच्चा हो जाने के बाद काम से ज़्यादा समय तक दूर नहीं रह सकतीं। वे बच्चा होते ही जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ी हो जाती हैं और अपने नवजात शिशु को एक कपड़े में लपेटकर काम पर ले आती हैं और वहाँ कठोर से कठोर काम करने के लिए मजबूर होती हैं। बच्चा हर वक़्त माँ के शरीर की गर्माहट महसूस करता रहता है और फसल काटते हुए या लकड़ी बीनते हुए या बालू ढोते हुए वह छोटे-छोटे अवकाश ले लेती है और बच्चे को स्तनपान कराती है।
मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बात गलत या सही है। आपको अपनी परिस्थिति के अनुसार अपने लिए सही या गलत का निर्णय करना होता है कि आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। लेकिन मैं दिल से चाहता हूँ कि जो लोग सक्षम हैं वे स्तनपान द्वारा प्राप्त होने वाले प्रेम और सुरक्षा के एहसास को, माँ और बच्चे के बीच उसके ज़रिए पैदा होने वाले स्नेहासिक्त संपर्क और जुड़ाव को पैसे और अपने काम से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानें। हाँ, तभी जब आप खुद उससे संतोष और खुशी महसूस करें।
अपरा का दूध छुड़ाने के अपने निर्णय के बारे में मैं आपको कल बताऊँगा और यह भी कि कैसे उसे क्रियान्वित करना हमारी अपेक्षा से ज़्यादा आसान रहा।
Related posts
अपने बच्चों के सामने दूसरे बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करें – 18 अगस्त 2015
कैसे सतत मार्गदर्शन बच्चों के विकास में बाधा पहुँचाता है – 11 अगस्त 2015
बच्चों के पालन-पोषण का आनंद: समस्याएं, समाधान और पुनः नयी समस्याएं – 22 अप्रैल 2015
अपने बच्चों को टीवी से दूर रखें – यह उनके लिए नुकसानदेह है! 21 अप्रैल 2015
अपने बच्चों को व्यस्त और टीवी से दूर रखें लेकिन इसलिए नहीं कि वे आप पर बोझ हैं! 20 अप्रैल 2015
अपने बच्चों के साथ सेक्स के बारे में बात करना क्यों ज़रूरी है – 2 अप्रैल 2015
अपने प्रथम विश्व के बच्चों को भारत जैसे कम विकसित देशों का दर्शन क्यों करवाना चाहिए? 12 मार्च 2015
ईश्वर के बगैर बच्चों का लालन-पालन करना – 24 फ़रवरी 2015
अपने बच्चों को गंभीरता से लें – उनके साथ बात करें! 15 जुलाई 2014
