शिक्षा उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है। इसी ध्येय-वाक्य के आधार पर ही हम अपना चैरिटी स्कूल चला रहे हैं। मैं उसके औचित्य पर विश्वास करता हूँ और इसीलिए हम गरीब बच्चों को पूरी तरह मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन कई बार मुझे यह देखकर बड़ी हैरानी होती है कि अभिभावक, विशेष रूप से अमीर अभिभावक इस ध्येय को किसी भी कीमत पर प्राप्त करने के उद्देश्य से अपने बच्चों के साथ बहुत ज़्यादती कर बैठते हैं। कई बार मुझे लगता है कि शिक्षा की बलिवेदी पर वे प्रेम, परिवार और घर में मिलने वाली सुरक्षा और ऊष्मा की बलि चढ़ा देते हैं।
कुछ दिन पहले एक परिचित ने बताया कि उसके दोनों बच्चे एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहे हैं, जो वृन्दावन से 600 किलोमीटर दूर स्थित है। हर दूसरे सप्ताह सिर्फ अपने बच्चों से मिलने के लिए पति-पत्नी दोनों दस घंटों का लम्बा और कठिन सफ़र तय करते हैं। क्यों? क्योंकि वह एक प्रतिष्ठित स्कूल है और हमारे इलाके में उसके जैसी उत्तम शिक्षा प्रदान करने वाला दूसरा कोई स्कूल नहीं है। दोनों बच्चे पिछले छह साल से उस स्कूल में पढ़ रहे हैं और लड़का 18 साल का है और लड़की 16 साल की।
यह ऐसा अकेला व्यक्ति नहीं है। जिन लोगों की हैसियत है उनके लिए बहुत छोटी उम्र में ही अपने बच्चों को किसी अच्छे बोर्डिंग स्कूल में, जहाँ पढ़ाई के अतिरिक्त बहुत से दूसरे हुनर भी सिखाए जाते हैं, जहाँ बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित किया जाता है, उन्हें परवान चढ़ाया जाता है और फिर वहाँ से जो प्रमाणपत्र प्राप्त होता है वह उनके सामने देश के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों के दरवाज़े खोल देता है। फिर उन्हें सफलतम प्रबंधक, इंजीनियर या डॉक्टर बनने से कोई नहीं रोक सकता और यहाँ तक कि वे विदेशों में जाकर बसने की संभावनाएं भी खुल जाती हैं। यह एक बड़ा सुनहरा सपना होता है और वे अपने बच्चों के लिए उसे संभव बनाने में कोई कसर नहीं रखना चाहते।
वे सोचते हैं कि बच्चों के लिए जो भी अच्छा वे कर सकते थे, कर रहे हैं। मगर मैं ऐसा नहीं सोचता।
वास्तव में, मुझे लगता है कि यह बच्चों के लिए अच्छा नहीं है। अपनी दस साल की बच्ची को अपने प्यारे माँ-बाप से सैकड़ों किलोमीटर दूर भेजना आपके लिए ज़रूरी क्यों होना चाहिए? हाँ, उसे वहाँ एक से एक शानदार खेल खेलने का या आयातित रंगों से चित्रकारी करने का मौका मिलता है और हाँ, उसे अपने आसपास के स्कूलों में उपलब्ध शिक्षकों से बेहतर शिक्षक वहाँ उपलब्ध होते हैं। भविष्य में उसके लिए अच्छे विश्वविद्यालयों के दरवाज़े खुल सकते हैं, जिससे उसे बेहतर नौकरी और अच्छा पैसा कमाने का मौका मिल सकता है। लेकिन निश्चय ही उसका स्नेहिल परिवार उससे छीन लिया जाता है। माँ का प्यार और उसकी स्नेहसिक्त देखभाल से वह वंचित रह जाती है और उसकी जगह उसे ऐसे लोगों की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त होती है जो उसे एक कर्तव्य की तरह करते हैं। भले ही वे यह काम बहुत अच्छी तरह से अंजाम दें मगर दोनों में बहुत फर्क होता है।
आप माता-पिता क्यों बने हैं? अपने बच्चों से प्यार करने के लिए, उनकी देखभाल करने, उनका लालन-पालन करने और उनके साथ रहने के लिए? उन्हें गले लगाने के लिए, उनके साथ खेलने के लिए, उनके साथ हंसी-मज़ाक करने के लिए और दुख-सुख उनके साथ साझा करने के लिए? या महान इंजीनियरों या डॉक्टरों का निर्माण करने के लिए? अपने बच्चों को अपने से दूर रखने के लिए?
मैं दिल की गहराइयों से महसूस करता हूँ कि अभिभावकों को अपने बच्चे को अधिक से अधिक प्यार और नजदीकी प्रदान करनी चाहिए क्योंकि एक दिन ऐसा आने ही वाला है जब वे इतने बड़े हो जाएंगे कि अपना अलग घर बसा लेंगे और आपसे दूर हो जाएंगे। जब उनके लिए आपकी यानी अपने माता-पिता की ज़रूरत समाप्त हो जाएगी। बहुत ज़्यादा न पढ़ पाना बहुत बुरी बात नहीं है। उनके साथ बिताया एक एक पल और वास्तव में हर वह व्यवहार जो आप उनके साथ मिलकर करते हैं मेरी नज़र में सुदूर स्थित अच्छे स्कूल की पढ़ाई और वहाँ प्राप्त हर तरह के हुनर से ज़्यादा कीमती है।
क्योंकि सिर्फ आप हैं, जो अपने बच्चे को माता-पिता का प्यार दे सकते हैं।
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