भारत में बसी एक पश्चिमी माँ ने जब भारतीय अभिभावकों की हिंसा देखी! 20 फरवरी 2014

पालन पोषण

कल मैंने भारतीय अभिभावकों को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा था, जिसमें मैंने उनसे कहा था कि मैं अपने बच्चे को उनके यहाँ रुकने की इजाज़त नहीं दूंगा क्योंकि वे अपने बच्चों को मारते-पीटते रहते है। मुझसे पूछा गया कि यह पत्र मैं सामान्य भारतीय अभिभावकों को ध्यान में रखकर ही क्यों लिख रहा हूँ, जैसे सभी भारतीय अभिभावक अपने बच्चों की पिटाई करते हों! मुझसे कहा गया कि सिर्फ कुछ ही परिवारों में बच्चों को मारा-पीटा जाता है और इस बात का सामान्यीकरण करना ठीक नहीं है। मैं इस बात से असहमत हूँ। मैंने यह हमेशा देखा है और बहुत से परिवारों में और लगभग सभी भारतीय अभिभावकों के संबंध में अनुभव किया है।

रमोना ने भारत को अपना घर बना लिया है मगर वह एक ऐसी संस्कृति, देश और परिवार से आई है, जहां बच्चों को मारना-पीटना अतीत की बात हो चुकी है। वह दूसरे विश्व युद्ध के समय का एक काला अध्याय था, जब रमोना के नाना और दादा स्कूल जाया करते थे और जर्मनी में भी बच्चों को हिंसक सजाएँ दी जाती थीं। घर में उसे बताया गया था कि यह वहीं होता है जहां शिक्षा की कमी होती है या जहां व्यसन की समस्याएँ पायी जाती हैं या कोई गंभीर मसला होता है, जिसके कारण अभिभावक अपने बच्चों को इस तरह आपराधिक तरीके से मारते-पीटते हैं।

फिर वह भारत आ गई। स्वाभाविक ही वह हमारे स्कूल में अपनाए जा रहे अहिंसा के सिद्धान्त पर पूरी तरह विश्वास करती है। हमारे स्कूल में बच्चों की पिटाई पर पूरी तरह प्रतिबंध है लेकिन इसके बावजूद एक बार जब रमोना ने एक शिक्षिका को एक बच्चे को पीटते हुए देखा तो वह भीतर तक हिल गई, एक छोटे से बच्चे के साथ यह हिंसक व्यवहार देखकर उसका शरीर अक्षरशः कांपने लगा क्योंकि शिक्षिका उस बच्चे पर पिल पड़ी थी, जो उस विशालकाय शिक्षिका से बहुत छोटा था। हमने उस शिक्षिका को तुरंत बरखास्त कर दिया और रमोना को समझ में आया कि भारत के स्कूलों में हिंसा बहुत व्यापक रूप में जारी है। उसने शिक्षिकाओं की कार्यशालाएँ लीं, जिनमें वह उन्हें बताती कि किस तरह प्यार के साथ पढ़ाते हुए भी बच्चों का सम्मान पाया जा सकता है।

लेकिन मेरी पत्नी को एक और सदमा लगने वाला था: बच्चों के साथ मार-पीट सिर्फ स्कूलों में ही नहीं बल्कि उनके घरों में भी बहुतायत से व्याप्त है! वह मेरे साथ मेरे दोस्तों के यहाँ आने लगी और खुद आगे बढ़कर सबसे मित्रता स्थापित करने लगी। मित्रों के साथ उनके छोटे-छोटे बच्चों से भी। वह कभी-कभी उनके घर जाती और पाती कि उसके मुलाकातियों में किसी का घर ऐसा नहीं है, जहां बच्चों को मारा-पीटा न जाता हो।

हम लोग बैठे बातचीत में मशगूल है। बच्चे आसपास खेल रहे है। वे हल्ला-गुल्ला कर रहे हैं, वे आपस में लड़-झगड़ रहे हैं और बस… तड़ाक ….एक चांटा- माँ ने अपने पाँच साल के बेटे को एक तमाचा जड़ दिया है। वह भी बिना किसी चेतावनी के। एक दूसरा परिवार। रमोना अपने एक मित्र की तीन माह की बच्ची को गोद में लिए हुए है और उसकी चार साल की बड़ी बच्ची उनके चारों ओर नाच रही है। बड़ी बच्ची उनके घर हमारे आने से बहुत उत्तेजित है, अपनी सब चीज़ें, खिलौने आदि दिखा रही है और फिर अचानक उसने बेतुकी हरकतें करनी शुरू कर दी हैं ….. तड़ाक….. एक चांटा पड़ा है उसे! यहाँ उसकी दादी की ओर से। उसने रोना शुरू कर दिया है और उसकी माँ उसे दिलासा दे रही है- कह रही है, इतनी शैतानी नहीं करते, ज़्यादा मस्ती करने से पिटाई होती है! एक और घर। अपरा और उसकी दो साल की मित्र, दोनों खेल रहे हैं। वे दोनों एक नोटबुक में रंगीन पेंसिल से चित्र बना रहे हैं। अपरा की मित्र जिद कर रही है कि उसे अलग से पेंसिलें और नोटबुक चाहिए। जब उसे ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो वह चिड़चिड़ाहट में रोना-चीखना शुरू कर देती है। और फिर…. तड़ाक …. वही-दादी देती है गाल पर एक तमाचा। माँ चुप है, अपने चेहरे के भावों से दर्शा रही है कि उसके साथ ठीक हुआ है। रमोना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धडक रहा है और वह अपरा का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ने की कोशिश करती है मगर खुश है कि वह यह पिटाई देख नहीं पाई है क्योंकि वह चित्र बनाने में मशगूल है।

मेरी पत्नी जब हिन्दी समझने लगी तो यह देखकर उसे बड़ा ताज्जुब हुआ कि ‘तेरी पिटाई होगी’, ‘मैं मारूँगा या मारूँगी’ आदि वाक्य, जिन्हें बच्चों से उनकी शरारतों पर धमकी के रूप में अक्सर प्रयुक्त किया जाता है, यहाँ कितनी सहजता से इस्तेमाल किए जाते हैं। हमने आपस में निर्णय किया कि हमारी बच्ची और आश्रम के दूसरे बच्चे ऐसे शब्द कभी नहीं सुनेंगे।

भारत में एक ‘विदेशी’ महिला के ये अनुभव हैं। वह इन बातों को बाहर से देखती है और इसलिए देखकर स्तब्ध रह जाती है। वह इस दैनिक घरेलू हिंसा से उस तरह वाकिफ नहीं है जैसा कोई भारतीय होता है। वे तो इसे हिंसा मानते ही नहीं हैं। वह ऐसी अकेली विदेशी महिला नहीं है! उसकी एक पश्चिमी मित्र है जिसने एक भारतीय से विवाह किया है और उसका भी एक बच्चा है। वे लोग एक साल पहले तक भारत में ही रहा करते थे मगर अब वह भारत नहीं आना चाहती, यहाँ के हिंसक वातावरण से डरती है कि इस माहौल का बढ़ते हुए बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा।

नहीं, मेरे प्रिय भारतीय अभिभावकों! मुझे कहना ही चाहिए कि ये हिंसक घटनाएँ अपवाद स्वरूप नहीं है। बल्कि यह कहना चाहिए कि ऐसे अभिभावक ही अपवाद स्वरूप मिलेंगे, जो अपने बच्चो को मारते-पीटते नहीं हैं या उन्हें हिंसक धमकियाँ नहीं देते। दरअसल अब ऐसी घटनाओं का आप नोटिस ही नहीं लेते क्योंकि यह आपकी आदतों में शुमार हो चुका है और आपके लिए यह सहज सामान्य बात है। इस विषय में अवश्य सोचें-विचारें: मेरे शब्दों के प्रभाव में नहीं तो कम से कम यह सोचकर कि बच्चों के प्रति हिंसक व्यवहार से विदेशियों के बीच हमारे बारे में कैसी धारणा बन रही है!

%d bloggers like this:
Skip to toolbar