पूर्वजन्म के चक्कर में न पड़ें और वर्तमान में जियें – 2 अप्रैल 2008

कभी कभी मैं देखता हूँ कि कर्म और पूर्वजन्म को ले कर लोगो की बड़ी विचित्र धारणाएं हैं| जैसा कि मैंने परसों लिखा था, मुझसे कहा गया कि हम गरीबों का उद्धार नहीं कर सकते क्यों कि विपन्नता में रहना ही उनकी नियति है| मैं मानता हूँ कि हमें अच्छे कर्म का निर्माण करना चाहिए..और बच्चों को अच्छे कर्म करने तथा नेक, अच्छा और ईमानदार बनने की शिक्षा एवं प्रोत्साहन देना चाहिए| लेकिन मैं बुरे कर्म के डर और उसके साथ जोड़े गए अपराधबोध पर विश्वास नहीं करता| जब कुछ बुरा होता है तब मैं यह कहने में यकीन नहीं रखता कि ऐसा पूर्वजन्म के कर्मो के कारण हुआ है| एक तरफ तो लोग पूर्व कर्मों का बहाना बनाते हैं, जबकि सच तो यह है कि पूर्वजन्म के कर्मों को न तो अब आप नियंत्रित कर सकते हैं और न ही बदल सकते हैं| फिर इस जीवन में बुरे कर्मों के डर का निर्माण किया जाता है| लेकिन वर्तमान आप के हाथ में है, आप को निर्णय करना है कि आप क्या करेंगे?

कभी कभी मुझसे पूछा जाता है कि क्या मुझे पता है कि पूर्वजन्म में मैं क्या था..और मैं कहता हूँ कि मुझे ये जानने में कोई रूचि नहीं है..मैं यह जानना चाहता हूँ की मैं वर्तमान में क्या हूँ? मैं क्यों भूतकाल के बारे सोचूं और चिंता करू कि मैंने पूर्वजन्म में कितने बुरे कर्म किये हैं..जबकि मैं वर्तमान में,इस जीवन में इस पल में..बहुत से अच्छे कर्म कर सकता हूँ| क्यों लोग यह जानने को उत्सुक रहते हैं कि वो पूर्वजन्म में क्या थे? इसे जान कर क्या फायदा है? ऐसे कई लोगों से मुलाकात होती है जो यह बताते रहते हैं कि पूर्वजन्म में वो क्या थे..और कौन जानता है कि यह सच है या उन्होंने खुद ही एक कहानी बना ली है| मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता जब लोग इस तरह की बातों से घबरा कर अपने पूर्वजन्म के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं और वो पूर्वजन्म में किये गए बुरे कर्मों को सुधारने या उसे बदलने की कोशिश करते हैं| और कुछ लोग तो बाकायदा पूर्वजन्म सुधारने की सेवा प्रदान कर रहे हैं| मेरा मानना है कि आप वर्तमान में सब कुछ कर सकते हैं और इसलिए आप को पिछले जीवन की चिंता नहीं करनी चाहिए|

शायद मैंने पहले भी कहा है- "हम भूत के पश्चाताप और भविष्य की चिंता में वर्तमान के आनंद को क्यों नष्ट करें?" वर्तमान की, इस क्षण की शक्ति को पहचानिए| दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग भूत के विलाप और भविष्य की चिंता में वर्तमान के आनंद को खो देते हैं | अपने जीवन में स्थायित्व और सुरक्षा की बात सोचना अच्छा है, और स्वाभाविक भी मगर इस उधेड़बुन में खो कर वर्तमान का आनंद लेना मत छोडिये| जो कुछ होना है वो होगा..और हम उसका सामना करेंगे..वो हमारे भले के लिए ही होगा..ऐसा विश्वास रखें|

जीवन को प्रेम से परिपूर्ण करें …फिर सब कुछ अच्छा होगा|

सत्य एक है – अपनी अंतरवाणी को सुनें – 27 मार्च 2008

मैं और रमोना सुबह सत्य के बारे में बातें कर रहे थे। वस्तुतः मैंने थामस के साथ भी गत रात्रि में इसके बारे में चर्चा की थी। केवल एक ही सत्य है। यह बहुत सारे धर्मग्रंथों में कहा गया है, भागवत गीता में और थामस ने मुझे बताया कि आप इससे थोड़ी अलग व्याख्या परन्तु एक जैसे सार बाइबिल में भी पायेंगे। सत्य एक है। यह दो नहीं हो सकता। कोई भी धर्म इससे इंकार नहीं करेगा। हर धर्म इस पर सहमत है कि सत्य एक है।

कभी-कभी मैं यह सुनता हूं कि लोग बहाने के साथ एक द्वंद की व्याख्या करते हैं कि उनका सत्य अलग है और किसी दूसरे का सत्य अलग है। मैंने थामस को फ़ोन पर एक उदाहरण दिया, मैंने सितारों को देखा और कहा: मैं यहां चांद को देख रहा हूं और यदि इसे तुम्हें दिखाता हूं, तुम भी चांद ही देखोगे। तुम सूर्य नहीं देखोगे और तुम मुझसे यह नहीं कहोगे कि यह सूर्य है क्योंकि सत्य यह है कि यह चांद है। और सत्य इसी तरह का है। यह भिन्न नहीं हो सकता।

हमारे अंदर इसके लिये एक संकेतक भी है। यह अंतरवाणी जो कभी कभी आपको बताती है कि कोई झूठ बोल रहा है या धोखा दे रहा है या आपको क्या करना चाहिये। और हमें इस अंतरवाणी के साथ चलना चाहिये। मैंने पहले भी यह कहा है कि आप बहुत ज्यादा न सोचे इस बारे में कि दूसरे आपके बारे में क्या कहते है या क्या सोचते है। तब आप कुछ और होने का दिखावा करेंगे। हो सकता है आप यह साबित करने का प्रयास करें कि यह आपका सत्य है और अजीब व्यवहार करें हालांकि आपके अंतर में यह पता हैं कि सत्य कुछ और है। कि आप वास्तव में कुछ और हैं। इसलिये आप आपने भीतर की आवाज की अनदेखी न करें और दूसरे के लिये न जियें। सत्य से भागना बंद करें। सत्य केवल एक है|

प्रेमसंबंध में सफलता के चार सोपान – 20 मार्च 08

आज हमने स्कूल के नन्हे- मुन्नों के साथ होली खेली। सबके हाथों में पिचकारियां थी और सब बाल्टियों से रंगीन पानी पिचकारियों में भर रहे थे। हम सब के पास रंगीन पानी और अबीर – गुलाल था जो हम एक दूसरे के ऊपर डाल रहे थे। सबने बहुत मस्ती की। एंड्रीया , मेली , सुसी और रमोना तो अभी तक गुलाबी रंग में रंगे हुए हैं। यह रंग इतना पक्का होता है कि जल्दी से उतरता नहीं है। वैसे भी इसे रगड़ – रगड़्कर उतारने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि अभी हम कल और परसों भी एक दूसरे पर रंग डालेंगें।

मैंने पहले भी कहा है कि किसी के प्रेम पड़ना आसान होता है लेकिन उस रिश्ते को परवान चढ़ाना और निभाना बहुत ही मुश्किल। मैं तो कहूंगा कि सभी को प्रेम के वशीभूत होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि आप किसी पुरुष या स्त्री के साथ ही प्रेम करें। आप किसी सुगंध, किसी रंग या फिर किसी एक खास पल के साथ भी प्रेम में डूब सकते हैं। आप किसी व्यक्ति की वाक् कला की तरफ आकर्षित हो सकते हैं, पड़ोसी का दस्ताना व्यवहार आपको लुभा सकता है। इस बात पर भी मुग्ध हो सकते हैं कि आप स्वस्थ महसूस कर रहे हैं। ये सभी बातें आपके जीवन में सकारात्मकता लाती हैं।

हमारी आदत होती है कि सदैव बुरी बातों की तरफ हमारी दृष्टि जाती है। बेहतर होगा कि अच्छी बातों में ध्यान लगाएं और जीवन का आनंद लें। किसी व्यक्तिविशेष के बारे में बात करते समय यह महत्वपूर्ण होता है कि हम उसकी अच्छाई और बुराई दोनों पर नज़र डालें। दरअसल किसी भी प्रेमसंबंध की चार सीढ़ियां होनी चाहिए : सबसे पहले उस व्यक्ति से आपका परिचय हो, उसके बाद आप उस पर विश्वास करें, तीसरी सीढ़ी है प्रेम होना और आखिर में उसके साथ एक रिश्ता कायम होना । किसी व्यक्ति को जाने बिना आप उस पर विश्वास नहीं कर सकते। और यह विश्वास ही प्रेम का आधार होता है। रिश्ते की इमारत प्रेम की नींव पर खड़ी होनी चाहिए!

अकसर मैंने देखा है कि लोग इससे उल्टा करते हैं : वे पहले एक रिश्ता कायम कर लेते हैं और फिर उसके बाद प्रेम के उत्पन्न होने का इंतज़ार करते हैं या उसे उत्पन्न करने की कोशिश करते हैं। देखा जाए तो ऐसा संबंध आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरिज) से बहुत भिन्न नहीं होता। इस विवाहों में भी स्त्री – पुरुष एक दूसरे से अपरिचित होते हैं और फिर कुछ समय बाद, कई बार तो वर्षों के बाद, सही मायनों में उनके बीच प्रेम प्रस्फुटित होता है। कई बार तो ऐसे विवाहों में प्रेमभावना कभी उत्पन्न ही नहीं होती। जाहिर है कि कहीं कुछ गड़बड़ है । पहले एक दूसरे को जानें , तभी विश्वास पैदा होगा। विश्वास के बाद प्रेम और उसके बाद रिश्ता कायम होना लाजिमी है। इस प्रकार एक ठोस बुनियाद पर खड़ा हुआ आपका रिश्ता चिरस्थाई बना रहेगा।

भारतीय और पश्चिमी संस्कृतियाँ एक दूसरे को प्रभावित करती हैं – 11 मार्च 2008

कल मैंने कहा था कि आपको अच्छी बातें, अच्छे गुण देखने चाहिए। और यह बात सिर्फ व्यक्तियों और आपसी संबंधों पर ही लागू नहीं होती बल्कि सामान्य जीवन में, सामान्य परिस्थितियों में और यहाँ तककि राष्ट्रों पर भी लागू होती हैं। भारत और उसकी संस्कृति के मामले में कई ऐसी बाते हैं जिन्हें मैं नापसंद करता हूँ मगर उसकी कई बाते मुझे बहुत प्रिय भी हैं। और यही बात यूरोप के बारे में भी कह सकता हूँ जहां मैं अक्सर सफर करता रहता हूँ। आप कोई भी ऐसी जगह नहीं बता सकते जहां हर बात बिल्कुल पूर्ण और निर्दोष हो या जिनकी आप आलोचना न कर सकें या जिन्हें देखकर आप व्यग्र न हो जाएँ। लेकिन अगर आप सिर्फ गुणों पर ही अपने विचारों को केंद्रित करें तो देखेंगे कि उसे देखने का आपका नज़रिया ही यह तय करता है कि आप उस राष्ट्र को पसंद या नापसंद करें।

दुर्भाग्य से हम अकसर बुरी बातों से ही आकर्षित होते हैं। यह आसान होता है। यही कारण है कि बहुत सी बुरी बातें पश्चिम से भारत की ओर रुख करती हैं और यहाँ से पश्चिम की तरफ भी। भारत में बहुत से युवा पश्चिम की नकल में शराब पीना, सिगरेट पीना यहाँ तक कि नशीले पदार्थों का सेवन शुरू कर देते हैं। परिवार टूट रहे हैं और पहले की तरह अब एक ही परिवार के सदस्यों का आपस में कोई सहयोग नहीं होता। पश्चिमी समस्याएं इधर का रुख कर चुकी हैं जैसे बूढ़ों की देखभाल कौन करेगा क्योंकि सब अलग हो चुके हैं और उनकी ज़िम्मेदारी उठाने वाला कोई नहीं रह गया है। यह पागलपन है। हम प्रगति कर रहे हैं मगर प्रगति करते हुए हमें सिर्फ अच्छी बातों को स्वीकार करना चाहिए, बुराइयों को नहीं।

कई बातों में मुझे पश्चिमी दुनिया पर तरस आता है। वहाँ मैं कई लोगों से मिलता हूँ जो गुरु बनना चाहते हैं जिसके बहुत से अनुयायी हों। वे एक तरह के अहं में जीना चाहते हैं और चाहते हैं दूसरे उनके सामने झुकें, उनके पैर छुएँ। वे भारतीय गुरुओं की सारी नाटकबाजियाँ वहाँ दोहराना चाहते हैं। यह असुरक्षा की भावना की समस्या है। जिनके जीवन में अवरोध आ गया है और जो असुरक्षित महसूस करते हैं वे इस तरह के काम करते हैं। वे चाहते हैं कि लोग उनकी बात सुनें, उन्हें देखें और इज्ज़त करें, उनके शिष्य बनें। वे भारतीय गुरुओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं।

मैं अपने उपचार सत्रों में कई ऐसे लोगों से मिलता हूँ जिन्होंने यह बेहूदी नाटकबाजी भारत से सीखी है। मैं खुद गुरु के ऐसे जीवन का अनुभव ले चुका हूँ, गुफा में काफी वक्त गुजारने से पहले और वह बीती बात हो चुकी है। मैं अब वैसा जीवन पुनः जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए जब मैं ऐसे लोगों को देखता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि वे क्यों अपनी मौलिकता खोना चाहते हैं और दूसरों का नकली जीवन जीना चाहते हैं। मैं इस बात का कायल हूँ कि आप जो हैं, जैसे भी हैं वैसे रहें, सहज और स्वाभाविक। हर व्यक्ति अलग है, अनूठा है। और इस तरह मैं भारत की अच्छी बातों का पश्चिम में और पश्चिम की अच्छी बातों का यहाँ प्रसार करते हुए प्रसन्न होता हूँ।

भारतीयों और पश्चिम से आए लोगों के लिए कीमत में अंतर – 25 फरवरी 2008

आज एरिक का जन्मदिन था। वह लक्सम्बर्ग का रहने वाला है और एक माह से हमारे आश्रम में रह रहा है और विद्यार्थियों की मदद करता है। हमने उसका जन्मदिन मनाया और केक और उपहारों के साथ उसे शुभकामनाएँ दीं तो वह भौंचक्का रह गया। वह खुश हुआ तो मुझे भी अच्छा लगा।

मेरे मित्र रोजर और मैडी कस्बे की तरफ घूमने निकल गए। जब वे एक नाई की दुकान की फोटो खींचने लगे तो नाई ने हाथ देकर उन्हें रोका और पैसे मांगने लगा क्योंकि उन्होंने फोटो लिए थे! रोजर ने कहा कि अगर वह पैसे चाहता है तो उसे कुछ काम भी करना पड़ेगा; चलो, मेरी दाढ़ी बना दो। तो इस तरह रोजर ने जीवन में पहली बार किसी दूसरे से दाढ़ी बनवाने का मज़ा लिया। एलेक्ट्रिक शेवर से नहीं, बल्कि ब्लेड से। दाढ़ी बनवाने के बाद और मसाज करवाने के बाद रोजर ने उससे दाम पूछा तो नाई ने उससे 100 रुपए मांगे जोकि आम तौर पर 5 रुपए से ज़्यादा का काम नहीं होता। चलो ठीक है, रोजर ने दे दिये क्योंकि उसे पता ही नहीं था कि इतने काम का वास्तविक मेहनताना कितना होता है और उसे लगा कि सिर्फ 2 यूरो तो देना है! जब हमने बताया कि उसने 95 रुपए ज़्यादा दे दिये हैं तो वह खूब हंसा। उसने कहा, ‘शायद इससे वह नाई एक दिन के लिए काफी अमीर हो गया होगा और मैं इतने से गरीब नहीं हो जाने वाला!’ उसकी यह भावना मुझे प्रभावित कर गई लेकिन दूसरी तरफ मुझे लगा कि भारत में किसी चीज़ के दाम बड़े विचित्र होते हैं। कोई विदेशी आता है, जो अपने सफ़ेद रंग से आसानी से पहचान लिया जाता है तो उससे दुगने से ज़्यादा दाम वसूल किए जाते हैं। हालांकि, यूरोप के मुकाबले यह फिर भी सस्ता ही है। और ऐसे ही यह चलता है। उनको मोलभाव करना होगा और उसके बावजूद उनको उस कीमत पर कोई चीज़ नहीं मिलेगी जो एक भारतीय को मिलती है।

साधु – एक अनासक्त जीवन – 18 फरवरी 2008

कल हमें वापस भारत के लिए रवाना होना है और आज हम उस यात्रा की तैयारी में व्यस्त हैं। हम अब वापसी के लिए उतावले हो रहे हैं और हमारा बोरिया-बिस्तर तैयार है!

कल मैंने एक साधु का उदाहरण देते हुए समझाया कि अनासक्ति का क्या अर्थ होता है। आज मैं एक साधु के जीवन के बारे में कुछ विस्तार से बताना चाहता हूँ कि उससे भारतीय संस्कृति के बारे में क्या पता चलता है और हम कितने कम साधनों में जीवन गुज़ार सकते हैं। आज भी लाखों लोग हैं जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं। जैसा कि मैंने कल बताया उनकी किसी चीज़ में कोई आसक्ति नहीं होती। लोगों से नहीं, किसी स्थान से नहीं या किन्ही भौतिक चीजों से भी नहीं। अगर आप किसी साधु से पूछें कि आप कहाँ के रहने वाले हैं या आपके माता-पिता कौन हैं तो वे नाराज़ हो जाएंगे, बल्कि अपमानित महसूस करेंगे। सभी जानते हैं कि वे ऐसी बातों के बारे में बात करना पसंद नहीं करते और इन सब बातों से अनासक्त हो चुके हैं।

एक कहावत है: वे पेड़ के नीचे रहते हैं और हाथ में खाते हैं। खासकर वृंदावन में यह एक पवित्र परंपरा है और जब कोई साधु आपके द्वार पर आता है तो उसे अच्छी से अच्छी चीज़ें खाने को दी जाती हैं। बचपन में एक साधु अक्सर हमारे घर आया करता था। साधु आपके घर आता है और दरवाजा खटखटाता है लेकिन वह अंदर नहीं आता। अगर आ जाए तो घर का मालिक इतना कृतकृत्य हो जाता है जैसे ईश्वर ही चलकर उसके यहाँ आ गए हों। फिर उसके हाथ में अधिक से अधिक वस्तुएं रख दी जाती हैं क्योंकि वह थाली में कोई चीज़ नहीं लेता। मेरी माँ हमेशा उसके हाथ पर सबसे पहले रोटी रखती थीं फिर उस पर चाँवल फिर सब्जी और दाल परोसती थीं। वह अधिक से अधिक जितना उसके हाथ में आ सकता था रखती जाती थीं और वह अपने हाथ से सीधे खा लेता था। और मेहरबानी करके याद रखें, इसे भीख मांगना नहीं माना जाता! उसे खिलाकर सभी को खुशी होती है। वे ऐसा जीवन जीते हैं कि उन्हें भोजन से भी कोई आसक्ति नहीं होती। उनका सिर्फ एक काम होता है, ईश्वर को अपना जीवन समर्पित कर देना और आध्यात्मिक रूप से ध्यानमग्न होकर ईश्वर के साथ एकात्म हो जाना। उनके पास कोई सामान नहीं होता; वह ऐसे ही रहते हैं, किसी तालाब या नदी में नहा लेते हैं। साधु अपनी आवश्यकताओं को एक एक करके कम करते जाते हैं और गाँव-गाँव घूमते रहते हैं जिससे किसी एक स्थान से उन्हें लगाव या मोह न हो जाए। और कोई भी इस जीवन का चुनाव कर सकता है। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो एक सफल वकील थे, काफी अमीर थे कि जो चाहते प्राप्त कर सकते थे; मगर एक दिन अचानक वे साधु हो गए। वे अपना घर-बार छोडकर और ईश्वर में ध्यान लगाते हुए जीवन बिताने के अपने निर्णय से बहुत खुश थे। मैंने स्वयं भी अपने जीवन का काफी समय साधु बनकर इसी तरह गाँव-गाँव घूमते हुए गुज़ारा है। मैं समझता हूँ कि अपना सर्वस्व अपने ईश्वर, यानी प्रेम को समर्पित करते हुए आज भी मैं वही साधु का जीवन जी रहा हूँ। हमने आखिरी दिन एक अनुष्ठान का आयोजन किया और यूरोप की अपनी यात्रा सम्पन्न की।

पश्चिम में भारतीय परंपराएँ – 13 फरवरी 2008

25 साल की एक महिला आज मेरे पास आई। उसने मुझे बहुत प्रसन्न मन से बताया कि 10 साल से उसके किसी के साथ संबंध हैं और अब वह गर्भवती है। इस बात को देखना, सुनना और महसूस करना कितना सुंदर है! यहाँ मैं इतने दीर्घजीवी संबंध क्वचित ही देख पाता हूँ, विशेषकर इतनी कम उम्र में। ऐसा प्रेम देखकर मुझे बड़ी खुशी होती है और मैंने उन तीनों को अपनी शुभकामनाएँ दीं।

दरअसल अधिकतर लोग अपने अंदर कुछ कमी सी पाते हैं और यही कारण है कि, जैसा कि मैंने कल भी स्पष्ट किया था, वे किसी रूढ़िबद्ध नियम पर चलना ठीक समझते हैं। यहाँ पश्चिम में लोग सुरक्षा और प्रेम की खोज में लगे हुए हैं। वे किसी तृष्णा के पीछे भाग रहे हैं। कई तरह के उपचारों, परंपराओं और दार्शनिक विचारों के बीच एक तरह का भ्रम फैला हुआ है जिनमें से कुछ का उद्गम भारत से होता है। कई ऐसी बातें हैं जिन्हें गलत ढंग से समझा गया है बल्कि जैसा कि मैं पिछले कुछ दिनों से कहता रहा हूँ, एक तरह से उनका दुरुपयोग किया जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि चीज़ें तब गलत दिशा में जाने लगीं जब भारत से पश्चिम आए हुए लोगों ने अपने मतलब के लिए भारत की प्राचीन और अलौकिक परंपराओं को तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दिया।

भारत एक महान, संस्कृति सम्पन्न, आध्यात्मिक राष्ट्र है। मैं इन गुरुओं से कहना चाहता हूँ कि ऐसा गलत व्यापार न करें। बिना आलोचना किए या उन्हें भ्रमित किए लोगों को हमारी संस्कृति को समझने की अंतर्दृष्टि प्रदान करें। यह आपकी और भारत की प्रतिष्ठा पर दाग लगाने वाला काम है। अपनी संस्कृति की रक्षा करें। आध्यात्मिकता और योग के नाम पर कुछ भी ऊलजलूल चीज़ें यहाँ बेची जा रही हैं। नाम और लेबल भारत से आयातित होता है। यह हमारे महान देश और संस्कृति का दोषपूर्ण नज़रिया पेश करता है। अगर कोई किसी खोज में है, किसी चीज़ की उसे लालसा है या आपसे कुछ अपेक्षा करता है तो इसका उपयोग पैसा बनाने में न करें। उसे सही रास्ता दिखाएँ, उसे सलाह दें अगर वह मांगता है, ईमानदार बनें और सिर्फ प्रेम का प्रसार करें। यह बहुत अच्छा होगा यदि आप इस तरह किसी की मदद कर सकें जिससे उसे लंबे समय तक खुशी और शांति प्राप्त हो सके।

विश्वास की नींव पर बनाएं रिश्ते – 30 जनवरी 08

जैसाकि मैंने कल भी कहा था कि यहां लोग कई बार बड़ी अजीबोग़रीब सोच के साथ किसी रिश्ते की शुरुआत करते हैं। किसी रिश्ते का जन्म कैसे हुआ यह बहुत महत्वपूर्ण होता है। आपने किस मनःस्थिति में इसकी शुरुआत की? बाद में यह किस तरह परवान चढ़ा? डर के साथ या बगैर किसी डर के ? घूम – फिरकर बात वहीं विश्वास पर आ जाती है। आपसी संबंधों में भरोसे की बहुत कमी नज़र आती है यहां। प्रेम की शुरुआत ही शंकाओं के साथ होती है यहां। लंबे समय से प्रेमबंधन में बंधे प्रेमी युगल भी अपने रिश्ते को लेकर शंकाओं से घिरे रहते हैं : पता नहीं कितने दिन चल पाएगा हमारा यह रिश्ता? अधिकतर को यही डर सताता रहता है हर वक़्त। इस तरह के रिश्ते की बुनियाद मज़बूत हो ही नहीं सकती। मेरा मानना है कि भरोसे और प्रेम की नींव पर रिश्ते की इमारत खड़ी करेंगें तो बेहतर होगा।

रमोना कल की फिल्म का दूसरा भाग लेकर आई है जिसे हम आज देखेंगें। सच बताऊं तो मुझे फिल्म याद भी नहीं है। बस इतना याद है कि फिल्म अच्छी थी लेकिन इससे आगे और कुछ याद नहीं है। शायद यह इतना महत्वपूर्ण भी नहीं है। कई ऐसी बातें हैं जो आज से बीस साल पहले हुई थीं और मैं शब्दशः उनका वर्णन कर सकता हूं। लेकिन मुझे कल देखी हुई फिल्म की कहानी याद नहीं है। क्या करूं,, मेरा दिमाग ही ऐसा है।

एक के बाद एक नए प्रेमसंबंध बनाना – 29 जनवरी 08

आज फिर एक नया दिन। प्रतिदिन की तरह आज भी हीलिंग सत्र जारी थे। एक स्त्री, जो पहले भी कई बार मेरे पास हीलिंग के लिए आ चुकी थी, आज फिर आई। मैं जब भी श्वाबमुकेन में होता हूं तो वह अवश्य आती है। यहां के अन्य कई लोगों की तरह वह भी अकेली रहती है और एक के बाद एक नए पुरुषों से संबंध बनाती रहती है। कोई भी रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चलता। यह एक आम बात है यहां। मैं कई बार सोचता हूं कि यहां लोग क्या सोचकर रिश्ते बनाते हैं। “ देखते हैं ये दोस्ती कितने दिन चलती है। मुझे उम्मीद है कि इस बार यह थोड़ा ज्यादा दिन चलेगी।“ ऐसी बातें अकसर सुनने को मिलती हैं। क्या यह सुनकर आपको ऐसा नहीं लगता कि रिश्ता बनाने से पहले ही यह निश्चित कर लिया गया है कि यह ज्यादा दिन नहीं टिकेगा ? यह एक ऐसा विषय है जिस पर आप गहराई से विचार करें। आज के लिए बस इतना ही। आज रात हम एक फिल्म देख रहे हैः ‘मीट द पेरेंट्स’। मैं फिल्में नहीं देखता हूं लेकिन रमोना ने कहा कि शायद यह फिल्म भी मुझे पसंद आएगी। और वाकई फिल्म बहुत दिलचस्प थी! महीनों से साथ – साथ यात्रा करते हुए वह जान गई थी कि मुझे और यशेंदु को क्या पसंद है।

रिश्तों के घाव भरे अध्यात्म की औषधि – 12 जनवरी 08

आज एक व्यक्ति हीलिंग के लिए मेरे पास आया। वह बहुत दुखी था और जार – जार रो रहा था। एक साल साथ रहने के बाद उसकी पत्नी बिना कोई कारण बताए किसी और पुरुष के साथ चली गई थी। एक दूसरा व्यक्ति आया जो चालीस बरसों से पत्नी के साथ रहते रहते ऊब गया था और अब ‘बदलाव ‘ चाहता था। मैं बैठा हुआ सोच रहा था “ ये क्या हो रहा है? “ हीलिंग सत्रों के दौरान मैं बहुत से लोगों से मिलता हूं। बहुत कुछ देखता – सुनता भी हूं। मैं एक हीलर हूं और ज़ाहिर है कि मैं किसी की भी पहचान को उद्घाटित नहीं करता हूं और न ही उनकी परेशानियों के बारे में किसी से बातचीत करता हूं। इस सभी विषयों पर अपने विचार मैं किसी और दिन व्यक्त करूंगा। सत्र पूरा होने के बाद हम एक भारतीय रेस्तरां में भोजन करने गए। खाना खाते वक़्त भी रिश्तों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा होती रही। सुस्वादु भोजन करने के बाद हम लुसाने के गिरिजाघर गए और वहां से जेनेवा झील के चारों तरफ शहर की रोशनी का अद्भुत नज़ारा देखा।